नागमती वियोग खंड बारहमासा: अगहन, पूस, माघ और फागुन की सप्रसंग व्याख्या एवं भावार्थ
भक्तिकाल की निर्गुण प्रेमाश्रयी (सूफ़ी) काव्यधारा के प्रतिनिधि महाकवि मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत के प्रसिद्ध ‘नागमती वियोग खंड’ से संकलित ‘बारहमासा’ के चारों महीनों (अगहन, पूस, माघ और फागुन) की सप्रसंग व्याख्या, भावार्थ और विशेष:
पाठ-परिचय एवं संदर्भ
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मूल ग्रंथ: पद्मावत (नागमती वियोग खंड)
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संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश सूफ़ी महाकवि मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा रचित प्रेमाख्यानक महाकाव्य ‘पद्मावत’ से उद्धृत हैं, जो अंतरा (भाग-2) में ‘बारहमासा’ शीर्षक से संकलित हैं।
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प्रसंग: राजा रत्नसेन सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मावती को पाने के लिए चित्तौड़ छोड़कर चले जाते हैं। पीछे से उनकी पटरानी नागमती अपने पति के वियोग में वर्ष के विभिन्न महीनों में ऋतु-परिवर्तन के साथ जो असहनीय विरह-वेदना झेलती है, उसका अत्यंत मार्मिक और सजीव वर्णन यहाँ किया गया है।
1. अगहन (मार्गशीर्ष) मास
चौपाई:“अगहन दिवस घटा निसि बाढ़ी। दूभर दुख सो जाइ किमि काढ़ी॥अब धनि देवस बिरह भारति। जरै बिरह जस दीपक बाती॥काँपै हिया जनावै सीऊ। तौ पै जाइ होइ सँग पीऊ॥घर-घर चीर रचहिं सब काहू। मोर रूप रंग लेइगा नाहू॥पलटि न बहुरा गा जो बिछोई। तहि अंसु आनि भेंटि कहँ होई॥सियरी आगि बिरह हिय जारा। सुलगि-सुलगि दगधै भै छारा॥”दोहा:“यह दुख दुखद न जानइ कोई। जौ पै जिवहिं जान सो होई॥भँवरा काग न गइउ संदेसा। सो धनि बिरह जरि मुई तेहि क धुआँ हम लागा॥”
व्याख्या (भावार्थ):
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अगहन के महीने में दिन छोटे होने लगे हैं और रातें लंबी हो गई हैं। नागमती कहती है कि विरह की इस लंबी रात का असह्य दुख कैसे काटा जाए?
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अब दिन भी विरह के अंधकार (भारति/कालिमा) जैसा प्रतीत होता है और वह रात-दिन विरह में दीपक की बत्ती की तरह तिल-तिल कर जल रही है।
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ठंड के कारण हृदय कांप रहा है; यह शीत तभी दूर हो सकता है जब उसके प्रियतम (रत्नसेन) उसके पास हों।
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अन्य सभी स्त्रियाँ सजने-संवरने के लिए रंग-बिरंगे वस्त्र (चीर) तैयार कर रही हैं, किंतु नागमती का रूप-रंग तो उसका पति (नाह) अपने साथ ही ले गया है।
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जो एक बार बिछड़ कर गया, वह लौटकर वापस नहीं आया। अब तो केवल नेत्रों के आंसू ही उससे मिलने का माध्यम रह गए हैं।
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विरह की यह शीतल आग उसके हृदय को अंदर ही अंदर सुलगाकर भस्म (राख) किए दे रही है।
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दोहा: नागमती कहती है कि मेरे इस हृदय-विदारक दुख को कोई दूसरा नहीं जान सकता; इसे केवल वही जान सकता है जो स्वयं इस विरह-दशा से गुजरा हो। अंत में वह भौंरे और कौए को संबोधित कर संदेश भेजती है—जाकर मेरे प्रिय से कहना कि तुम्हारी स्त्री तुम्हारे वियोग में जलकर मर गई है और उसी के जलने का काला धुआँ लगने से हम (भौंरा और कौआ) काले हो गए हैं।
2. पूस (पौष) मास
चौपाई:“पूस जाड़ थर-थर तन काँपा। सुरुज जाइ लंका दिसि चाँपा॥बिरह बाढ़ दारुन भा सीऊ। कँपि-कँपि मरौं लेहि हरि जीऊ॥कंत कहाँ लागौं ओहि हियरे। पंथ अपार सूझ नहिं नियरें॥सौर सुपेती आवै जूड़ी। जानहुँ सेज हिवांचल बूड़ी॥चकई निसि बिछुरै दिन मिला। हौं दिन राति बिरह कोकिला॥रैनि अकेली साथ नहिं सखी। कैसे जियै जो बिछुरी पंखी॥”दोहा:“बिरह सचान भँवै तन जादा। जियत खाइ मुए नहिं छाँड़ा॥रकत ढरा मासु सब गरा। हाड़ भए सब संख॥धाधइ सारस रलि मुई। आइ समेटहु पँख॥”
व्याख्या (भावार्थ):
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पूस की कड़ाके की ठंड में पूरा शरीर थर-थर कांप रहा है। सूर्य भी मानो ठंड से डरकर दक्षिण दिशा (लंका) की ओर खिसक गया है।
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पति के बिना विरह बढ़ गया है और शीत अत्यंत दारुण (कष्टदायी) हो गया है। नागमती ठंड और वियोग से कांप-कांप कर मर रही है; विरह मानो उसके प्राण हरने पर तुला है।
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वह तड़पकर कहती है कि मेरे स्वामी कहाँ हैं, जिनके सीने से लगकर मैं इस ठंड से बच सकूँ? मार्ग इतना लंबा और दुर्गम है कि कुछ भी पास दिखाई नहीं देता।
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रजाई और सफेद चादर (सौर-सुपेती) भी बर्फ जैसी ठंडी लगती है, मानो पूरी शैया ही हिमालय के बर्फ में डूब गई हो।
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चकवी तो केवल रात में अपने प्रिय से बिछड़ती है और दिन में मिल जाती है, किंतु नागमती दिन-रात विरह की आग में जल रही है। अकेली रात में कोई सखी भी साथ नहीं है; वह उस पंछी की तरह अकेली है जो अपने जोड़े से बिछड़ गया हो।
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दोहा: विरह रूपी बाज (सचान) उसके शरीर के चारों ओर मंडरा रहा है। यह विरह रूपी बाज जीवित अवस्था में ही उसका मांस नोच-नोच कर खा रहा है और मरने के बाद भी उसे नहीं छोड़ेगा। आंसुओं के रूप में सारा रक्त बह गया है, मांस गल चुका है और हड्डियां सूखकर शंख जैसी सफेद व खोखली हो गई हैं। नागमती उस सारस की मादा की तरह विरह में चिल्ला-चिल्ला कर मर गई है; हे प्रिय! अब आकर केवल उसके बिखरे हुए पंख (अस्थियां) ही समेट लो।
3. माघ मास
चौपाई:“लागेउ माघ परै अब पाला। बिरह काल भएउ जड़िकाला॥पहल पहल तन काँपै मोरा। हियरा डोलै डाढ़ि कै झोरा॥कंतहि समुझि परै यहि जीऊ। निसरि न आवे कँपि-कँपि पीऊ॥गइ सो जाइ जो बिछुरी जोरी। जेहि रँग राती सो रति भोरी॥नैन चुवहिं जस माहवट नीरू। तेहि जल अँग-अँग काँपै चीरू॥टप-टप बूँद परहिं जस ओला। बिरह पवन होइ मारै झोला॥”दोहा:“कतहुँ न सूझै ओर न छोरा। जग सब जरद भा भोर हिंडोरा॥हौं जरि बिरह सो भसम भई। धुआँ न निकसै बार॥”
व्याख्या (भावार्थ):
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माघ का महीना आ गया है और अब पाला (तुषार) पड़ने लगा है। विरह नागमती के लिए साक्षात काल (मृत्यु) बन गया है और शीत असहनीय हो गई है।
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शरीर का एक-एक अंग ठंड से कांप रहा है और हृदय इस तरह डोल रहा है जैसे आंधी में पेड़ की सूखी डाली हिलती है।
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वह अपने प्रिय को पुकारना चाहती है, किंतु अत्यधिक कांपने के कारण उसके मुख से ‘प्रिय’ शब्द भी स्पष्ट बाहर नहीं निकल पा रहा है।
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जिसकी जोड़ी बिछड़ गई है, उसकी सारी सुध-बुध और रंग-रलियाँ समाप्त हो गई हैं।
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नागमती की आँखों से आंसू इस प्रकार लगातार टपक रहे हैं जैसे माघ की झड़ी (माहवट की वर्षा) का पानी गिरता है। उन आंसुओं के जल से भीगे वस्त्रों के कारण उसका अंग-प्रत्यंग ठंड से कांप रहा है।
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आंसुओं की बूँदें ओलों की तरह टप-टप गिर रही हैं और विरह रूपी बर्फीली हवा झोंके मार-मार कर उसे प्रताड़ित कर रही है।
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दोहा: विरह के कारण उसे कहीं कोई ओर-छोर (रास्ता) नहीं सूझ रहा है। विरह और पाले के कारण पूरा संसार पीला (जरद) पड़ गया है। नागमती कहती है कि मैं विरह की अग्नि में जलकर भीतर ही भीतर राख हो गई हूँ, अब तो मेरे शरीर से धुआँ तक नहीं निकल रहा।
4. फागुन (फाल्गुन) मास
चौपाई:“फागुन पवन झकोरा बहा। चौगुन सीउ जाइ किमि सहा॥तन जस पीयर पात भा मोरा। बिरह न रहै पवन होइ झोरा॥तरिवर झरहिं बनहिं बन ढाखा। भइ अनफूल फरी सब साखा॥करहिं बनाफति कीन्ह हुलासू। मो कहँ भा जग दून उदासू॥फागु करहिं सब चाँचरि जोरी। मोहि जिय लाइ दीन्ह जस होरी॥जौ पै पीउ जरत अस भावा। जरत मरत मोहि रोस न आवा॥”दोहा:“राति-दिवस यह जीव समुझावा। जरि-मरि भसम होइ कहँ पावा॥यह तन जारौं छार कै, कहौं कि पवन उड़ाव।मकु तेहि मारग उड़ि परै, कंत धरैं जहँ पाव॥”
व्याख्या (भावार्थ):
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फागुन में तेज हवा के झकोरे चलने लगे हैं, जिससे ठंड चौगुनी हो गई है। नागमती कहती है कि इस प्रचंड शीत को अब कैसे सहा जाए?
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विरह की निरंतर पीड़ा से उसका शरीर पेड़ के सूखे पीले पत्ते (पीयर पात) जैसा पीला और दुर्बल हो गया है। विरह रूपी आंधी उस पत्ते रूपी शरीर को झकझोर कर उड़ा ले जाना चाहती है।
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वनों में पेड़ों के पत्ते झड़ रहे हैं, ढाक/पलाश के पत्ते गिर गए हैं और डालियों पर नए फूल व फल लदने की तैयारी हो रही है।
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प्रकृति में वनस्पति नवयौवन पाकर उल्लास मना रही है, किंतु प्रकृति का यह उल्लास नागमती के लिए संसार को दोगुना उदास बना रहा है।
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सभी स्त्रियाँ जोड़ियाँ बनाकर फाग (होली) और चांचर खेल रही हैं, किंतु नागमती के हृदय में विरह ने होली जैसी आग लगा दी है।
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फिर भी नागमती कहती है कि यदि मेरे प्रियतम को मेरा इस प्रकार जलना ही पसंद है, तो मुझे जलकर मरने में भी कोई क्रोध या शिकवा नहीं है।
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दोहा: नागमती रात-दिन अपने मन को समझाती है कि जल-मर कर भस्म हो जाने में ही मेरी मुक्ति है। वह अपनी अंतिम अभिलाषा प्रकट करते हुए कहती है—मैं अपने इस विरह-तप्त शरीर को जलाकर राख (छार) कर देना चाहती हूँ और पवन से प्रार्थना करती हूँ कि वह उस राख को उड़ा ले जाए; शायद मेरी भस्म उड़कर उस मार्ग पर गिर जाए, जिस मार्ग पर मेरे प्रियतम अपने चरण रखें।
विशेष एवं काव्य-सौंदर्य:
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रस: विप्रलंभ (वियोग) श्रृंगार रस की मर्मस्पर्शी और अप्रतिम अभिव्यक्ति।
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भाषा: अवधी का ठेठ, तद्भव और लोकरंजक ग्रामीण स्वरूप।
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छंद योजना: कड़वकबद्ध शैली (चौपाई के उपरांत दोहा)।
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प्रमुख अलंकार:
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रूपक अलंकार: ‘बिरह सचान’ (विरह रूपी बाज), ‘बिरह पवन’, ‘दीप जस बाती’।
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उपमा अलंकार: ‘तन जस पीयर पात भा’, ‘नैन चुवहिं जस माहवट नीरू’।
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अतिशयोक्ति अलंकार: भौंरे और कौए के काले होने का कारण नागमती के विरह का धुआँ बताना (सूफ़ी काव्य की फारसी मसनवी शैली का ‘उदाहात्मक’ प्रभाव)।
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प्रकृति चित्रण: प्रकृति का उद्दीपन रूप (प्रकृति के बदलते रूप नागमती के विरह को और अधिक भड़काते हैं)।