विद्यापति पद ‘देख देख राधा रूप अपार’: सप्रसंग व्याख्या, भावार्थ एवं काव्य-सौंदर्य
मैथिल कोकिल महाकवि विद्यापति के प्रसिद्ध पद “देख देख राधा रूप अपार…” का संदर्भ, प्रसंग, सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ) एवं काव्य-सौंदर्य:
पाठ-परिचय एवं संदर्भ
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रचनाकार: महाकवि विद्यापति
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मूल ग्रंथ: विद्यापति पदावली
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भाषा: मैथिली (सुकोमल एवं संगीतमय पदावली)
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संदर्भ: प्रस्तुत पद विद्यापति द्वारा रचित ‘पदावली’ के रूप-वर्णन (नख-शिख वर्णन) प्रसंग से उद्धृत है।
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केंद्रीय विषय: राधा के अप्रतिम, दिव्य और अलौकिक रूप-सौंदर्य का सजीव चित्रण।
मूल पद
“देख देख राधा रूप अपार।अपूरब के विहि आनि मिलाओल खिति-तल लावणि-सार॥अंगहि अंग अनंग मुरुछायत हेरए से रूप अनेक।छिति-जल-पावक-गगन-समीर सों निरमल काया एक॥अपरूप रूप देखि मधुसूदन हरषित भेल मतिमान।कत कत काम-कला रस-रंजित विद्यापति रस-भान॥”
प्रसंग
श्री कृष्ण (अथवा उनकी कोई सखी) राधा के अनुपम और अद्वितीय शारीरिक सौंदर्य को देखकर विस्मित हो उठते हैं और उनके अलौकिक लावण्य का गुणगान करते हैं।
सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)
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अलौकिक लावण्य का दर्शन: कवि कहते हैं—हे सखियों! राधा के उस अपार और असीम रूप-सौंदर्य को देखो। विधाता (विहि) ने पृथ्वी लोक (खिति-तल) के संपूर्ण सौंदर्य और लावण्य के सार (तत्व) को लाकर इस एक अपूर्व सुंदरी की रचना में मिला दिया है।
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कामदेव का मूर्छित होना: राधा का रूप इतना अधिक मोहक और मनोहारी है कि उनके एक-एक अंग के अनुपम लावण्य को देखकर साक्षात कामदेव (अनंग) भी स्वयं सुध-बुध खोकर मूर्छित हो जाते हैं।
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निर्मल काया का रहस्य: सामान्यतः मानव शरीर पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु) के स्थूल मेल से बनता है, किंतु राधा का शरीर ऐसा लगता है मानो इन सभी तत्वों के केवल निर्मल, शुद्ध और पवित्र अंश से ही गढ़ा गया हो; उसमें कोई भी स्थूल या मलिन विकार नहीं है।
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श्री कृष्ण का मुग्ध होना: राधा के इस अद्वितीय और अप्रतिम रूप को देखकर स्वयं परम ज्ञानी व चतुर श्री कृष्ण (मधुसूदन) भी आनंद और विस्मय से प्रफुल्लित हो उठते हैं।
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कवि की अनुभूति: विद्यापति कहते हैं कि राधा का यह दिव्य रूप कामदेव की समस्त कलाओं और रसों से अभिसिंचित है, जिसे देखकर भक्त और रसिक जन रस-विभोर हो जाते हैं।
विशेष एवं काव्य-सौंदर्य
1. भाव-पक्ष
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रस: संयोग श्रृंगार रस और अद्भुत रस (अलौकिक सौंदर्य से उत्पन्न विस्मय) का सुंदर परिपाक।
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सौंदर्य की पराकाष्ठा: कवि ने राधा के सौंदर्य को केवल भौतिक न मानकर उसे प्रकृति के समस्त सौंदर्य का चरम ‘सार’ माना है।
2. कला-पक्ष (शिल्प-सौंदर्य)
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भाषा: कोमलकांत, मधुर और गेय मैथिली भाषा।
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शैली: परंपरागत नख-शिख एवं रूप-वर्णन की पद-शैली।
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प्रमुख अलंकार:
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अतिशयोक्ति अलंकार: कामदेव का राधा के अंगों के सौंदर्य को देखकर मूर्छित होना।
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अनुप्रास अलंकार: “देख देख राधा रूप अपार”, “खिति-तल लावणि-सार”, “अंगहि अंग अनंग”।
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पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार: “देख देख”, “कत कत”।
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पद-मैत्री व संगीतात्मकता: संपूर्ण पद राग-रागिनियों पर गाने योग्य (गेय) है।
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