घनानंद के कवित्त और सवैया व्याख्या: अंतरा भाग-2(ghananand ke kavitt aur savaiya ki vyakhya)
रीतिकाल की रीतिमुक्त (स्वच्छंद) काव्यधारा के मूर्धन्य कवि और ‘प्रेम के पीर’ के अमर गायक घनानंद की अंतरा (भाग-2) में संकलित रचनाओं—कवित्त (1 व 2) और सवैया—का संदर्भ, प्रसंग, सप्रसंग व्याख्या, भावार्थ एवं काव्य-सौंदर्य:
पाठ-परिचय एवं संदर्भ
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रचनाकार: महाकवि घनानंद
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काव्यधारा: रीतिकाल (रीतिमुक्त/स्वच्छंद काव्यधारा)
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भाषा: शुद्ध, परिष्कृत एवं साहित्यिक ब्रजभाषा
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संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश रीतिमुक्त धारा के प्रमुख कवि घनानंद द्वारा रचित पदों/छंदों से उद्धृत हैं, जो अंतरा (भाग-2) में संकलित हैं।
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केंद्रीय विषय: अपनी प्रेयसी ‘सुजान’ (जो बाद में कृष्ण भक्ति में ‘सुजान-प्रभु’ बन जाती हैं) के प्रति अनन्य, एकनिष्ठ प्रेम और विरह की अंतहीन पीड़ा का मार्मिक अंकन।
1. कवित्त 1: बहुत दिनान को अवधि आस पास परे…
“बहुत दिनान को अवधि आस पास परे,खरे अरबरनि भरे हैं उठि धावन को।बरनि न जाइ दसा घनानंद जान अजान,कौन सी दसा है भई भूलि नहिं भावन को।अधर लगे हैं आनि करि कै पयान प्रान,चाहत चलन ये सँदेसो लै सुजान को।झूठि बतियानि की पत्यानि तें उदास ह्वै कै,अब ना घिरत घन आनँद औसान को॥”
प्रसंग
कवि घनानंद अपनी निष्ठुर प्रेयसी सुजान के विरह में मृत्यु के कगार पर पहुँच चुके हैं। वे अपने प्राणों की छटपटाहट और सुजान के झूठे वादों से उत्पन्न निराशा को व्यक्त करते हैं।
व्याख्या (भावार्थ)
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प्राणों की छटपटाहट: घनानंद कहते हैं कि तुम्हारे आने की अवधि (निश्चित समय) के कई दिन बीत चुके हैं। अब मेरे प्राण बेचैनी (अरबरनि) से भर गए हैं और शरीर से निकलकर तुम्हारी ओर दौड़ पड़ने को आतुर हैं।
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अकथनीय दशा: हे चतुर किंतु मेरे प्रेम से अनजान सुजान! मेरी इस विरह-दशा का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। मेरी ऐसी विवश दशा हो गई है कि अब मुझे कोई अन्य विचार या सुख-साधन अच्छा नहीं लगता।
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ओठों पर अटके प्राण: मेरे प्राण शरीर त्यागकर प्रस्थान (पयान) करने के लिए ठीक ओठों (अधर) पर आकर टिक गए हैं। वे केवल इसलिए अटके हुए हैं क्योंकि वे तुम्हारा कोई शुभ संदेश लेकर ही यहाँ से विदा होना चाहते हैं।
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झूठे आश्वासनों से निराशा: तुम्हारी झूठी बातों और झूठे वादों पर विश्वास करते-करते मेरा मन अब पूरी तरह उदास और निराश हो चुका है। अब इस जीवन में आनंद के बादल (घन आनंद) घिरकर इस विरही मन को संतोष या चैन (औसान) नहीं दे पा रहे हैं।
2. कवित्त 2: आनाकानी आरसी निहारिबो करौगे कौलौं…
“आनाकानी आरसी निहारिबो करौगे कौलौं,कहा मो चकौधीं दीठि मूंदि न लखौगी?इत तौ पुकार की परी है कान खोलि सुनि,कौलौं अचेत ह्वै कै मौन मति गहौगी?दीन ह्वै कै घनानंद पूँछत सुजान प्रान,कबहुँ तौ नेह-पत्री आँखिन सों छौगी?जान घनआनंद दयानिधि हौ ऐते तौ पै,काहे तैं निठुर ह्वै कै अंसुवनि दहौगी?”
प्रसंग
कवि सुजान की बेरुखी, उपेक्षा और दर्पण (आरसी) में अपने ही रूप को निहारते रहने की आदत पर उलाहना (शिकायत) देते हुए अपने प्रति कृपा-दृष्टि की प्रार्थना करते हैं।
व्याख्या (भावार्थ)
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उपेक्षा पर कटाक्ष: कवि कहते हैं कि हे सुजान! तुम कब तक मेरी बातों की अनदेखी (आनाकानी) करोगी और अपने अंगूठे की अंगूठी में लगे दर्पण (आरसी) में केवल अपने ही रूप-सौंदर्य को निहारती रहोगी? क्या तुम मेरी ओर अपनी आँखें मूंदकर मुझे अचंभित (चकौधीं) दृष्टि से ही देखती रहोगी?
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पुकार की अनसुनी: यहाँ मैं विरह में निरंतर पुकार रहा हूँ, अपने कान खोलकर मेरी इस करुण पुकार को सुनो! तुम कब तक बेपरवाह (अचेत) बनी रहकर इस प्रकार मौन साधकर बैठी रहोगी?
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पत्र की अभिलाषा: घनानंद अत्यंत दीन (असहाय) होकर पूछते हैं—हे मेरे प्राणों की आधार सुजान! क्या तुम कभी मेरे द्वारा भेजे गए प्रेम-पत्र (नेह-पत्री) को अपनी आँखों से लगाकर देखोगी?
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निष्ठुरता पर प्रश्न: तुम तो आनंद के बादल (घनआनंद) और दया के सागर (दयानिधि) हो, फिर मेरे प्रति इतनी कठोर और निष्ठुर बनकर मुझे विरह के आंसुओं की आग में क्यों जला रही हो?
3. सवैया: अति सूधो सनेह को मारग है…
“अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु न सयानप बाँक नहीं।तहाँ साँचे चलैं तजि आपनपौ, झझकैं कपटी जे निसांक नहीं॥घनआनंद प्यारे सुजान सुनौ, यहाँ एक तें दूसरो आँक नहीं।तुम कौन धौं पाटी पढ़े हौ लला, मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं॥”
प्रसंग
यह हिंदी साहित्य का अत्यंत प्रसिद्ध सवैया है, जिसमें प्रेम के सरल, निश्छल और निष्कपट स्वरूप की शास्त्रीय परिभाषा दी गई है तथा प्रेयसी के कपटपूर्ण व्यवहार पर तीखा उपालंभ दिया गया है।
व्याख्या (भावार्थ)
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प्रेम का सीधा मार्ग: घनानंद कहते हैं कि प्रेम का मार्ग अत्यंत सीधा और सरल (अति सूधो) है। इसमें लेशमात्र (नेकु) भी चतुराई, चालाकी या टेढ़ापन (बाँक) नहीं चलता।
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सच्चे और कपटी का भेद: इस मार्ग पर केवल वही चल सकते हैं जो अपने ‘अहंकार’ (आपनपौ) को त्यागकर पूर्ण सच्चाई के साथ समर्पित होते हैं। जो लोग मन में कपट रखते हैं और शंकाओं से भरे होते हैं, वे इस मार्ग पर चलने से झिझकते हैं (कांपते हैं)।
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एकनिष्ठता का नियम: कवि सुजान को संबोधित करते हुए कहते हैं—हे प्यारे सुजान, सुनो! इस प्रेम के विद्यालय में केवल एक ही अंक (निष्ठा/समर्पण) होता है, यहाँ दूसरा कोई अंक (द्वैत/विकल्प) मान्य नहीं है।
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उपालंभ (व्यंग्य): हे लला (प्रिय)! तुमने न जाने कौन सी ऐसी नई पाठशाला की पट्टी (किताब) पढ़ ली है कि तुम दूसरों का पूरा ‘मन’ (1. हृदय, 2. चालीस सेर का वजन यानी मन भर) तो ले लेते हो, किंतु बदले में एक ‘छटांक’ (1. लेशमात्र भी प्रेम, 2. पचास ग्राम का वजन) भर भी वापस नहीं देते!
विशेष एवं काव्य-सौंदर्य
1. भाव-पक्ष
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रस: विप्रलंभ (वियोग) श्रृंगार रस का अत्यंत मार्मिक और शुद्ध परिपाक।
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प्रेम की पीर: घनानंद का प्रेम बाह्य शारीरिक आकर्षण नहीं, बल्कि आंतरिक पीड़ा, आत्मीय समर्पण और अंतर्मन की वेदना का प्रेम है।
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उपालंभ शैली: उपालंभ (शिकायत/उलाहना) में भी कटुता नहीं, बल्कि अगाध प्रेम और विनयशीलता है।
2. कला-पक्ष (शिल्प-सौंदर्य)
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भाषा: परिष्कृत, मुहावरेदार, कोमलकांत और लक्षणायुक्त ब्रजभाषा।
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छंद योजना: ‘कवित्त’ (मनहरण कवित्त) और ‘सवैया’ छंद का निर्दोष एवं लयात्मक प्रयोग।
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प्रमुख अलंकार:
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श्लेष अलंकार:
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‘घनआनंद’ — 1. आनंद के बादल, 2. कवि घनानंद।
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‘सुजान’ — 1. प्रेयसी सुजान, 2. चतुर व्यक्ति / भगवान कृष्ण।
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‘मन’ — 1. हृदय, 2. 40 सेर (वजन की माप)।
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‘छटाँक’ — 1. थोड़ा सा, 2. वजन की सबसे छोटी इकाई।
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विरोधाभास अलंकार: “मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं” (पूरा मन लेना किंतु छटांक भर भी न देना)।
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अनुप्रास अलंकार: “अधर लगे हैं आनि करि कै पयान प्रान”, “कौलौं अचेत ह्वै कै मौन मति गहौगी”।
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यमक व वक्रोक्ति: काव्यांशों में शब्दों के द्विअर्थी प्रयोग द्वारा भाव-गांभीर्य बढ़ाया गया है।
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