सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की ‘गीत गाने दो मुझे’ और ‘सरोज स्मृति’ की सप्रसंग व्याख्या

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की ‘गीत गाने दो मुझे’ और ‘सरोज स्मृति’ की सप्रसंग व्याख्या

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की अंतरा (भाग-2) में संकलित दोनों रचनाओं—‘गीत गाने दो मुझे’ और ‘सरोज स्मृति’—का संदर्भ, प्रसंग, प्रमुख काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या, विशेष एवं मूलभाव:
1. गीत गाने दो मुझे
  • मूल काव्य संग्रह: अर्चना (1950)
  • संदर्भ: प्रस्तुत कविता छायावाद और प्रगतिवाद के प्रमुख कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित काव्य-संग्रह ‘अर्चना’ से उद्धृत है।
  • प्रसंग: कवि ने निरंतर संघर्षों, सामाजिक उपेक्षा, आत्मीयों के वियोग और जीवन की विषमताओं से उत्पन्न गहरी वेदना को कम करने के लिए गीत गाने की इच्छा व्यक्त की है।
काव्यांश 1:
“गीत गाने दो मुझे तो,
वेदना को रोकने को।
चोट खाकर राह चलते
होश के भी होश छूटे,
हाथ जो पाथेय थे, ठग-
ठाकुरों ने रात लूटे,
कंठ रुकता जा रहा है,
आ रहा है काल देखो।”
व्याख्या:
कवि कहते हैं कि मेरे जीवन में पीड़ा इतनी बढ़ गई है कि उसे सहने और रोकने के लिए मुझे गीत गाने दो, ताकि मन की व्यथा कुछ हल्की हो सके। जीवन-पथ पर संघर्षों की इतनी चोटें पड़ी हैं कि होशमंद लोगों के भी होश उड़ गए हैं। जीवन जीने के जो संबल या साधन (पाथेय) मेरे पास थे, उन्हें समाज के शोषक और छली प्रभुत्वशाली वर्ग (‘ठग-ठाकुरों’) ने धोखे से लूट लिया है। घोर निराशा और मृत्यु-तुल्य कष्टों के कारण मेरा गला रुंध रहा है और सामने प्रत्यक्ष मृत्यु (काल) खड़ी दिखाई दे रही है।
काव्यांश 2:
“भर गया है ज़हर से संसार जैसे हार खाकर,
देखते हैं लोग लोगों को, सही परिचय न पाकर,
बुझ गई है लौ प्रथा की,
जल उठो फिर सींचने को।”
व्याख्या:
कवि के अनुसार पूरा संसार निराशा, पराजय और अविश्वास के विष से भर गया है। मनुष्यता समाप्त हो रही है, लोग एक-दूसरे को अजनबियों व शंका की दृष्टि से देख रहे हैं। जीवन की जो जिजीविषा और मानवीय मूल्यों की लौ (प्रथा/पृथ्वी की जीवन-ज्योति) बुझ चुकी है, उसे पुनः प्रज्वलित करने के लिए कवि स्वयं को और समाज को आत्म-बलिदान देकर संघर्ष करने का आह्वान करते हैं।
विशेष (गीत गाने दो मुझे):
  • रस: करुण एवं ओज/उत्साह का अंतर्द्वंद्व।
  • भाषा: शुद्ध, तत्समप्रधान, प्रवाहमयी एवं तुकांत खड़ी बोली।
  • अलंकार:
    • रूपक अलंकार: ‘ठग-ठाकुर’ (शोषक वर्ग), ‘लौ प्रथा की’।
    • मुहावरेदार प्रयोग: ‘होश के होश छूटना’।
  • मूलभाव व उद्देश्य: निराशा और घोर शोषण के बीच भी जीने की अदम्य इच्छा (जिजीविषा) को जगाना और बुझती हुई मानवीय चेतना में नए प्राण फूंकना।
2. सरोज स्मृति
  • मूल काव्य संग्रह: अनामिका (द्वितीय संस्करण, 1938)
  • महत्व: यह हिंदी साहित्य का प्रथम एवं सर्वश्रेष्ठ ‘शोक-गीत’ (Elegy) माना जाता है।
  • संदर्भ: यह अंश निराला की असमय दिवंगत अठारह वर्षीय पुत्री ‘सरोज’ के निधन के उपरांत लिखी गई लंबी कविता ‘सरोज स्मृति’ से उद्धृत है।
  • प्रसंग: निराला अपनी पुत्री सरोज के विलक्षण विवाह, उसके रूप-सौंदर्य, असमय मृत्यु और एक विवश पिता के रूप में अपने अपराध-बोध व आंसुओं को शब्दों में ढालते हैं।
काव्यांश 1 (सरोज का अद्वितीय विवाह):
“धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,
कुछ भी तेरे हित न कर सका!
जाना तो अर्थागमोपाय,
पर रहा सदा संकुचित-काय,
लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर
हारता रहा मैं स्वार्थ-समर।
…देखा मैंने वह मूर्ति-धीति,
मेरे वसंत की प्रथम गीति,
शृंगार रहा जो निराकार,
रस कविता में उच्छ्वसित-धार।”
व्याख्या:
निराला अपनी दिवंगता पुत्री को ‘धन्य’ कहते हुए स्वयं को एक ‘निरर्थक और असमर्थ पिता’ स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं कि मैं धन कमाने के उपाय तो जानता था, किंतु अनैतिक रास्तों पर न चलने के कारण सदा आर्थिक रूप से अभावग्रस्त रहा और अपने स्वार्थ की लड़ाई हारता रहा। कवि सरोज के रूप-सौंदर्य में अपनी दिवंगत पत्नी की छवि देखते हैं। वे कहते हैं कि तू मेरे जीवन-वसंत का पहला गीत थी और तेरे सौंदर्य में वही अलौकिक व पवित्र श्रृंगार था जो मेरी कविताओं में रस बनकर बहता था।
काव्यांश 2 (रूढ़िमुक्त विवाह का दृश्य):
“माँ की कुल शिक्षा मैंने दी,
पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची,
सोचा मन में, ‘वह शकुंतला,
पर पाठ अन्य यह, अन्य कला।’
कुछ दिन रह गृह तू फिर शमोद,
बैठी नानी की स्नेह-गोद।”
व्याख्या:
सरोज का विवाह परंपरागत आडंबरों और परिजनों के बिना सादगी से हुआ। माता के अभाव में कवि ने पिता होते हुए भी माँ के सारे संस्कार और शिक्षाएं दीं। वे सरोज की तुलना कालिदास की ‘शकुंतला’ से करते हैं, किंतु तुरंत स्पष्ट करते हैं कि शकुंतला की विदाई और सरोज की परिस्थितियों में अंतर था—शकुंतला को विदा करने वाले आश्रम में माता-पिता व सखियाँ थीं, जबकि यहाँ कवि सर्वथा एकाकी थे। विवाह के कुछ समय बाद सरोज ननिहाल गई जहाँ उसे ननिहाल पक्ष का भरपूर वात्सल्य मिला।
काव्यांश 3 (अंतिम तर्पण एवं पिता का आत्म-समर्पण):
“मुझ भाग्यहीन की तू संबल
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!
…कन्ये, गत कर्मों का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण!”
व्याख्या:
कवि अत्यंत भावुक होकर कहते हैं कि मुझ भाग्यहीन पिता की तू ही एकमात्र जीवन-संबल (सहारा) थी। अपने पूरे जीवन को सारांशित करते हुए निराला लिखते हैं कि मेरा सारा जीवन केवल ‘दुख की ही कथा’ रहा है, आज नया क्या कहूँ जो पहले नहीं कहा। अंत में, एक असहाय पिता के पास पुत्री को देने के लिए धन-दौलत नहीं है, इसलिए वे अपने जीवन भर के संचित समस्त सत्कर्मों और साहित्यिक पुण्यों को अर्पित करते हुए अपनी बेटी का अश्रुपूर्ण ‘तर्पण’ (श्राद्ध) करते हैं।
विशेष (सरोज स्मृति):
  • रस: करुण रस की चरम पराकाष्ठा तथा वात्सल्य रस का संयोग।
  • छंद: मुक्त छंद (निराला मुक्त छंद के प्रवर्तक हैं)।
  • भाषा: संस्कृतनिष्ठ, तत्सम शब्दावली युक्त प्रौढ़ खड़ी बोली।
  • अलंकार:
    • उपमा व व्यतिरेक: शकुंतला प्रसंग में।
    • रूपक: ‘वसंत की प्रथम गीति’, ‘मूर्ति-धीति’।
  • प्रतीक योजना: ‘शकुंतला’ (भारतीय नारी के त्याग व विदाई का प्रतीक), ‘पुष्प-सेज’ (विवाह एवं अंत्येष्टि दोनों की सादगी का प्रतीक)।
  • मूलभाव: एक पिता की असीम विवशता, वात्सल्य, पुत्री-वियोग का असह्य आघात और तत्कालीन समाज की संवेदनहीनता पर तीखा आत्ममंथन।
लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उत्तर
प्रश्न 1: निराला ने अपनी पुत्री सरोज को ‘धन्ये’ और स्वयं को ‘निरर्थक’ पिता क्यों कहा है?
  • उत्तर:
    • सरोज को ‘धन्ये’: सरोज ने अभावों, मातृहीनता और संघर्षों के बीच भी कभी कोई शिकायत नहीं की। उसने सादगी और आत्मसम्मान के साथ जीवन जिया और पिता के साहित्यिक आदर्शों का मान रखा।
    • स्वयं को ‘निरर्थक’: निराला आर्थिक तंगहाली के कारण पिता के रूप में सरोज को भौतिक सुख-सुविधाएं, समुचित उपचार और परंपरागत वैभवशाली विवाह नहीं दे सके। इसी आत्मग्लानि और अपराध-बोध के कारण उन्होंने स्वयं को ‘निरर्थक पिता’ कहा।
प्रश्न 2: “देखा मैंने वह मूर्ति-धीति, मेरे वसंत की प्रथम गीति” — पंक्ति का भाव और संदर्भ स्पष्ट कीजिए।
  • उत्तर:
    • संदर्भ: यह पंक्ति विवाह के समय सजी-धजी सरोज के अलौकिक रूप-सौंदर्य को देखकर पिता निराला के मन में उठे भावों को व्यक्त करती है।
    • भाव: कवि सरोज को धैर्य और सौम्यता की साक्षात मूर्ति (‘मूर्ति-धीति’) के रूप में देखते हैं। वे उसे अपने जीवन के सुखद काल (‘वसंत’) की ‘प्रथम गीति’ मानते हैं, क्योंकि सरोज के रूप और संस्कारों में उन्हें अपनी दिवंगत पत्नी (मनोहरा देवी) के सौंदर्य और अपने शुरुआती काव्य-सृजन की पवित्र प्रेरणा की झलक दिखाई देती है।
प्रश्न 3: सरोज का विवाह अन्य सामान्य विवाहों से किस प्रकार भिन्न (विलक्षण) था?
  • उत्तर:
    • आडंबरहीनता: इसमें कोई बैंड-बाजा, आतिशबाजी, चमक-दमक या बारातियों का शोरगुल नहीं था।
    • परिजनों की अनुपस्थिति: विवाह में न तो सगे-संबंधियों को निमंत्रण भेजा गया था और न ही कोई रतजगा या मंगल-गीत गाए गए।
    • माता की भूमिका में पिता: माता के न होने पर निराला ने स्वयं ही कुल-शिक्षा दी और विवाह की पुष्प-सेज तैयार की। यह विवाह शांत, सादगीपूर्ण और रूढ़िमुक्त वातावरण में संपन्न हुआ।
प्रश्न 4: कवि ने सरोज की तुलना ‘शकुंतला’ से करते हुए क्या अंतर (भेद) रेखांकित किया है?
  • उत्तर:
    • समानता: दोनों ही मातृविहीन कन्याएँ थीं और दोनों की विदाई अत्यंत सादगीपूर्ण प्राकृतिक परिवेश में हुई।
    • भिन्नता (“पर पाठ अन्य यह, अन्य कला”): कालिदास की शकुंतला के वियोग पर पूरा कण्व आश्रम, सखियाँ और पालतू पशु-पक्षी तक रोए थे। इसके विपरीत, सरोज के विवाह और विदाई के समय कोई आत्मीय जन उपस्थित नहीं था; वहाँ केवल एक नितांत अकेले पिता का मौन विलाप और एकांत वातावरण था।
प्रश्न 5: “कन्ये, गत कर्मों का अर्पण, कर, करता मैं तेरा तर्पण!” — इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
  • उत्तर:
    • सामान्यतः तर्पण जल और तिल से किया जाता है, किंतु निराला एक ऐसे विवश और विपन्न पिता हैं जिनके पास भौतिक साधन नहीं हैं।
    • वे अपनी मृत पुत्री की आत्मा की शांति के लिए अपने जीवन भर के समस्त संचित पुण्यों, साहित्यिक साधना और सत्कर्मों की पूंजी को ही श्रद्धांजलि स्वरूप अर्पित करते हैं। यह एक पिता के चरम आत्म-समर्पण और वात्सल्य का द्योतक है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उत्तर
प्रश्न 6: “दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!” — इस पंक्ति के आलोक में निराला के संपूर्ण जीवन-संघर्ष और उनकी मनोव्यथा का विश्लेषण कीजिए।
  • उत्तर:
    • पारिवारिक त्रासदियों की शृंखला: निराला का जीवन व्यक्तिगत दुखों का अंतहीन सिलसिला रहा। बाल्यावस्था में माता, युवावस्था में प्लेग महामारी में पिता, चाचा, भाई और अंततः पत्नी मनोहरा देवी का असामयिक निधन हुआ। इसके बाद उनकी एकमात्र संतान, 18 वर्षीय पुत्री सरोज भी असमय काल-कवलित हो गई।
    • आर्थिक विपन्नता और स्वाभिमान: निराला ने कभी भी अपने साहित्यिक सिद्धांतों और स्वाभिमान से समझौता नहीं किया। ‘अर्थागमोपाय’ (धन कमाने के उपाय) जानने के बावजूद वे प्रकाशकों और समाज के चाटुकार वर्ग के आगे नहीं झुके, जिससे वे जीवन भर घोर आर्थिक संकट से जूझते रहे।
    • सामाजिक व साहित्यिक विरोध: तत्कालीन रूढ़िवादी समाज और समकालीन संपादकों ने उनके मुक्त छंद और विद्रोही विचारों का कड़ा विरोध व उपहास किया।
    • मनोव्यथा का सार: यह पंक्ति केवल एक काव्य-पंक्ति नहीं, बल्कि निराला की आत्मकथात्मक वेदना का निचोड़ है। जब सरोज भी चली गई, तो उनके पास अपना दुख बांटने वाला कोई नहीं बचा। इस पंक्ति में एक असहाय, टूटे हुए किंतु स्वाभिमानी महाकवि का गहरा आत्ममंथन झलकता है।
प्रश्न 7: ‘सरोज स्मृति’ कविता के आधार पर निराला के ‘वात्सल्य’ और ‘शिल्प-सौंदर्य’ (काव्य-सौंदर्य) की विस्तृत विवेचना कीजिए।
  • उत्तर:
  • 1. भाव-सौंदर्य (वात्सल्य एवं करुण रस):
    • अद्वितीय वात्सल्य: यहाँ वात्सल्य का वह रूप है जिसमें एक पिता अपनी बेटी के लिए माँ और पिता दोनों के दायित्वों का निर्वहन करता है।
    • करुण रस की चरम सीमा: पुत्री के शैशव, रूप-सौंदर्य, विवाह की स्मृतियों से लेकर उसकी चिता-भस्म तक का वर्णन पाठक को अंदर तक झकझोर देता है। यह हिंदी का सर्वश्रेष्ठ शोक-गीत (Elegy) है।
    • अपराध-बोध की अभिव्यक्ति: सरोज के समुचित इलाज और पालन-पोषण में आर्थिक असमर्थता को लेकर पिता का पश्चाताप इसे अत्यंत मार्मिक बनाता है।
  • 2. शिल्प-सौंदर्य (भाषा, छंद और अलंकार):
    • भाषा: संस्कृतनिष्ठ, तत्सम शब्दावली युक्त परिष्कृत एवं प्रौढ़ खड़ी बोली (जैसे—मूर्ति-धीति, अर्थागमोपाय, संकुचित-काय, तर्पण)।
    • छंद: निराला का प्रिय ‘मुक्त छंद’, जो भावों के प्रवाह के साथ स्वाभाविक रूप से गतिमान है।
    • अलंकार विधान:
      • रूपक अलंकार: ‘मूर्ति-धीति’, ‘वसंत की प्रथम गीति’।
      • व्यतिरेक व उपमा अलंकार: शकुंतला के प्रसंग में उपमेय और उपमान का सूक्ष्म अंतर।
      • अनुप्रास अलंकार: ‘दुख ही जीवन की कथा रही’, ‘हारता रहा मैं स्वार्थ-समर’।
    • बिंब-योजना: विवाह की रस्मों, पुत्री के लजीले हास्य और विदाई के कारुणिक दृश्य बिंब अत्यंत जीवंत हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

error: Content is protected !!