प्राचीन भारतीय आर्य भाषाएं(purachin aary bharatiy bhashaen)

💐 प्राचीन भारतीय आर्य भाषाएं 💐
【1500 ई.पू. से 500 ई.पू. तक】

1. वैदिक संस्कृत 【1500 ई.पू. से 1000ई.पू. तक】

2. लौकिक संस्कृत 【1000 ई.पू. से 500 ई.पू. तक】

1. वैदिक संस्कृत
【1500 ई.पू. से 1000ई.पू. तक】

• वैदिक साहित्य का सर्जन वैदिक संस्कृत में हुआ है।
• वैदिक संस्कृत को वैदिक, वैदिकी, छन्दस्, छान्दस् आदि भी कहा जाता है।
• वैदिक साहित्य तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है :- संहिता, ब्राह्मण और उपनिषद्

(1.) संहिता :-

• संहिता विभाग में ऋक् संहिता, यजु संहिता, साम संहिता और अथर्व संहिता आते है।

◆ ऋक् संहिता(ऋग्वेद):-

• इसमें 10 मंडल, 1028 सूक्त एवं 1028 ऋचाएं।

• इसमें सूक्त प्रायः यज्ञों के अवसरों पर पढ़ने के लिए और देवताओं की स्तुतियों से संबंध रखने वाले गीतात्मक काव्य है।

◆ यजु संहिता (यजुर्वेद) :-

• इसमें यज्ञ कर्मकांड में प्रयुक्त मंत्र पद्य एवं पद्य दोनों रूपों में संगृहीत है।

• यह कृष्ण और शुक्ल इन रूपों में सुरक्षित है।

• कृष्ण यजुर्वेद संहिता में मंत्र भाग एवं गद्यमय व्याख्यात्मक भाग साथ – साथ संकलित किए गये हैं।

• शुक्ल यजुर्वेद संहिता में केवल मंत्र भाग संगृहित है।

◆ साम संहिता (सोमवेद) :-इसमें केवल 75 मंत्र ही मौलिक है शेष ऋग्वेद वेद के लिए गए हैं।

◆ अथर्व संहिता(अथर्ववेद) :- इसमें जन साधारण में प्रचलित मंत्र – तंत्र, टोने – टोटको का संकलन है।

(2.) ब्राह्मण :-

• इस भाग में कर्मकांड की व्याख्या की गई है प्रत्येक संहिता के सामने अपने अपने ब्राह्मण ग्रंथ है।
★ ऋग्वेद का :- ऐतरेय ब्राह्मण

★ सोमवेद का :- ताण्डव अथवा पंचविश ब्राह्मण

★शुक्ल यजुर्वेद का :- शतपथ ब्राह्मण

★ कृष्ण यजुर्वेद का :- तैत्तिरीय ब्राह्मण

(3.) उपनिषद् :-
• इनमें वैदिक मनीषियों के आध्यात्मिक एवं पारमार्थिक चिंतन के दर्शन होते हैं।

• उपनिषदों की संख्या 108 बताई गई है किंतु 12 उपनिषद् ही मुख्य हैं।

◆ वैदिक संस्कृत की प्रमुख विशेषताएं :-

1. वैदिक संस्कृत श्लिष्ट योगात्मक भाषा है।

2. वैदिक संस्कृत में संगीतात्मक एवं बलात्मक दोनों ही
स्वराघात मौजूद है।

3. वैदिक संस्कृत में तीन लिंग तीन वचन, तीन वाच्य एवं
आठ विभक्तियों का प्रयोग मिलता है।

4. वैदिक संस्कृत में धातुओं के रूप आत्मने एवं परस्मै
दो पदों में चलते है। कुछ एक धातुएं उभयपदी
(आत्मने एवं परस्मै के रूप) थी।

5. डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार वैदिक संस्कृत में
केवल तत्पुरुष, कर्मधारय, बहुब्रीहि एवं द्वंद्व ये चार
ही समास मिलते है।

6. वैदिक संस्कृत में काल एवं भाव(क्रियार्थ) मिलकर
क्रिया के 10 प्रकार के रूपों का प्रयोग मिलता है।
(चार काल और 6 भाव)

 

7. वैदिक संस्कृत में विकरण के विभिन्नता के अनुसार
धातुओं को 10 गणों में विभक्त किया गया था।

2. लौकिक संस्कृत
【1000 ई.पू. से 500 ई.पू. तक】

 

• प्राचीन भारतीय आर्य भाषा का वह रूप जिसका पाणिनी की अष्टाध्यायी में विवेचन किया गया है वह लौकिक संस्कृत कहलाता है।

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