भक्ति शब्द की उत्पत्ति, परिभाषा और भेद (bhakti shabd ki utpatti, paribhaasha aur bhed)
★ भक्ति शब्द की व्युत्पत्ति :-
• भक्ति शब्द संस्कृत के ‘भज्’ सेवायाम् धातु में ‘ क्तिन्’ प्रत्यय लगाने पर बनता है।
• जिसका अर्थ ‘सेवा करना’ या ‘भजना’ है, अर्थात् श्रद्धा और प्रेमपूर्वक इष्ट देवता के प्रति आसक्ति।
• “भक्ति शब्द की व्युत्पत्ति ‘भज्’ से की जा सकती है”।(भज् का अर्थ :- भाग लेना)【 मोनियर विलियम के अनुसार】
• भक्ति शब्द का वास्तविक अर्थ है :- भगवान की सेवा करना
★ भक्ति की परिभाषा :-
• “अपूर्व एवं प्रकष्ट अनुराग रखने को ही भक्ति कहते हैं।” (महर्षि शांडिल्य के अनुसार)
• “भगवान के प्रति परम प्रेम ही भक्ति है।” (नारद मुनि के अनुसार)
• ” चित्तवृत्तियों का सर्वेश्वर के प्रति अक्षुण्ण बना रहने वाला आकर्षण भक्ति है।”(मधुसूदन सरस्वती ने अपने ग्रंथ ‘भक्ति-रसायन’ के अनुसार)
• “कथा श्रवण में अनुरक्ति ही भक्ति है।” (गर्ग के अनुसार)
• “पूजा में अनुराग को भक्ति कहा है।”(व्यास के अनुसार)
• “भगवान के महात्ज्ञान पूर्वक सुदृढ़ और सतत् स्नेह की स्नेही भक्ति है।”( माधवाचार्य के अनुसार)
• “श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है।” (आ. रामचंद्र शुक्ल के अनुसार)
• “भक्ति धर्म का रसात्मक रूप है।” (आ. रामचंद्र शुक्ल के अनुसार)
• ” स्नेहपूर्वक ध्यान ही भक्ति है।”(डॉ. नगेंद्र केअनुसार)
• “आध्यात्मिक अनुभूति के लिए किए जाने वाले मानसिक प्रयत्नों की परम्परा ही भक्ति है।” (स्वामी विवेकानन्द ने ‘भक्त के लक्षण ‘ शीर्षक के अन्तर्गत कहा।)
★भक्ति के भेद :-
◆ रति के अनुसार भक्ति के छःभेद होते हैं :-
1. शान्त भक्ति :- • ” दु:ख – सुख, चिंता,राग,द्वेष और इच्छा से रहित भाव को शांत कहते हैं।”(साहित्य दर्पण के अनुसार) • जैसे:- तुलसी के काव्य में(शान्त रस की प्रधानता)
2. दास्य भक्ति :- • इस भक्ति में प्रभु को अपना स्वामी और इष्ट देव समझता है तथा अपने को उसका दास, सेवक और अनुचर। • जैसे :- कबीर के दोहों में
3. संख्य भक्ति :- • जो हृदय विचारों से विहीन प्रपंच से पृथक और राम से रहित हो चुका है वहीं प्रभु में सखा भाव को प्राप्त करता है। • इस तरह की भक्ति सूरदास ने की थी।
4. वात्सल्य भक्ति :- • भगवान के बालरूप पर मुग्ध होकर उसकी सेवा में उसी तरह लग जाता है जैसे कोई अपने शिशु की परवारिश करता है। एक माँ का पुत्र के प्रति प्रेम वात्सल्य कहलाता है अतः इसीलिए इस प्रकार की भक्ति वात्सल्य भक्ति कहलाती है। • नन्द यशोदा का कृष्ण के प्रति प्रेम वासल्य भक्ति का ही उदाहरण है। • जिस काव्य में वात्सल्य रस की प्रधानता होती है। • जैसे :- सूरदास के काव्य में
5. माधुर्य भक्ति :- • इसको प्रेम या कांता भक्ति भी कहते हैं। • श्रृंगार प्रेम की भक्ति को ही माधुर्य भक्ति कहा जाता है। • ब्रजांगनाओं ने कृष्ण से ऐसा ही प्रेम किया था। • मीरा ने भी कृष्ण की आराधना पति रूप में की थी
6. दाम्पत्य भक्ति :- • परमात्मा को प्रियतम के रूप में तथा अपने को आपको उसकी प्रियतमा के रूप में मानकर ईश्वर प्रेम मार्मिक अभिव्यंजना की है।
◆ भक्ति का सबसे प्रचलित वर्गीकरण :- 【आ. रामचंद्र शुक्ल के अनुसार】
1. निर्गुण भक्ति :- इसके दो भेद –
★ संत काव्य 【प्रतिनिधि कवि – कबीरदास】
★ सूफी काव्य 【प्रतिनिधि कवि – जायसी】
2. सगुण भक्ति :- इसके दो भेद –
★ राम भक्ति काव्य (लोकमंगल का भाव) 【प्रतिनिधि कवि – तुलसीदास】
★ कृष्ण भक्ति काव्य (लोकरंजन का भाव) 【 प्रतिनिधि कवि – सूरदास】
• निर्गुण और सगुण दोनों प्रकार की भक्ति का मुख्य लक्षण :- भगवद् विषयक रति एवं अनन्यता।
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