श्रम विभाजन और जाति-प्रथा / मेरी कल्पना का आदर्श-समाज विस्तृत पाठ-सार एवं प्रमुख वैचारिक बिंदु

श्रम विभाजन और जाति-प्रथा / मेरी कल्पना का आदर्श-समाज

  • लेखक: बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर
  • मूल रचना: ‘एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ (Annihilation of Caste, 1936)
  • हिंदी रूपांतर: ललई सिंह यादव (शीर्षक: ‘जाति-भेद का उच्छेद’)
  • ऐतिहासिक संदर्भ: यह भाषण ‘जाति-पाँति तोड़क मंडल’ (लाहौर) के 1936 के वार्षिक सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण हेतु लिखा गया था। क्रांतिकारी विचारों से आयोजकों की असहमति के कारण सम्मेलन स्थगित हुआ और बाद में इसे स्वतंत्र पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया गया
पाठ का उद्देश्य
  • जाति-आधारित श्रम-विभाजन का तार्किक खंडन: आधुनिक समाज में जातिवाद के पोषकों द्वारा दिए जाने वाले इस तर्क को खारिज करना कि जाति-प्रथा कार्यकुशलता के लिए आवश्यक श्रम-विभाजन है। लेखक यह सिद्ध करते हैं कि यह व्यवस्था काम का बँटवारा नहीं, बल्कि ‘श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन’ और उनके बीच ऊँच-नीच की खाई पैदा करती है
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता और रुचि की प्रतिष्ठा: मनुष्य को अपनी स्वाभाविक रुचि, योग्यता और क्षमता के अनुसार पेशा चुनने की पूरी स्वतंत्रता की वकालत करना
  • आर्थिक व सामाजिक विषमता को उजागर करना: यह स्पष्ट करना कि जन्म आधारित पूर्वनिर्धारित पेशा बदलने की छूट न मिलने के कारण जाति-प्रथा भारत में प्रत्यक्ष बेरोजगारी और भुखमरी को जन्म देती है
  • समतामूलक लोकतंत्र की स्थापना: एक ऐसे समाज की रूपरेखा प्रस्तुत करना जहाँ स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व (भाईचारा) वास्तविक रूप से स्थापित हों और लोकतंत्र केवल चुनावी शासन पद्धति न रहकर ‘सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति’ बने

1. पाठ की मूल संवेदना

  • मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय: पाठ की मूल संवेदना मनुष्य की व्यक्तिगत गरिमा, आत्म-सम्मान और सामाजिक न्याय पर टिकी है। जन्म या वंश परंपरा के आधार पर मिलने वाले विशेषाधिकारों को समाप्त कर प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के विकास का समान अवसर मिलना चाहिए
  • मानसिक और सामाजिक मुक्ति: लेखक का मानना है कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है जब तक सामाजिक दासता का पूर्ण उन्मूलन न हो। जबरन थोपे गए काम से व्यक्ति में अरुचि और काम टालने की प्रवृत्ति आती है, जिससे उसकी आंतरिक प्रेरणा और आत्म-शक्ति कुंद हो जाती है
  • सह-अस्तित्व और आत्मीय भाईचारा: समाज जड़ नहीं बल्कि गतिशील होना चाहिए, जिसमें सभी वर्गों के हित एक-दूसरे से जुड़े हों। दूध और पानी के अटूट मिश्रण की तरह सामाजिक समरसता और परस्पर श्रद्धा-सम्मान का भाव ही इस पाठ की केंद्रीय संवेदना है

2. विस्तृत पाठ-सार एवं प्रमुख वैचारिक बिंदु

भाग-1: श्रम विभाजन और जाति-प्रथा

  1. जातिवाद के समर्थन का खंडन:
    • जातिवाद के पोषक इसे ‘कार्य-कुशलता’ के लिए आवश्यक ‘श्रम विभाजन’ कहकर उचित ठहराते हैं
    • लेखक का तर्क: जाति-प्रथा केवल श्रम का विभाजन नहीं करती, बल्कि यह ‘श्रमिक-विभाजन’ (मजदूरों का अस्वाभाविक बँटवारा) भी करती है
    • यह व्यवस्था श्रमिकों को विभिन्न श्रेणियों में बाँटकर उनके बीच ऊँच-नीच का अस्वाभाविक भेद स्थापित करती है, जो विश्व के किसी अन्य समाज में नहीं मिलता
  2. अस्वाभाविक विभाजन -व्यक्तिगत रुचि की उपेक्षा:
    • श्रम विभाजन स्वाभाविक तब होता है जब वह व्यक्ति की रुचि, योग्यता व क्षमता पर आधारित हो
    • जाति-प्रथा में व्यक्ति के प्रशिक्षण या निजी क्षमता को अनदेखा कर माता-पिता के सामाजिक स्तर के आधार पर गर्भधारण के समय ही पेशा तय कर दिया जाता है
  3. बेरोजगारी और भुखमरी का प्रत्यक्ष कारण:
    • आधुनिक युग में तकनीक और उद्योगों में तेजी से परिवर्तन होते हैं
    • हिंदू समाज की जाति-प्रथा मनुष्य को पैतृक पेशा बदलने की अनुमति नहीं देती, भले ही वह अन्य कार्य में पारंगत हो
    • विपरीत परिस्थितियों में पेशा बदलने की छूट न मिलने से यह प्रथा भारत में बेरोजगारी और भुखमरी का प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनती है
  4. आर्थिक व मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव:
    • अरुचिपूर्ण एवं थोपे गए काम में व्यक्ति का न दिल लगता है और न दिमाग
    • इससे मनुष्य में काम टालने और कम काम करने की प्रवृत्ति पैदा होती है
    • अतः आर्थिक दृष्टि से भी जाति-प्रथा अत्यंत हानिकारक है क्योंकि यह व्यक्ति की आंतरिक प्रेरणा और आत्म-शक्ति को कुंद कर देती है

भाग-2: मेरी कल्पना का आदर्श-समाज

लेखक का आदर्श समाज फ्रांसीसी क्रांति के तीन मूल सिद्धांतों पर आधारित है: स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता (बंधुत्व)
  1. भ्रातृता (बंधुत्व/भाईचारा) एवं लोकतंत्र:
    • समाज में इतनी गतिशीलता होनी चाहिए कि कोई भी उपयोगी परिवर्तन समाज के एक सिरे से दूसरे सिरे तक आसानी से पहुँच सके
    • सभी सदस्यों के हितों में सबकी सहभागिता होनी चाहिए
    • भाईचारे का वास्तविक स्वरूप ‘दूध और पानी के मिश्रण’ की तरह होना चाहिए
    • सच्चा लोकतंत्र: लोकतंत्र केवल शासन की औपचारिक पद्धति नहीं है, बल्कि यह सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है, जिसमें साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव अनिवार्य है
  2. स्वतंत्रता (Liberty):
    • आवागमन, जीवन-रक्षा, शरीर की सुरक्षा, संपत्ति तथा कार्य हेतु आवश्यक औजार व साधन रखने की स्वतंत्रता
    • सबसे महत्वपूर्ण: अपनी क्षमता के अनुसार पेशा चुनने की स्वतंत्रता
    • दासता की व्यापक परिभाषा: दासता केवल कानूनी पराधीनता नहीं है; जब किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा के विरुद्ध दूसरों द्वारा तय किए गए कर्तव्यों व पेशे का पालन करना पड़ता है, तो वह भी दासता है
  3. समता (Equality):
    • मनुष्य तीन कारणों से असमान होते हैं:
      1. शारीरिक वंश-परंपरा
      2. सामाजिक उत्तराधिकार (शिक्षा, पारिवारिक प्रतिष्ठा, ज्ञानार्जन आदि)
      3. मनुष्य के अपने व्यक्तिगत प्रयास
    • न्याय का तकाजा: प्रथम दो आधार (वंश व सामाजिक पृष्ठभूमि) व्यक्ति के वश में नहीं होते, अतः इनके आधार पर समाज द्वारा भेदभाव करना सर्वथा अनुचित है। केवल प्रयासों की भिन्नता पर ही भिन्न व्यवहार स्वीकार्य हो सकता है
    • समाज से अधिकतम उपयोगिता प्राप्त करने के लिए प्रत्येक सदस्य को आरंभ से ही समान अवसर और समान व्यवहार मिलना चाहिए
    • राजनीतिज्ञ की कसौटी: व्यावहारिक रूप से एक राजनीतिज्ञ के पास हर व्यक्ति की अलग-अलग आवश्यकताओं के अनुसार व्यवहार करने का समय नहीं होता, इसलिए सबके साथ समान व्यवहार करना ही एकमात्र व्यावहारिक व मानवीय सिद्धांत है

3. पाठ में आए कठिन एवं विशिष्ट शब्दों के अर्थ

शब्द अर्थ
विडंबना
उपहास का विषय / दुर्भाग्यपूर्ण बात / विसंगति
पोषक
समर्थन करने वाले / बढ़ावा देने वाले
श्रम विभाजन
काम का बँटवारा
श्रमिक-विभाजन
काम करने वाले मजदूरों का आपस में बँटवारा
अस्वाभाविक
जो प्राकृतिक या स्वाभाविक न हो / कृत्रिम
पैतृक पेशा
पूर्वजों (माता-पिता/कुल) से चला आ रहा खानदानी काम-धंधा
पारंगत
निपुण / कुशल / माहिर
पूर्व लेख
भाग्य / पहले से लिखा हुआ
दुर्भावना
बुरी भावना / दुर्भाव
टालू काम
बेमन से किया जाने वाला काम / काम से जी चुराना
आत्म-शक्ति
भीतरी शक्ति / आत्मबल
भ्रातृता
भाईचारा / बंधुत्व (Fraternity)
गतिशीलता
बदलाव या प्रवाह को स्वीकार करने की क्षमता (Mobility)
बहुविध
अनेक प्रकार के / विविध
अबाध
बिना किसी रुकावट या बाधा के
गमनागमन
आना-जाना / विचरण
जीविकोपार्जन
आजीविका कमाना / रोजी-रोटी का प्रबंध
पराधीनता
गुलामी / दूसरों के अधीन होना
नियामक
नियम तय करने वाला / नियंत्रणकारी सिद्धांत
सामाजिक उत्तराधिकार
समाज व परिवार से प्राप्त ज्ञान, संस्कार, प्रतिष्ठा व साधन
तकाज़ा
माँग / तार्किक आवश्यकता
व्यवहार्य
व्यवहार में लाने योग्य / व्यावहारिक (Practical)

4. मुख्य परीक्षा-उपयोगी प्रश्नोत्तर सारांश

  • प्रश्न: जाति-प्रथा को श्रम विभाजन का रूप क्यों नहीं माना जा सकता?
    उत्तर: क्योंकि यह विभाजन मनुष्य की स्वाभाविक रुचि व क्षमता पर आधारित न होकर जन्म और माता-पिता के सामाजिक स्तर पर आधारित होता है तथा श्रमिकों को ऊँच-नीच के वर्गों में विभाजित करता है
  • प्रश्न: लेखक ने ‘दासता’ की क्या विस्तृत परिभाषा दी है?
    उत्तर: दासता केवल कानूनी गुलामी नहीं है, बल्कि जब किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा के विरुद्ध दूसरों द्वारा निर्धारित आचरण, नियम और पेशे को अपनाने के लिए विवश किया जाता है, तो वह स्थिति भी दासता कहलाती है
  • प्रश्न: ‘समता’ को काल्पनिक मानते हुए भी आंबेडकर इसे व्यवहार्य क्यों मानते हैं?
    उत्तर: यद्यपि जन्म और पृष्ठभूमि से सभी मनुष्य समान नहीं होते, फिर भी एक न्यायपूर्ण समाज और कुशल राजनीतिज्ञ के लिए सभी नागरिकों को अपनी क्षमताओं के पूर्ण विकास हेतु समान अवसर व समान व्यवहार देना ही एकमात्र व्यावहारिक व मानवीय मार्ग है

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