आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रमुख निबंध(acharya hajari prasad mandal ke pramukh nibandh)

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रमुख निबंध

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिन्दी में ललित निबंध (Personal/Belles-lettres Essay) परंपरा के प्रवर्तक और शीर्षस्थ निबंधकार हैं। उनके निबंधों में गंभीर पांडित्य, सांस्कृतिक इतिहास-बोध, लोक-चेतना और सहज विनोदप्रियता का अपूर्व संगम दिखाई देता है।

1. निबंध-संग्रहों का संक्षिप्त विवरण

निबंध संग्रह प्रकाशन वर्ष निबंधों की संख्या मुख्य विशेषताएं / प्रमुख निबंध
अशोक के फूल 1948 ई. 21 अशोक के फूल, वसंत आ गया है, मेरी जन्मभूमि, देवदारु
कल्पलता 1951 ई. 20 नाखून क्यों बढ़ते हैं, आम फिर बौरा गए, शिरीष के फूल
विचार और वितर्क 1957 ई. 28 विचार-प्रधान एवं साहित्य समीक्षात्मक निबंध
विचार प्रवाह 1959 ई. 21 सांस्कृतिक एवं समसामयिक समस्याओं पर चिंतन
कुटज 1964 ई. 17 कुटज, साहित्य में हिमालय की परंपरा
आलोक पर्व 1972 ई. 27 साहित्य अकादमी पुरस्कार (1973) से सम्मानित संग्रह

2. प्रमुख निबंधों का गहन विश्लेषण

(क) अशोक के फूल (संग्रह: अशोक के फूल, 1948)

  • निबंध का स्वरूप: सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं ललित निबंध।
  • केंद्रीय विषय: भारतीय संस्कृति की सामासिकता (Synthesis) और अशोक के फूल की उपेक्षा/विस्मृति का ऐतिहासिक विश्लेषण।
  • मुख्य विचार व स्थापनाएँ:
    • द्विवेदी जी के अनुसार, जिसे हम ‘शुद्ध भारतीय संस्कृति’ कहते हैं, वह वस्तुतः अनेक जातियों (आर्य, द्रविड़, यक्ष, गंधर्व, असुर, नाग, शक, हूण आदि) के सांस्कृतिक सम्मिश्रण का परिणाम है।
    • कालिदास के साहित्य में अशोक का जो गौरव था, वह मध्यकाल आते-आते मुसलमानी प्रभाव और सामंती मनोवृत्ति के कारण विस्मृत हो गया।
    • प्रतीकार्थ: अशोक परिवर्तनशील समय और संस्कृति की अखंड धारा का प्रतीक है।
  • परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण कथन:
    • “भारतीय संस्कृति किसी एक जाति की देन नहीं है, यह अनेक जातियों के सांस्कृतिक अवदानों का परिणाम है।”
    • “दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है, केवल उतना ही याद रखती है जितने से उसका स्वार्थ सधता है।”
    • “मनुष्य की जिजीविषा बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती हुई आगे बढ़ी चली आ रही है।”

(ख) कुटज (संग्रह: कुटज, 1964)

  • निबंध का स्वरूप: वैचारिक-ललित निबंध, दार्शनिक प्रेरणापरक गद्य।
  • केंद्रीय विषय: विषम एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीने की अदम्य इच्छाशक्ति (अपराजेय जिजीविषा) और स्वाभिमान।
  • मुख्य विचार व स्थापनाएँ:
    • कुटज हिमालय की सूखी, नंगी और उजाड़ शिलाओं के बीच पाषाण की छाती चीरकर अपना रस खींचता है और लहलहाता है।
    • वह किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता, किसी की चाटुकारिता नहीं करता; वह ‘अपराजित पौरुष’ और ‘शांत आत्म-संतोष’ का प्रतीक है।
    • इसमें द्विवेदी जी ने स्वार्थी और चाटुकार प्रवृत्तियों पर व्यंग्य करते हुए स्वावलंबी जीवन जीने की प्रेरणा दी है।
  • परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण कथन:
    • “कुटज क्या केवल जी रहा है? वह दूसरों के द्वार पर भीख माँगने नहीं जाता, वह स्वाभिमान के साथ शान से जीता है।”
    • “जीना भी एक कला है, लेकिन कला ही नहीं, एक तपस्या है।”
    • “रूप की क्या बात है, शोभा तो अंतःकरण की वस्तु है।”

(ग) नाखून क्यों बढ़ते हैं (संग्रह: कल्पलता, 1951)

  • निबंध का स्वरूप: विचारात्मक-ललित निबंध।
  • कथा-सूत्र (उत्प्रेरक): निबंधकार की छोटी पुत्री का एक सहज प्रश्न — “पिताजी, नाखून क्यों बढ़ते हैं?”
  • केंद्रीय विषय: मनुष्य की आदिम पशुता (हिंसा/विनाश) बनाम मानवता (संयम, प्रेम व अहिंसा) का द्वंद्व।
  • मुख्य विचार व स्थापनाएँ:
    • नाखून का बढ़ना: मनुष्य के भीतर की पाशविक वृत्ति, आदिम हिंसक प्रवृत्तियों और विनाशकारी शस्त्रों (जैसे एटम बम) का प्रतीक है।
    • नाखून को काटना: मनुष्यता, आत्म-संयम, संस्कृति और प्रेम का परिचायक है।
    • मनुष्य शरीर से अब भी पशुता के लक्षण प्रकट होते हैं, किन्तु संस्कृति का कार्य उस पशुता पर निरंतर विजय प्राप्त करना है।
  • परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण कथन:
    • “नाखून बढ़ना मनुष्य की उस अंध-सहजात वृत्ति का परिणाम है, जो उसके जीवन में सफलता ले आना चाहती है; उसको काट देना उस स्वनिर्धारित आत्म-बंधन का फल है, जो उसे सार्थकता की ओर ले जाता है।”
    • “सफलता और सार्थकता में अंतर है — मनुष्य मारणास्त्रों के संचयन से सफल हो सकता है, पर उसकी सार्थकता प्रेम में है, मैत्री में है, त्याग में है।”
    • “कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़ें, मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा।”

(घ) शिरीष के फूल (संग्रह: कल्पलता)

  • केंद्रीय विषय: भीषण ग्रीष्म में भी अविचल रहने वाले शिरीष के माध्यम से ‘अनासक्त योगी’ (कालजयी अवधूत) के आदर्श की प्रतिष्ठा।
  • मुख्य विचार:
    • जब जेठ की दुपहरी में धरती तवे की तरह जलती है, तब भी शिरीष हरा-भरा रहकर सरस फूल देता रहता है।
    • द्विवेदी जी ने कवि कालिदास और महात्मा गांधी को आधुनिक युग का ‘शिरीष’ (अनासक्त अवधूत) माना है, जो बाहरी संताप के बीच भी भीतर से कोमल और अविचल बने रहे।
  • प्रमुख कथन: “अनादि काल से चला आ रहा यह शिरीष अनासक्त अवधूत की भाँति काल की मार सहते हुए भी अपराजेय बना रहता है।”

(ङ) देवदारु (संग्रह: अशोक के फूल)

  • केंद्रीय विषय: हिमालयी वृक्ष ‘देवदारु’ के ऐतिहासिक, भाषिक एवं सांस्कृतिक महत्व का विवेचन।
  • मुख्य विचार: देवदारु सनातन परंपरा, दृढ़ता और शिव के तांडव नृत्य की लयबद्धता का प्रतीक है। इसमें भाषा की व्युत्पत्ति (Etymology) और लोक-मान्यताओं का सुंदर समन्वय है।

3. हजारी प्रसाद द्विवेदी की निबंध-शैली की मुख्य विशेषताएँ

  1. पांडित्य एवं सरलता का संगम: संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और लोक-कथाओं के उद्धरण देते हुए भी भाषा कभी बोझिल नहीं होती।
  2. सांस्कृतिक मानवतावाद: हर प्राकृतिक उपमान (फूल, वृक्ष, अंग) के माध्यम से अंततः मनुष्य के उत्थान और जीवन-मूल्यों की बात करना।
  3. व्यंग्य एवं आत्मीय विनोद: आत्म-मजाकिया अंदाज (स्वयं को ‘पंडित’ कहकर व्यंग्य करना) और पाठकों से आत्मीय संवाद।
  4. व्यास एवं तरंग शैली: विचार एक बिंदु से शुरू होकर पूरे सांस्कृतिक इतिहास का चक्कर लगाते हुए पुनः मूल बिंदु पर लौटते हैं।

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