देवसेना का गीत और कार्नेलिया का गीत व्याख्या और काव्य-सौंदर्य

 देवसेना का गीत और कार्नेलिया का गीत प्रसिद्ध कविता का संदर्भ, प्रसंग, व्याख्या और काव्य-सौंदर्य

1. देवसेना का गीत
  • स्रोत: नाटक स्कंदगुप्त (अंक 5, दृश्य 6)
  • संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित नाटक ‘स्कंदगुप्त’ से उद्धृत हैं, जो अंतरा भाग-2 में ‘देवसेना का गीत’ शीर्षक के अंतर्गत संकलित हैं।
  • प्रसंग: मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन देवसेना जीवन भर स्कंदगुप्त से प्रेम करती रही, किंतु स्कंदगुप्त धनकुबेर की कन्या विजया का स्वप्न देखते रहे। जीवन के अंतिम पड़ाव में जब स्कंदगुप्त प्रणय-निवेदन करते हैं, तब देवसेना उसे ठुकरा देती है और अपने आंसुओं, संघर्षों व वेदना भरे अतीत को याद करते हुए यह गीत गाती है।
काव्यांश 1:
“आह! वेदना मिली विदाई!
मैंने भ्रम-वश जीवन संचित,
मधुकरियों की भीख लुटाई।
छलछल थे संध्या के श्रमकण,
आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण।
मेरी यात्रा पर लेती थी,
नीरवता अनंत अँगड़ाई।”
व्याख्या:
देवसेना अत्यंत दुखी मन से कहती है कि जीवन की इस संध्या-वेला (अंतिम पड़ाव) में मुझे केवल पीड़ा और विदाई ही मिली। मैंने भ्रमवश (कि स्कंदगुप्त मुझे मिलेंगे) जीवन भर की संचित अभिलाषाओं और आशाओं की ‘मधुकरी’ (भीख) को लुटा दिया। अर्थात अपने प्रेम की रक्षा न कर सकी। जिस प्रकार दिनभर थके-हारे व्यक्ति के माथे से पसीना बहता है, उसी प्रकार मेरी जीवन-संध्या में आंसुओं की अविरल धारा बह रही है। इस एकाकी जीवन यात्रा में केवल ‘नीरवता’ (गंभीर सन्नाटा) ही मेरी साथी बनकर साथ चल रही है।
काव्यांश 2:
“श्रमित स्वप्न की मधुमाया में,
गहन-विपिन की तरु-छाया में,
पथिक उनींदी श्रुति में किसने,
यह विहाग की तान उठाई?
लगी तृषा-मय दीठि थी सबकी,
रही बचाए फिरती कब की,
मेरी आशा आह! बावली,
तूने खो दी सकल कमाई।”
व्याख्या:
देवसेना कहती है कि जब थका हुआ यात्री घने जंगल में पेड़ की छाया में आधी नींद में विश्राम कर रहा हो, तब कोई उसे आधी रात का ‘विहाग’ राग सुनाकर जगा दे, तो कैसा लगेगा? स्कंदगुप्त का अंतिम समय में आया प्रणय-निवेदन इसी बेमौसम के विहाग जैसा है, जो उसकी सोई हुई वेदना को जगा रहा है। वह कहती है कि जीवन भर तृष्णामयी (लोभी) नजरें उस पर लगी रहीं और वह अपनी अस्मिता व शील की रक्षा करती रही, किंतु उसकी पगली आशा ने अपने ही हाथों जीवन भर की तपस्या व पूंजी खो दी।
काव्यांश 3:
“चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर,
प्रलय चल रहा अपने पथ पर,
मैं कमज़ोर पद-बल से उसपर,
हारी-होड़ लगाई।
लौटा लो यह अपनी थाती,
मेरी करुणा हा-हा खाती,
विश्व! न सँभलेगी यह मुझसे,
इससे मन की लाज गँवाई।”
व्याख्या:
देवसेना कहती है कि दुख और विनाश (प्रलय) मेरे जीवन-रथ पर सवार होकर निरंतर आगे बढ़ रहा है। यद्यपि मेरे पैर दुर्बल हैं और मेरी पराजय निश्चित है, फिर भी मैं पूरी दृढ़ता से उस प्रलय से होड़ (मुकाबला) कर रही हूँ। अंत में वह संसार (विश्व) को संबोधित कर कहती है कि इस प्रेम की धरोहर (थाती) को वापस ले लो, क्योंकि अब मेरी करुणा भी त्राहि-त्राहि कर रही है। यह प्रणय-भार मुझसे नहीं संभलेगा, इसी के कारण मैंने अपने मन की लाज तक गंवा दी है।
विशेष (देवसेना का गीत):
  • रस: वियोग (विप्रलंभ) श्रृंगार एवं करुण रस का मार्मिक समन्वय।
  • भाषा: तत्समप्रधान, प्रवाहमयी एवं परिष्कृत खड़ी बोली।
  • शैली: छायावादी लाक्षणिकता एवं आत्मपरक (गीति) शैली।
  • अलंकार:
    • मानवीकरण अलंकार: “नीरवता अनंत अँगड़ाई”, “प्रलय चल रहा अपने पथ पर”।
    • रूपक अलंकार: “जीवन-रथ”, “मधुकरियों की भीख”।
    • पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार: “छलछल”, “हा-हा”।
    • उपमा अलंकार: “आँसू-से गिरते थे”।
  • राग: ‘विहाग’ का उल्लेख आधी रात के वियोगी वातावरण को पुष्ट करता है।
2. कार्नेलिया का गीत
  • स्रोत: नाटक चंद्रगुप्त (अंक 1, दृश्य 2)
  • संदर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ऐतिहासिक नाटक ‘चंद्रगुप्त’ से ली गई हैं, जो पाठ्यपुस्तक में ‘कार्नेलिया का गीत’ शीर्षक से संकलित हैं।
  • प्रसंग: ग्रीक सेनापति सेल्यूकस की पुत्री ‘कार्नेलिया’ सिंधु नदी के किनारे ग्रीक शिविर के पास बैठी है। भारत की अलौकिक प्राकृतिक सुषमा, शांति और उदार संस्कृति से मुग्ध होकर वह भारत भूमि के गौरव व सौंदर्य का गान करती है।
काव्यांश 1:
“अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।
सरल तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा।”
व्याख्या:
कार्नेलिया भारत की महिमा गाते हुए कहती है कि यह हमारा भारत देश लालिमायुक्त (सूर्य की प्रथम किरणों से मंडित) और माधुर्य/आनंद से भरा हुआ है। यह ऐसा दयालु देश है जहाँ दूर-दराज और अनजान क्षितिज (दिशाओं) से आने वाले शरणार्थियों व परदेशियों को भी सहारा मिलता है। प्रातःकाल कमल के खिले हुए पत्तों पर सूर्य की मनोहर आभा चमकती है और वृक्षों की चोटियों पर थिरकती हुई प्रतीत होती है। चारों ओर फैली हरी-भरी प्रकृति पर सूर्य की लाल किरणें ऐसी लग रही हैं मानो किसी ने मंगलकारी कुमकुम बिखेर दिया हो।
काव्यांश 2:
“लघु सुरधनु-से पंख पसारे,
शीतल मलय समीर सहारे,
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए,
नीड़ समझ प्यारे।
बरसाती आँखों के बादल,
बनते जहाँ भरे करुणा-जल,
लहरें टकरातीं अनंत की,
पाकर जहाँ किनारा।”
व्याख्या:
मलय पर्वत से आने वाली शीतल-मंद सुगंधित हवा के सहारे, इंद्रधनुष जैसे छोटे-छोटे रंग-बिरंगे पंखों को फैलाकर पक्षी भी जिस दिशा में मुंह करके उड़ते हैं, वह भारत ही है, जिसे वे अपना प्यारा घोंसला (घर) समझते हैं। यहाँ के लोगों के हृदय में करुणा और सहानुभूति का भाव इतना गहरा है कि दूसरों के दुख को देखकर उनकी आँखों से करुणा रूपी अश्रुधारा (बादल बनकर) बरस पड़ती है। अथाह और विशाल सागर की लहरें भी यहाँ के तटों से टकराकर मानों विश्राम और किनारा पाती हैं।
काव्यांश 3:
“हेम कुंभ ले उषा सवेरे,
भरती ढुलकाती सुख मेरे,
मदिर ऊँघते रहते जब,
जगकर रजनी-भर तारा।”
व्याख्या:
कार्नेलिया रूपक बांधते हुए कहती है कि जब रात भर जगने के बाद आकाश में तारे मस्ती में ऊंघते (छिपते) हुए दिखाई देते हैं, तब उषा (प्रातःकाल) रूपी सुंदरी आकाश में सुनहला घट (सूर्य रूपी सोने का घड़ा) लेकर आती है और भारतवासियों के ऊपर सुख-समृद्धि रूपी जल बिखेर/उड़ेल देती है। अर्थात यहाँ का हर प्रभात सुख और आनंद का संचार करता है।
विशेष (कार्नेलिया का गीत):
  • रस: शांत रस एवं देशप्रेम/अद्भुत रस का संगम।
  • भाषा: संस्कृतनिष्ठ, तत्समप्रधान, मधुर एवं संगीतमय खड़ी बोली।
  • शैली: छायावादी चित्रात्मक और बिंबप्रधान शैली।
  • अलंकार:
    • मानवीकरण अलंकार: “हेम कुंभ ले उषा सवेरे…”, “नाच रही तरुशिखा मनोहर”, “तारे मदिर ऊँघते”।
    • उपमा अलंकार: “लघु सुरधनु-से पंख पसारे”।
    • रूपक अलंकार: “मंगल कुंकुम”, “करुणा-जल”, “हेम-कुंभ”।
  • भाव-सौंदर्य: भारत की सार्वभौमिक शरणस्थली और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना का अत्यंत सजीव चित्रण।

बोर्ड परीक्षा एवं प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से ‘देवसेना का गीत’ और ‘कार्नेलिया का गीत’ से पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके सटीक उत्तर:

भाग 1: ‘देवसेना का गीत’ (स्कंदगुप्त नाटक से)
प्रश्न 1: “मैंने भ्रम-वश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई।” — इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
  • उत्तर:
    • भाव: देवसेना जीवन भर इस भ्रम में जीती रही कि स्कंदगुप्त उसे प्रेम करते हैं और एक दिन उसे अपनी जीवन संगिनी बनाएंगे।
    • इसी आशा और भ्रम में उसने अपने पूरे जीवन की अभिलाषाओं, सुखों और संचित भावनाओं रूपी ‘मधुकरी’ (भिक्षा स्वरूप जोड़ी गई पूंजी) को न्योछावर कर दिया।
    • जब अंतिम समय में उसे यह ज्ञात हुआ कि स्कंदगुप्त का प्रेम केवल एक भ्रम था, तो उसे लगा कि उसने अपने जीवन की पूरी कमाई व्यर्थ ही लुटा दी।
प्रश्न 2: कवि ने ‘विहाग’ राग का उल्लेख किस संदर्भ में किया है और क्यों?
  • उत्तर:
    • ‘विहाग’ अर्धरात्रि के समय गाया जाने वाला एक वियोग प्रधान राग है।
    • जीवन के अंतिम पड़ाव में जब देवसेना वृद्ध पर्णदत्त के आश्रम में अपनी पीड़ा को भुलाकर विश्राम पाना चाहती है, तब स्कंदगुप्त आकर उससे विवाह का प्रस्ताव रखते हैं।
    • यह बेसमय आया प्रणय-निवेदन देवसेना को उसी तरह कष्ट पहुँचाता है, जैसे आधी रात में किसी थके हुए सोए पथिक को कोई ‘विहाग’ राग गाकर जगा दे और उसकी पीड़ा बढ़ा दे।
प्रश्न 3: “लौटा लो यह अपनी थाती… विश्व! न सँभलेगी यह मुझसे” — यहाँ ‘थाती’ किसे कहा गया है और देवसेना उसे क्यों लौटाना चाहती है?
  • उत्तर:
    • ‘थाती’ का अर्थ: यहाँ ‘थाती’ (धरोहर) संसार और स्कंदगुप्त द्वारा दी गई प्रेम-वेदना व स्मृतियों को कहा गया है।
    • लौटाने का कारण: देवसेना अब पूर्णतः टूट चुकी है। उसका मानसिक और शारीरिक संबल समाप्त हो चुका है। वह कहती है कि इस प्रेम की धरोहर को संभालते-संभालते उसने अपनी लोक-लाज और जीवन की सारी ऊर्जा खो दी है। अब उसमें इस असहनीय विरह-भार को ढोने की शक्ति नहीं बची है।
प्रश्न 4: “हारी-होड़ लगाई” में निहित संघर्ष को स्पष्ट कीजिए।
  • उत्तर:
    • देवसेना जानती है कि ‘प्रलय’ (दुख, निराशा और मृत्यु) अत्यंत बलवान है और उसके अपने पैर दुर्बल (कमज़ोर पद-बल) हैं।
    • अपनी निश्चित पराजय जानते हुए भी वह भाग्य और दुखों के आगे घुटने नहीं टेकती, बल्कि डटकर मुकाबला करती है। यह पंक्ति देवसेना के अदम्य साहस, आत्मसम्मान और संघर्षशीलता का प्रतीक है।
भाग 2: ‘कार्नेलिया का गीत’ (चंद्रगुप्त नाटक से)
प्रश्न 5: “जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।” — इस पंक्ति के माध्यम से कवि भारत की किस विशेषता को उजागर करता है?
  • उत्तर:
    • इस पंक्ति के माध्यम से कवि जयशंकर प्रसाद ने भारत की उदारता, शरणागत-वत्सलता और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की उदात्त परंपरा को रेखांकित किया है।
    • भारत केवल अपनों को ही नहीं, बल्कि संसार के किसी भी कोने से भटककर आने वाले अपरिचितों, पीड़ितों और आश्रयहीनों को भी बिना किसी भेदभाव के प्रेम और आश्रय प्रदान करता है।
प्रश्न 6: उड़ते हुए पक्षियों की उपमा के माध्यम से भारत की किस छवि को प्रस्तुत किया गया है?
  • उत्तर:
    • कार्नेलिया देखती है कि मलय पर्वत की सुगंधित हवा के सहारे इंद्रधनुष जैसे पंख फैलाए पक्षी भारत की दिशा में ही उड़ रहे हैं।
    • इसका प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि जिस प्रकार पक्षी दिनभर भटकने के बाद अपने सुरक्षित घोंसले (नीड़) की ओर लौटते हैं, उसी प्रकार पूरे विश्व के थके-हारे लोगों के लिए भारत एक सुरक्षित और शांतिदायक ‘आश्रय स्थल’ (घर) के समान है।
प्रश्न 7: “बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा-जल” — पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
  • उत्तर:
    • आशय: भारतवासियों के हृदय में करुणा, दया और आत्मीयता का भाव कूट-कूट कर भरा है।
    • यहाँ के लोग दूसरों के दुख-दर्द और पीड़ा को देखकर इतने द्रवित हो जाते हैं कि उनकी आँखों से बहने वाले आँसू बादलों से बरसने वाले जल की तरह दूसरों के संताप को हर लेते हैं। यह भारत की संवेदनशीलता को दर्शाता है।
प्रश्न 8: “हेम कुंभ ले उषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे” — इस पंक्ति में निहित काव्य-सौंदर्य और अलंकार स्पष्ट कीजिए।
  • उत्तर:
    • भाव-सौंदर्य: प्रातःकालीन सूर्योदय का अत्यंत मनोहारी दृश्य प्रस्तुत किया गया है। प्रभात वेला भारत भूमि पर सुख, समृद्धि और नवजीवन का संचार करती है।
    • शिल्प-सौंदर्य / अलंकार:
      • मानवीकरण अलंकार: उषा (प्रातःकाल) को एक सुंदरी के रूप में चित्रित किया गया है जो सोने का घड़ा लेकर सुख बिखेरती है।
      • रूपक अलंकार: ‘हेम कुंभ’ (स्वर्ण कलश = सूर्य) और ‘सुख’ को जल रूप में कल्पित किया गया है।
      • चित्रात्मक बिंब: उषा, तारे और स्वर्ण घट का अत्यंत सजीव दृश्य बिंब निर्मित होता है।
भाग 3: तुलनात्मक एवं शिल्प-सौंदर्य संबंधी प्रश्न
तुलना बिंदु ‘देवसेना का गीत’ ‘कार्नेलिया का गीत’
मूल भाव / विषय व्यक्तिगत विरह-वेदना, नैराश्य और त्याग राष्ट्र-गौरव, प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक उदारता
नाटकीय संदर्भ ‘स्कंदगुप्त’ नाटक (अंक 5, दृश्य 6) ‘चंद्रगुप्त’ नाटक (अंक 1, दृश्य 2)
प्रमुख रस वियोग श्रृंगार एवं करुण रस शांत, अद्भुत एवं देशप्रेम का रस
पात्र की मनोदशा जीवन संघर्ष से थकी हुई, आत्ममंथन करती नायिका भारत की प्रकृति पर मुग्ध, उल्लासित विदेशी पात्र
भाषा-शैली तत्समप्रधान, लाक्षणिक गीति-शैली बिंबप्रधान, चित्रात्मक और संगीतमय खड़ी बोली

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