विलायत में दादाभाई नौरोजी को ‘काला’ कहे जाने पर बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ की काव्य-पंक्तियाँ

दादाभाई नौरोजी पर बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ की ऐतिहासिक काव्य-टिप्पणी

ब्रिटिश संसद (हाउस ऑफ कॉमन्स) के चुनाव (1892 ई.) के दौरान ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री लॉर्ड सैलिसबरी (Lord Salisbury) ने दादाभाई नौरोजी के लिए नस्लभेदी टिप्पणी करते हुए उन्हें “काला आदमी” (Black Man) कहा था। इस अपमानजनक वक्तव्य पर भारतेंदु युगीन प्रमुख साहित्यकार व राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ ने गहरा क्षोभ व्यक्त करते हुए अपनी प्रसिद्ध काव्य-पंक्तियाँ लिखीं:

“अचरज होत तुम्हहुँ सम गोरे बाजत कारे।

तासों कारे ‘कारे’ सब्दहु पर हैं वारे।

कारे काम, राम, जलधर जल-बरसन-वारे।

कारे लागत ताही सों कारन को प्यारे।

यातें नीको है तुम ‘कारे’ जाहु पुकारे।

यहै असीस देत तुमको मिलि हम सब कारे।

सफल होहि मन के सबही संकल्प तुम्हारे।”

काव्य-पंक्तियों का संदर्भ एवं भावार्थ

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: दादाभाई नौरोजी ब्रिटिश संसद के ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ के लिए निर्वाचित होने वाले प्रथम भारतीय व एशियाई थे (फिंसबरी सेंट्रल सीट से लिबरल पार्टी के सांसद)। चुनाव प्रचार के दौरान जब अंग्रेजों द्वारा उनके रंग पर टिप्पणी की गई, तो संपूर्ण भारत में इसके विरुद्ध रोष उत्पन्न हुआ।

  • पंक्तिवार विस्तृत भावार्थ:

    • “अचरज होत तुम्हहुँ सम गोरे बाजत कारे।”

      अर्थ: कवि दादाभाई नौरोजी को संबोधित करते हुए कहते हैं कि बड़ा आश्चर्य होता है कि आप जैसे पवित्र, विद्वान और हृदय से उज्ज्वल व्यक्ति को भी वे गोरे (अंग्रेज) ‘काला’ कह रहे हैं। अर्थात् मन और चरित्र की शुचिता के सामने उनका यह रंगभेद अत्यंत हास्यास्पद और आश्चर्यजनक है।

    • “तासों कारे ‘कारे’ सब्दहु पर हैं वारे।”

      अर्थ: यदि वे आपको ‘काला’ कहते हैं, तो हम भारतवासी इस ‘काले’ शब्द और इस रंग पर ही न्योछावर को तैयार हैं। हमारे लिए ‘काला’ शब्द किसी हीनता का नहीं, बल्कि गौरव और पूज्यता का प्रतीक है।

    • “कारे काम, राम, जलधर जल-बरसन-वारे।”

      अर्थ: कवि काले रंग की पावनता और महानता का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि—

      • प्रेम व सौंदर्य के देवता कामदेव (या भगवान श्रीकृष्ण/श्याम) का स्वरूप भी श्याम (काला) है।

      • मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का स्वरूप भी मेघ-वर्ण (सांवला/काला) है।

      • समस्त धरती की प्यास बुझाने वाले और जीवन देने वाले जल से भरे बादल (जलधर/मेघ) भी काले ही होते हैं।

    • “कारे लागत ताही सों कारन को प्यारे।”

      अर्थ: चूँकि हमारे आराध्य देव (राम-कृष्ण) और जीवनदाता बादल सभी श्याम वर्ण के हैं, इसीलिए ‘काले’ लोग सबको स्वाभाविक रूप से अत्यंत प्रिय और आदरणीय लगते हैं।

    • “यातें नीको है तुम ‘कारे’ जाहु पुकारे।”

      अर्थ: इसलिए यह बहुत अच्छा और गर्व की बात है कि वे गोरे आपको ‘काला’ कहकर पुकार रहे हैं। यह कोई अपमान नहीं, बल्कि उस महान परंपरा और दिव्यता से जुड़ना है।

    • “यहै असीस देत तुमको मिलि हम सब कारे। सफल होहि मन के सबही संकल्प तुम्हारे।”

      अर्थ: अंत में कवि कहते हैं कि हम समस्त भारतवासी (जिन्हें वे गोरे ‘काला’ समझते हैं) मिलकर आपको यही आशीर्वाद और शुभकामनाएँ देते हैं कि देशहित और न्याय के लिए आपके मन में जो भी संकल्प हैं, वे सभी पूर्ण व सफल हों।

  • साहित्यिक व राष्ट्रीय महत्त्व: यह प्रसंग भारतेंदु युगीन कवियों की प्रखर राष्ट्रीय चेतना, साम्राज्यवाद-विरोधी रुख और भारतीय स्वाभिमान की सशक्त अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है।

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