आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय(acharya hajari prasad dwivedi ka jeevan parichay)

1. सामान्य परिचय एवं जीवन-वृत्त
  • जन्म: 19 अगस्त, 1907 ई. | ग्राम: आरत दूबे का छपरा (ओझवलिया), जिला: बलिया (उत्तर प्रदेश)
  • बचपन का नाम: वैद्यनाथ द्विवेदी
  • उपनाम: व्योमकेश
  • माता-पिता: श्रीमती ज्योतिष्मति एवं पं. अनमोल द्विवेदी (संस्कृत, फारसी व ज्योतिष के प्रकांड विद्वान)
  • विवाह: 1927 ई. (श्रीमती भगवती देवी के साथ)
  • शिक्षा:
    • 1920: मिडिल परीक्षा (प्रथम श्रेणी)
    • 1923: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से प्रवेशिका
    • 1930: बीएचयू से ज्योतिष विषय में ‘शास्त्राचार्य’ (शास्त्री उपाधि के उपरांत)
    • 1940: लखनऊ विश्वविद्यालय से ‘डी.लिट्.’ की मानद उपाधि
  • निधन: 18 मई, 1979 ई.
2. कार्यक्षेत्र, पद एवं प्रमुख सम्मान
  • शान्तिनिकेतन (1930–1950):
    • 20 वर्षों तक हिन्दी अध्यापन।
    • हिन्दी भवन के निदेशक।
    • अभिनव भारतीविश्वभारती पत्रिका (1941–1947) का संपादन।
    • गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर एवं क्षितिमोहन सेन के सान्निध्य में व्यापक सांस्कृतिक चेतना का विकास।
  • काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU): हिन्दी विभागाध्यक्ष; 1967 से 1970 तक रेक्टर पद पर कार्यरत।
  • पंजाब विश्वविद्यालय (1960–1967): हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं ‘टैगोर चेयर’ प्रोफेसर।
  • सम्मान व पुरस्कार:
    • 1955: राजभाषा आयोग के सदस्य मनोनीत।
    • 1957: भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से अलंकृत।
    • 1962: साहित्य अकादमी द्वारा टैगोर पुरस्कार प्रदान।
    • 1973: आलोक पर्व (निबंध संग्रह) के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त।
3. साहित्यिक व्यक्तित्व एवं वैचारिक वैशिष्ट्य
  • मानवतावादी दृष्टि: “मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ” — साहित्य का चरम लक्ष्य मानव-कल्याण।
  • परंपरा और आधुनिकता का समन्वय: रूढ़ि और परंपरा में स्पष्ट अंतर; भारतीय परंपरा के स्वाभाविक विकास पर बल।
  • ऐतिहासिक अनुसंधान: सिद्धों, नाथों, अपभ्रंश एवं जैन साहित्य को हिन्दी साहित्येतिहास की मुख्यधारा में स्थापित किया।
  • आलोचनात्मक स्वरूप: सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं सौंदर्यशास्त्रीय समीक्षा दृष्टि।
4. प्रमुख कृतियाँ
ऐतिहासिक उपन्यास (प्रकाशन वर्ष सहित)
  • बाणभट्ट की आत्मकथा (1946): हर्षकालीन सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित; प्रमुख पात्र — बाणभट्ट, भट्टिनी, निपुणिका (निउनिया)।
  • चारु चन्द्रलेख (1963): 12वीं-13वीं शती के भारत का चित्रण; सिद्धों-तांत्रिकों का प्रभाव; राजा सातवाहन व चंद्रलेखा की कथा।
  • पुनर्नवा (1973): मृच्छकटिकम् और मालाविकाग्निमित्रम् के कथानक का मिश्रण; सामाजिक वर्ण-व्यवस्था पर चोट।
  • अनामदास का पोथा (1976): उपनिषद काल (छांदोग्य उपनिषद के रैक्व ऋषि की कथा) पर आधारित; उपशीर्षक — अथ रैक्व आख्यान
साहित्येतिहास ग्रन्थ
  • हिन्दी साहित्य की भूमिका (1940): 10 अध्याय व ~90 पृष्ठों का परिशिष्ट; परंपरा के सातत्य का निरूपण (आचार्य शुक्ल के मतों का तर्कपूर्ण पुनर्मूल्यांकन)।
  • हिन्दी साहित्य का उद्भव और विकास (1952): 10 अध्यायों में वर्गीकृत; आदिकाल से आधुनिक काल तक का सुव्यवस्थित इतिहास।
  • हिन्दी साहित्य का आदिकाल (1952): बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् में दिए गए 5 प्रामाणिक व्याख्यानों का संकलन।
समीक्षा एवं शोध ग्रन्थ
  • सूर साहित्य (1934): प्रथम आलोचनात्मक ग्रन्थ; सूर के वात्सल्य, माधुर्य व भक्ति का सूक्ष्म विश्लेषण।
  • कबीर (1942): कबीर को “वाणी का डिक्टेटर” घोषित किया; नाथ पंथ के प्रभाव व दार्शनिक पृष्ठभूमि की स्थापना।
  • नाथ सम्प्रदाय (1950): नाथ पंथ का प्रथम प्रामाणिक और व्यवस्थित शोध ग्रन्थ।
  • मध्यकालीन धर्म-साधना (1952): 39 शोधपरक निबंधों का संकलन।
  • कालिदास की लालित्य-योजना (1965): 15 निबंधों में कालिदास के काव्य का सौंदर्यशास्त्रीय विवेचन।
  • साहित्य-सहचर (1949) व साहित्य का मर्म: सैद्धांतिक समीक्षा ग्रन्थ।
  • मध्यकालीन बोध का स्वरूप (1970): भक्तिकालीन संतों और कवियों के ऐतिहासिक संदर्भ का मूल्यांकन।
प्रमुख निबन्ध संग्रह
  • अशोक के फूल (1948): 21 निबंध (अशोक के फूल, वसंत आ गया है, मेरी जन्मभूमि)
  • कल्पलता (1951): सांस्कृतिक एवं ललित निबंध (नाखून क्यों बढ़ते हैं)
  • विचार और वितर्क (1957): 28 निबंध
  • विचार प्रवाह (1959): 21 लेख एवं भाषण
  • कुटज (1964): 17 निबंध (जिजीविषा और संघर्ष का प्रतीक — कुटज)
  • आलोक पर्व (1972): 27 निबंध (साहित्य अकादमी पुरस्कृत)
संपादित ग्रन्थ
  • पृथ्वीराज रासो (संक्षिप्त) — माताप्रसाद गुप्त के साथ
  • सन्देश रासक (अब्दुल रहमान कृत)
  • नाथ सिद्धों की बानियाँ
5. परीक्षा हेतु प्रमुख स्मरणीय तथ्य
  • आदिकाल को ‘अत्यधिक व्याघातों और विरोधों का युग’ हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ही कहा।
  • कबीर को ‘भाषा का डिक्टेटर’ और भक्तिकाल को ‘भारतीय चिन्तनधारा का स्वाभाविक विकास’ माना (शुक्ल जी के ‘मुस्लिम आक्रमण की प्रतिक्रिया’ मत का खंडन)।
  • ललित निबंधकार के रूप में इन्हें हिन्दी में शीर्ष स्थान प्राप्त है।

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