अलंकार सम्प्रदाय (अलंकारवाद) नोट्स(alankar sampraday (alnkarvad) notes)

अलंकार सम्प्रदाय (अलंकारवाद)

  • ☆ अलंकार सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य भामह माने जाते हैं।
  • ☆ उन्होंने छठी शताब्दी में अपने प्रसिद्ध ग्रंथ “काव्यालंकार” की रचना की थी।
  • ☆ आचार्य भामह ने ही सबसे पहले अलंकार को काव्य की आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित किया था।

1. अलंकार शब्द का अर्थ

‘अलंकार’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है: अलं + कार
  • • अलं का अर्थ होता है — आभूषण, सजावट या पर्याप्त।
  • • कार का अर्थ होता है — करने वाला।
  • शाब्दिक अर्थ : जो किसी वस्तु या कथन को सुसज्जित या सुंदर बनाए, वही अलंकार है।
(आचार्य भामह की प्रसिद्ध कृति: काव्यालंकार)

2. आभूषण का अर्थ : काव्य की शोभा बढ़ाने वाला या सुसज्जित करने वाला।

साधारण बोलचाल में आभूषण का अर्थ गहना या जेवर (जैसे- सोना, चांदी के आभूषण) होता है। जिस प्रकार कोई स्त्री अपनी शारीरिक सुंदरता को बढ़ाने के लिए आभूषण धारण करती है, ठीक उसी प्रकार कवि अपनी कविता (काव्य-कामिनी) की सुंदरता बढ़ाने के लिए सुंदर शब्दों और अर्थों का प्रयोग करते हैं।

3. अलंकार की परिभाषा

“काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्मों (तत्वों) को अलंकार कहते हैं।”
(काव्यशोभाकरान् धर्मानलंकारान् प्रचक्षते — आचार्य दण्डी)
सरल शब्दों में, कविता के सौन्दर्य को बढ़ाने वाले साधन, शब्द या चमत्कारी अर्थ को अलंकार कहा जाता है। इसके प्रयोग से कविता प्रभावशाली, आकर्षक और मर्मस्पर्शी बन जाती है।

4. अलंकार के प्रमुख लक्षण :–

  • काव्य में शोभा लाने वाले या उसे सौन्दर्य प्रदान करने वाले तत्व अलंकार कहलाते हैं।
  • काव्य को अधिक आकर्षक और प्रभावशाली बनाने वाले साधनों को अलंकार कहते हैं।
  • कथन या अभिव्यक्ति को अधिक विशिष्ट बनाने वाले साधनों को अलंकार कहते हैं।
  • अभिव्यक्ति में असाधारणता लाने वाले प्रकारों को अलंकार कहते हैं।
  • उक्ति (कथन), वैचित्र्य लाने वाले विधान को अलंकार कहते हैं।

5. काव्य में अलंकार का महत्व :-

  • काव्य में आकर्षक और चारुता।
  • काव्य अधिक प्रभावपूर्ण।
  • भाषा में शाब्दिक प्रयोग में चमत्कार और चारुत्व का समावेश।
  • अभिव्यक्ति में अधिक स्पष्टता और सुबोधता।
  • अलंकारों के प्रयोग से काव्य में चमत्कार और सौन्दर्य की वृद्धि होती है।
  • अलंकारों से सजे काव्य में भावों की मधुरता, भाषा की सुन्दरता और अर्थ का चमत्कार एक साथ दिखाई देता है।
विशेष नोट :: आचार्य रामचंद्र शुक्ल और अन्य आधुनिक विद्वानों के अनुसार, अलंकार काव्य का साधन है, साध्य नहीं। अर्थात्, अलंकारों का प्रयोग कविता में जबरदस्ती थोपा नहीं जाना चाहिए, बल्कि यह सहज रूप से भावों के अनुकूल आना चाहिए।

अलंकारों के मुख्य भेद

हिंदी साहित्य में अलंकारों के मुख्य रूप से तीन भेद होते हैं:
  1. शब्दालंकार
  2. अर्थालंकार
  3. उभयालंकार

1. शब्दालंकार के अंतर्गत आने वाले अलंकार:

  • ★ अनुप्रास अलंकार
  • ★ यमक अलंकार
  • ★ श्लेष अलंकार
  • ★ वक्रोक्ति अलंकार

2. अर्थालंकार के अंतर्गत आने वाले अलंकार:

  • ☆ अतिशयोक्ति अलंकार
  • ☆ भ्रांतिमान अलंकार
  • ☆ संदेह अलंकार
  • ☆ विभावना अलंकार
  • ☆ विरोधाभास अलंकार
यह सभी ‘अर्थालंकार’ हैं, इसे एक लाइन में याद रखने की ट्रिक :-
“बढ़ा-चढ़ाकर (अतिशयोक्ति), भ्रम में आकर (भ्रांतिमान), संदेह में पड़कर (संदेह), बिना साधन के (विभावना), उल्टी बात का अर्थ (विरोधाभास) समझा जाता है।”

3. उभयालंकार के अंतर्गत आने वाले अलंकार:

  • ☆ श्लेष अलंकार

1. शब्दालंकार

शब्दालंकार को पहचानने की सबसे बड़ी व्यावहारिक ट्रिक यह है कि इसमें सारा चमत्कार शब्दों के बाहरी रूप या वर्णों (अक्षरों) के बार-बार सुनने से पैदा होता है। अगर आप उस शब्द को बदलकर उसकी जगह उसका पर्यायवाची रख देंगे, तो उसका पूरा आकर्षण खत्म हो जाएगा।
इन 4 प्रमुख शब्दालंकारों को हमेशा याद रखने और परीक्षा में तुरंत पहचानने की जादुई ट्रिक्स नीचे दी गई हैं:

1. अनुप्रास अलंकार (Trick: वर्णों का दोहराव या रिपीट होना)

  • पहचानने की ट्रिक: जहाँ एक ही अक्षर (वर्ण) बार-बार आए। आपको कविता को देखते ही या बोलते ही एक ही अक्षर की लाइन लगी हुई दिखेगी।
  • याद रखने का कीवर्ड: एक अक्षर बार-बार
  • उदाहरण: “तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए!”
    (यहाँ ‘त’ वर्ण की आवृत्ति बार-बार हुई है)

2. यमक अलंकार (Trick: जोड़ या जुड़वा शब्द)

  • पहचानने की ट्रिक: जहाँ एक ही शब्द कम से कम दो बार (जोड़े के रूप में) आए, लेकिन जितनी बार भी वह शब्द आए, उसका अर्थ हर बार अलग हो।
  • याद रखने का कीवर्ड: एक शब्द दो बार, अर्थ अलग-अलग
  • उदाहरण: “कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय!”
    (यहाँ पहले ‘कनक’ का अर्थ धतूरा है और दूसरे ‘कनक’ का अर्थ सोना है)

3. श्लेष अलंकार (Trick: चिपका हुआ या एक का अनेक)

  • पहचानने की ट्रिक: जहाँ कोई शब्द पूरी कविता में केवल एक ही बार आता है, लेकिन उस एक ही शब्द के अंदर कई अलग-अलग अर्थ छिपे (चिपके) होते हैं। अलग-अलग लोगों के संदर्भ में उसका मतलब बदल जाता है।
  • याद रखने का कीवर्ड: शब्द एक, अर्थ अनेक
  • उदाहरण: “रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून।”
    (यहाँ आखिरी लाइन में ‘पानी’ शब्द के तीन अर्थ छिपे हैं— मोती के लिए चमक, मनुष्य के लिए इज्जत और आटे/चूने के लिए जल)

4. वक्रोक्ति अलंकार (Trick: टेढ़ी बात या जानबूझकर गलत समझना)

  • पहचानने की ट्रिक: वक्रोक्ति का मतलब ही होता है टेढ़ा कथन। जहाँ कहने वाला किसी बात को सीधे अर्थ में कहता है, लेकिन सुनने वाला चालाकी से या मजाक में उसका दूसरा (टेढ़ा) अर्थ निकाल लेता है। इसमें अक्सर बातचीत या संवाद (Dialogue) जैसी स्थिति होती है।
  • याद रखने का कीवर्ड: वक्ता कुछ और कहे, श्रोता कुछ और समझे
  • उदाहरण:
    “को तुम? — हौं घनश्याम हम।”
    “तौं बरसो कितहूँ जाइ।”
    (यहाँ श्री कृष्ण कहते हैं कि मैं ‘घनश्याम’ हूँ, जिसका मतलब कृष्ण है। लेकिन राधा जी जानबूझकर इसका दूसरा अर्थ ‘काले बादल’ ले लेती हैं और कहती हैं कि यदि तुम बादल हो तो कहीं और जाकर बरसो, यहाँ तुम्हारा क्या काम)
यमक और श्लेष में अंतर की सुपर ट्रिक:
  • यमक: इसमें जुड़वा बच्चे होते हैं (यानी शब्द दो बार अलग-अलग दिखेगा)।
  • श्लेष: इसमें एक ही इंसान के कई रूप होते हैं (यानी शब्द एक ही बार दिखेगा, पर अर्थ कई होंगे)।
सुपर ट्रिक: अक्षर बार-बार आए (अनुप्रास), जुड़वा शब्द अलग अर्थ लाए (यमक), एक ही शब्द में कई अर्थ चिपक जाए (श्लेष), और सीधी बात का टेढ़ा अर्थ निकाला जाए (वक्रोक्ति)।

अनुप्रास अलंकार

अनुप्रास अलंकार की परिभाषा

जहाँ काव्य (कविता) में एक ही वर्ण या अक्षर की आवृत्ति बार-बार होती है (अर्थात कोई अक्षर बार-बार आता है), वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

अनुप्रास अलंकार के 5 भेद और उनकी परिभाषा

1. छेकानुप्रास अलंकार
  • परिभाषा: जहाँ कोई एक या अनेक वर्ण (अक्षर) केवल दो बार आए (अर्थात उसकी आवृत्ति केवल एक बार हो), वहाँ छेकानुप्रास होता है। इसमें अक्षरों का क्रम बिलकुल समान होता है।
  • याद रखने का कीवर्ड: अक्षर का जोड़ा (केवल 2 बार आना)
  • उदाहरण: “इस करुणा-कलित हृदय में अब विकल रागिनी बजती।” (यहाँ ‘क’ वर्ण लगातार दो बार आया है: करुणा, कलित)
2. वृत्यानुप्रास अलंकार
  • परिभाषा: जहाँ एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति दो से अधिक बार (बार-बार) हो, वहाँ वृत्यानुप्रास होता है। जो सामान्य अनुप्रास हम देखते हैं, वह यही है।
  • याद रखने का कीवर्ड: वर्णों की झड़ी (3 या अधिक बार आना)
  • उदाहरण: “तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।” (यहाँ ‘त’ वर्ण की आवृत्ति कई बार हुई है)
3. लाटानुप्रास अलंकार
  • परिभाषा: जहाँ पूरा का पूरा शब्द या वाक्य ही दोबारा आता है। शब्द वही रहता है, अर्थ भी वही रहता है, लेकिन पूरे वाक्य का अन्वय (भावार्थ) बदलने से उसका मतलब बदल जाता है।
  • याद रखने का कीवर्ड: पूरा शब्द / वाक्य दोहराना
  • उदाहरण:
    “पूत कपूत तो क्यों धन संचय,
    पूत सपूत तो क्यों धन संचय।”
    (यहाँ पूरे वाक्य दोहराए गए हैं, बस कपूत और सपूत के कारण अर्थ का भाव बदल गया है)
4. श्रुत्यानुप्रास अलंकार
  • परिभाषा: श्रुति का अर्थ है सुनना। जहाँ मुख के एक ही उच्चारण स्थान (जैसे केवल कंठ से, या केवल दाँत तवर्ग से) बोले जाने वाले वर्णों की अधिकता होती है, जो सुनने में एक सुंदर लय पैदा करते हैं।
  • याद रखने का कीवर्ड: एक ही ग्रुप के अक्षर (जैसे त, थ, द, ध, न)
  • उदाहरण: “दिनांत था, थे दिननाथ डूबते, सधेनु आते गृह ग्वाल बाल थे।” (इस पंक्ति में द, न, त, थ जैसे वर्णों की अधिकता है जो सब एक ही उच्चारण स्थान ‘दन्त्य’ के हैं)
5. अंत्यानुप्रास अलंकार
  • परिभाषा: अंत्या का अर्थ है अंत में। जहाँ छंद के चरणों (लाइनों) के अंत में समान स्वर या वर्ण आने से तुकबंदी (Rhyming) बनती है। हमारी लगभग सभी चौपाइयां और कविताएं इसी में होती हैं।
  • याद रखने का कीवर्ड: लास्ट में राइमिंग या तुकबंदी
  • उदाहरण:
    “बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
    खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।”
    (यहाँ अंत में ‘कहानी थी’ और ‘रानी थी’ में तुकबंदी है)
अनुप्रास के भेदों को याद रखने का महा-मंत्र (Super Trick):
छेक में अक्षर दो बार आए (छेकानुप्रास), वृत्या में उसकी झड़ी लग जाए (वृत्यानुप्रास), लाटा में पूरा वाक्य दोहराए (लाटानुप्रास), श्रुत्या में एक ही ग्रुप के अक्षर कानों को भाए (श्रुत्यानुप्रास), और अंत्या में अंत की तुकबंदी रंग जमाए (अंत्यानुप्रास)।

छेकानुप्रास अलंकार

  • परिभाषा: जहाँ काव्य में स्वरूप और क्रम से अनेक या एक वर्ण की आवृत्ति केवल एक बार (अर्थात वह वर्ण या अक्षर पूरी पंक्ति में लगातार केवल दो बार आता है), वहाँ छेकानुप्रास अलंकार होता है।
    सरल शब्दों में, जब कोई अक्षर जोड़े (Pair) के रूप में लगातार दो बार आए, तो उसे छेकानुप्रास कहते हैं। ‘छेक’ का शाब्दिक अर्थ ही ‘चतुर’ होता है, अर्थात चतुर लोगों को प्रिय लगने वाला सुंदर अक्षर-जोड़ा।
  • पहचानने की सबसे आसान व्यावहारिक ट्रिक: कविता में आपको किसी भी अक्षर का केवल एक जोड़ा (लगातार 2 बार आना) दिखाई देगा, तीसरी बार वह अक्षर वहाँ नहीं आएगा।

छेकानुप्रास अलंकार के 10 प्रमुख उदाहरण और उनका स्पष्टीकरण:

  1. “इस करुणा-कलित हृदय में अब विकल रागिनी बजती।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ पंक्ति के शुरुआत में ‘क’ वर्ण की आवृत्ति केवल एक बार हुई है, जिससे ‘करुणा’ और ‘कलित’ का सुंदर जोड़ा बना है (क वर्ण कुल 2 बार आया है)।
  2. “रीझि-रीझि रहसि-रहसि हँसि-हँसि उठे।”
    स्पष्टीकरण: इस पंक्ति में कई शब्दों के जोड़े हैं— ‘रीझि-रीझि’ में ‘र’ और ‘झ’, ‘रहसि-रहसि’ में ‘र’ और ‘ह’ तथा ‘हँसि-हँसि’ में ‘ह’ और ‘स’ वर्ण केवल दो-दो बार आए हैं।
  3. “बंदऊँ गुरु पद पदुम पराग।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘प’ और ‘द’ वर्ण की आवृत्ति ‘पद’ और ‘पदुम’ में लगातार दो बार हुई है।
  4. “अमिय मूरिमय चूरन चारू।”
    स्पष्टीकरण: इस पंक्ति में ‘च’ वर्ण की आवृत्ति ‘चूरन’ और ‘चारू’ में केवल दो बार हुई है।
  5. “कानन कठिन भयंकर भारी।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ दो अलग-अलग जोड़े बने हैं— ‘कानन-कठिन’ में ‘क’ वर्ण का जोड़ा है और ‘भयंकर भारी’ में ‘भ’ वर्ण लगातार दो बार आया है।
  6. “राम को रूप निहारति जानकी, कंकन के नग की परछाई।”
    स्पष्टीकरण: इस उदाहरण में ‘कंकन’ और ‘के’ में ‘क’ वर्ण की आवृत्ति लगातार केवल दो बार हुई है।
  7. “विकल विकल गुंजन है अलियों का।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘विकल विकल’ में ‘व’ और ‘क’ वर्णों का क्रम से लगातार दो बार प्रयोग हुआ है।
  8. “परम पुनीत भरत आचरनू।”
    स्पष्टीकरण: इस पंक्ति में ‘परम’ और ‘पुनीत’ शब्दों में ‘प’ वर्ण की आवृत्ति केवल दो बार हुई है।
  9. “तात तात हा तात पुकारी।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘तात तात’ में ‘त’ वर्ण का क्रमवार दोहराव लगातार केवल दो बार हुआ है।
  10. “मुदित महीपति मंदिर आए।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ध्यान दें, ‘मुदित’ और ‘महीपति’ में ‘म’ वर्ण लगातार दो बार आया है, जिससे यहाँ छेकानुप्रास बनता है (आगे ‘मंदिर’ शब्द में भी ‘म’ है, लेकिन व्याकरण के गूढ़ नियमों में शुरू के दो पदों की आवृत्ति को छेकानुप्रास का सटीक उदाहरण माना जाता है)।
एक लाइन का महा-मंत्र:
अक्षर जब केवल दो बार आकर सुंदर जोड़ा बनाए, तो बिना किसी संशय के वहाँ छेकानुप्रास कहलाए।

वृत्यानुप्रास अलंकार

  • परिभाषा: जहाँ काव्य (कविता) में एक या अनेक वर्णों (अक्षरों) की आवृत्ति दो से अधिक बार अर्थात बार-बार होती है, वहाँ वृत्यानुप्रास अलंकार होता है।
    सरल शब्दों में, जब कोई एक ही अक्षर कविता की पंक्ति में तीन या तीन से अधिक बार आकर एक सुंदर वृत्त (घेरा या पैटर्न) बनाता है, तो उसे वृत्यानुप्रास कहते हैं। सामान्य तौर पर हम जिसे अनुप्रास अलंकार कहते हैं, वह अधिकांशतः वृत्यानुप्रास ही होता है। (वृत्त का अर्थ = घूमना, वृत्त बनाना)
  • पहचानने की सबसे आसान व्यावहारिक ट्रिक: कविता में आपको कोई एक अक्षर लगातार या थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कम से कम तीन बार या उससे भी ज्यादा बार आता हुआ दिखाई देगा। (यदि केवल दो बार आए तो छेकानुप्रास, और तीन या उससे ज्यादा बार आए तो वृत्यानुप्रास)।

वृत्यानुप्रास अलंकार के 10 प्रमुख उदाहरण और उनका स्पष्टीकरण:

  1. “तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।”
    स्पष्टीकरण: इस पंक्ति में ‘त’ वर्ण की आवृत्ति पाँच बार (तरनि, तनूजा, तट, तमाल, तरुवर) हुई है, जो दो से अधिक बार है।
  2. “चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही थीं जल-थल में।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘च’ वर्ण की आवृत्ति तीन बार (चारु, चंद्र, चंचल) हुई है, इसलिए यहाँ वृत्यानुप्रास है।
  3. “रघुपति राघव राजा राम।”
    स्पष्टीकरण: इस प्रसिद्ध पंक्ति में ‘र’ वर्ण की आवृत्ति लगातार चार बार (रघुपति, राघव, राजा, राम) हुई है।
  4. “कल कानन कुंडल मोरपखा, उर पै बनमाल बिराजति है।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ पंक्ति के शुरुआत में ‘क’ वर्ण की आवृत्ति तीन बार (कल, कानन, कुंडल) हुई है और आगे ‘ब’ वर्ण की आवृत्ति भी दो बार हुई है। ‘क’ की बहु-आवृत्ति के कारण यह वृत्यानुप्रास है।
  5. “सुरुचि सुवास सरस अनुरागा।”
    स्पष्टीकरण: इस चौपाई में ‘स’ वर्ण की आवृत्ति लगातार तीन बार (सुरुचि, सुवास, सरस) होने से सुंदर संगीतात्मकता आई है।
  6. “विवेक विमल विज्ञान विरागा।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘व’ वर्ण की आवृत्ति चार बार (विवेक, विमल, विज्ञान, विरागा) हुई है।
  7. “कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि।”
    स्पष्टीकरण: इस पंक्ति में ‘क’ वर्ण की आवृत्ति तीन बार (कंकन, किंकिनि) और ‘न’ वर्ण की आवृत्ति भी बार-बार हुई है।
  8. “मुदित महीपति मंदिर आए, सेवक सचिव सुमंत बुलाए।”
    स्पष्टीकरण: इस पूरे पद में दो अलग-अलग वर्णों की बार-बार आवृत्ति है— पहली पंक्ति में ‘म’ वर्ण तीन बार (मुदित, महीपति, मंदिर) और दूसरी पंक्ति में ‘स’ वर्ण तीन बार (सेवक, सचिव, सुमंत) आया है।
  9. “चामर-सी चन्दन-सी चन्द-सी चाँदनी चमेली चारु चन्द सुघर है।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘च’ वर्ण की आवृत्ति की तो झड़ी ही लग गई है। ‘च’ वर्ण पूरी पंक्ति में नौ बार आया है, जो वृत्यानुप्रास का सबसे सटीक उदाहरण है।
  10. “भव्य भावों में भयानक भावना भरना नहीं।”
    स्पष्टीकरण: इस पंक्ति में ‘भ’ वर्ण की आवृत्ति पाँच बार (भव्य, भावों, भयानक, भावना, भरना) हुई है।
एक लाइन का महा-मंत्र:
अक्षर जब दो से ज्यादा बार आकर वर्णों की झड़ी लगाए, तो बिना किसी उलझन के वह वृत्यानुप्रास कहलाए।

लाटानुप्रास अलंकार

  • परिभाषा: जहाँ काव्य में समान अर्थ वाले शब्दों या पूरे के पूरे वाक्यों की आवृत्ति (दोहराव) होती है, वहाँ लाटानुप्रास अलंकार होता है।
    सरल शब्दों में, इसमें एक ही शब्द या एक ही वाक्य दो बार आता है और उसका सामान्य अर्थ भी बिल्कुल वही रहता है, लेकिन जब हम पूरे वाक्य का अन्वय (गहरा भावार्थ) निकालते हैं, तो कॉमा (अल्पविराम) के बदलने या संदर्भ के बदलने से अर्थ में बड़ा अंतर आ जाता है। यह अलंकार गुजरात के ‘लाट’ प्रदेश के कवियों को बहुत प्रिय था, इसलिए इसका नाम लाटानुप्रास पड़ा। (लाट = गुजरात का एक प्रदेश)
  • पहचानने की सबसे आसान व्यावहारिक ट्रिक: कविता में आपको एक जैसी दो लाइनें या एक जैसे शब्दों के समूह लगातार लिखे हुए दिखाई देंगे। बस एक छोटे से विराम या एक अक्षर के बदलाव से पूरी बात का मतलब बदल जाता है।

लाटानुप्रास अलंकार के 10 प्रमुख उदाहरण और उनका स्पष्टीकरण:

  1. “पूत कपूत तो क्यों धन संचय, पूत सपूत तो क्यों धन संचय।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘तो क्यों धन संचय’ पूरा का पूरा वाक्य दोहराया गया है। यदि पुत्र कपूत है तो धन जमा करने का कोई फायदा नहीं, और यदि पुत्र सपूत है तो भी धन जमा करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि वह खुद कमा लेगा।
  2. “पराधीन जो जन नहीं, स्वर्ग नरकता हेतु। / पराधीन जो जन, नहीं स्वर्ग नरकता हेतु।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ केवल कॉमा (,) का स्थान बदला है। पहली पंक्ति का अर्थ: जो पराधीन नहीं है, उसके लिए यहीं स्वर्ग है। दूसरी पंक्ति का अर्थ: जो पराधीन है, उसके लिए यहीं नरक है।
  3. “राम हृदय जाके नहीं, विपत्ति सुमंगल ताहि। / राम हृदय जाके, नहीं विपत्ति सुमंगल ताहि।”
    स्पष्टीकरण: शब्दों का क्रम समान है, लेकिन अर्थ भिन्न है— पहली पंक्ति: जिसके हृदय में राम नहीं, उसे विपत्ति है। दूसरी पंक्ति: जिसके हृदय में राम हैं, उसे कोई विपत्ति नहीं, सब मंगल है।
  4. “रोको मत, जाने दो। / रोको, मत जाने दो।”
    स्पष्टीकरण: यह लाटानुप्रास का सरल उदाहरण है। पहला अर्थ: उसे मत रोको, जाने दो। दूसरा अर्थ: उसे रोक लो, जाने मत दो।
  5. “तेगबहादुर हाँ, वे ही थे गुरु-पद-पद्म अनुरागी। / तेगबहादुर हाँ, वे ही थे गुरु-पद-विभव-त्यागी।”
    स्पष्टीकरण: शब्द एक जैसे हैं, केवल अंत के विशेषण बदलने से उनके दो महान गुणों (गुरु प्रेमी और वैभव त्यागी) का बोध होता है।
  6. “मनुष्य वही है जो मनुष्य के लिए मरे।”
    स्पष्टीकरण: ‘मनुष्य’ शब्द दो बार आया है। पहला ‘कर्ता (व्यक्ति)’, दूसरा ‘मानवता / परोपकार’ के भाव में है।
  7. “सिय मुख सरसिज भये जु पै, सरसिज सरसिज नाहिं।”
    स्पष्टीकरण: ‘सरसिज’ (कमल) शब्द दो बार आया है। सीता जी के मुख रूपी कमल के सामने तालाब का कमल तुच्छ है।
  8. “लड़का तो लड़का ही है।”
    स्पष्टीकरण: दोनों बार ‘लड़का’ का अर्थ ‘बालक’ ही है, लेकिन दूसरे का भाव उसकी आदतों या लड़कों वाले गुणों की ओर संकेत है।
  9. “वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे, वही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे।”
    स्पष्टीकरण: ‘मनुष्य’ शब्द का दोहराव पूरे वाक्य के साथ भिन्न भावार्थ प्रकट करता है, इसलिए यह लाटानुप्रास है।
  10. “पिया निकट जाके नहीं, घाम चाँदनी ताहि। / पिया निकट जाके, नहीं घाम चाँदनी ताहि।”
    स्पष्टीकरण: पहला अर्थ: पिया के बिना चाँदनी भी धूप जैसी लगती है। दूसरा अर्थ: पिया के पास धूप भी चाँदनी जैसी सुखद लगती है।
एक लाइन का महा-मंत्र:
जब पूरा वाक्य या शब्दों का समूह एक जैसा आए, और कॉमा या अन्वय बदलने से नया अर्थ समझाए, तो वह लाटानुप्रास कहलाए।

श्रुत्यानुप्रास अलंकार

(कानों को प्रिय लगने वाला अनुप्रास)
  • परिभाषा: श्रुति का अर्थ होता है सुनना। जहाँ मुख के एक ही उच्चारण स्थान (जैसे केवल कंठ, केवल तालु, या केवल दाँत-तवर्ग) से बोले जाने वाले वर्णों (अक्षरों) की आवृत्ति बार-बार होती है, वहाँ श्रुत्यानुप्रास अलंकार होता है।
    सरल शब्दों में, जब कविता की किसी पंक्ति में ऐसे अक्षरों का प्रयोग बहुत ज्यादा किया जाता है जो मुख के एक ही हिस्से से बोले जाते हैं, तो वे कान को सुनने में बहुत मधुर और लयबद्ध लगते हैं। इसे कानों को प्रिय लगने वाला अनुप्रास भी कहा जाता है। (श्रुति = सुनना)
  • पहचानने की सबसे आसान व्यावहारिक ट्रिक: यदि पंक्ति में किसी एक ही ग्रुप के अक्षरों (एक ही उच्चारण स्थान के) की भरमार दिखे, तो वहाँ श्रुत्यानुप्रास होता है। कम से कम तीन या उससे अधिक बार उसी ग्रुप के अक्षर आएँ।
उच्चारण स्थानों के ग्रुप (वर्ग) याद रखने हेतु:
  • दंत्य (दाँत) ग्रुप: त, थ, द, ध, न, ल, स (सबसे ज्यादा उदाहरण इसी के मिलते हैं)
  • ओष्ठ्य (होठ) ग्रुप: प, फ, ब, भ, म
  • कंठ्य (कंठ) ग्रुप: क, ख, ग, घ, ङ

श्रुत्यानुप्रास अलंकार के 10 प्रमुख उदाहरण और उनका स्पष्टीकरण:

क्र. उदाहरण स्पष्टीकरण / प्रयोग हुए वर्ण (एक ही उच्चारण स्थान से)
1 दिनांत था, थे दिननाथ डूबते, सधेनु आते गृह ग्वाल बाल थे। यहाँ दंत्य वर्ण – द, न, त, थ, ध, स, ल की आवृत्ति है (सभी दंत्य ग्रुप के हैं)।
2 तुलसीदास सीदत निसिदिन देखि तुम्हारी निठुराई। त, ल, स, द, न, थ वर्णों की बहुलता (दंत्य वर्ण) है।
3 ताके संगी सखा सभै सुधि भूलि गए। यहाँ दंत्य वर्णों त, स, स (स) का प्रयोग अधिक है, जिससे अत्यंत मधुर लय बनती है।
4 पाप प्रहार प्रबल भुजदण्डा। यहाँ ओष्ठ्य वर्ण प, प्र, भ, ब की प्रधानता है (सब होठ से उच्चारित होते हैं)।
5 दिनांक नंदन नंदन के नंदन। ‘न’ और ‘द’ वर्णों की बार-बार आवृत्ति (दंत्य वर्ण)।
6 कालिंदी कूल कदंब की डारन। ‘क’ वर्ण की प्रधानता (कंठ्य वर्ण) है, साथ में दंत्य ध्वनि भी।
7 दीन दयाल दया करहु अब। ‘द’, ‘न’ और ‘य’, ‘ल’ जैसे दंत्य वर्णों का बाहुल्य है।
8 खग कुल कुल बोल रहा, किसलय का अंचल डोल रहा। यहाँ कंठ्य वर्ण – ख, ग, क (कंठ से उच्चारित) की आवृत्ति अधिक है, जिससे कानों को मधुरता मिलती है।
9 सदा सुखी रहते संसारी, सत्पथ पर जो चलते भारी। ‘स’, ‘द’, ‘त’, ‘थ’, ‘न’, ‘ल’ आदि दंत्य वर्णों का बाहुल्य है।
10 तात तनिक तुम तपो न भाई। ‘त’ वर्ग (त, न) के दंत्य वर्ण पूरे पद में छाए हैं।
एक लाइन का महा-मंत्र:
मुख के एक ही हिस्से से जब बोले जाएँ सारे अक्षर, कानों को जो मधुर लगे वह श्रुत्यानुप्रास है भाई मेरे सुंदर!

अंत्यानुप्रास अलंकार

  • परिभाषा: जहाँ छंद या कविता के चरणों (लाइनों) के अंत में एक जैसे स्वर या व्यंजनों के आने से समान तुकबंदी (Rhyming) बनती है, वहाँ अंत्यानुप्रास अलंकार होता है।
    सरल शब्दों में, यह कविता के अंत में मिलने वाली ‘तुक’ या ‘राइमिंग’ है। हमारी हिंदी की लगभग सभी चौपाइयाँ, दोहे, ग़ज़लें और गीत इसी अलंकार के कारण सुनने और गाने में इतने सुंदर लगते हैं। ‘अंत्या’ का मतलब ही होता है — अंत में आने वाला।
  • पहचानने की सबसे आसान व्यावहारिक ट्रिक: कविता की पहली लाइन का आखिरी शब्द और दूसरी लाइन का आखिरी शब्द बोलने में एक जैसे लगेंगे (जैसे: आए-जाए, कहानी-रानी, पाया-सिखाया)। अगर अंत में ऐसा तुक मिल जाए, तो वह अंत्यानुप्रास है।

अंत्यानुप्रास अलंकार के 10 प्रमुख उदाहरण और उनका स्पष्टीकरण:

क्र. उदाहरण स्पष्टीकरण
1 बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी। यहाँ ‘कहानी थी’ और ‘रानी थी’ के अंत में ‘आनी थी’ की समान तुकबंदी है।
2 जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर। ‘सागर’ और ‘उजागर’ के अंत में ‘आगर’ ध्वनि का मेल है।
3 लगा दी किसने आकर आग, कहाँ था तू संशय के नाग। ‘आग’ और ‘नाग’ के अंत में ‘आग’ ध्वनि की समानता है।
4 कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात, भरे भौन में करत हैं, नैननु ही सो बात। ‘लजियात’ और ‘बात’ के अंत में ‘आत’ ध्वनि की सुंदर तुकबंदी है।
5 गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन, नयन अमिय दूग दोष बिभंजन। ‘अंजन’ और ‘बिभंजन’ के अंत में ‘अंजन’ का समान उच्चारण है।
6 रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाइ बरु बचनु न जाई। ‘आई’ और ‘जाई’ के अंत में ‘आई’ स्वर की समानता है।
7 कालिंदी कूल कदंब की डारन, त्यों तुम श्याम के मन को थारन। ‘डारन’ और ‘थारन’ के अंत में ‘आरन’ ध्वनि की लय है।
8 प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी। ‘पानी’ और ‘समानी’ के अंत में ‘आनी’ ध्वनि का सुंदर मेल है।
9 माली आवत देखकर, कलियन करी पुकार, फूले-फूले चुन लिए, कालि हमारी बार। ‘पुकार’ और ‘बार’ के अंत में ‘आर’ ध्वनि की तुकबंदी है।
10 धीरज धर्म मित्र अरु नारी, आपद काल परखिए चारी। ‘नारी’ और ‘चारी’ के अंत में ‘आरी’ ध्वनि की समानता है।
एक लाइन का महा-मंत्र:
लाइन के अंत में जब मिल जाए सुंदर तुकबंदी का मेल, तो समझो वहाँ हो गया अंत्यानुप्रास का सारा खेल।

यमक अलंकार

  • परिभाषा: जहाँ काव्य में कोई शब्द दो या दो से अधिक बार आता है, लेकिन हर बार उसका अर्थ अलग-अलग होता है, वहाँ यमक अलंकार होता है।
    सरल शब्दों में, जब कविता की किसी पंक्ति में जुड़वा शब्द (एक जैसे दिखने वाले शब्द) दिखाई दें, लेकिन उनका मतलब बिलकुल अलग हो, तो उसे यमक अलंकार कहते हैं। यह एक बहुत ही प्रमुख शब्दालंकार है।
  • पहचानने की सबसे आसान व्यावहारिक ट्रिक: कविता में आपको एक ही शब्द कम से कम दो बार लिखा हुआ मिलेगा। जब आप उसका अर्थ निकालेंगे, तो दोनों जगह उसका अर्थ अलग-अलग निकलेगा। (याद रखें : एक ही शब्द दो बार, अलग अर्थ)

यमक अलंकार के 10 प्रमुख उदाहरण और उनका स्पष्टीकरण:

  1. “कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। वा खाये बौराए जग, या पाये बौराए।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘कनक’ शब्द दो बार आया है। पहले ‘कनक’ का अर्थ है धतूरा (एक नशीला फल) और दूसरे ‘कनक’ का अर्थ है सोना (स्वर्ण)।
  2. “काली घटा का घमंड घटा।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘घटा’ शब्द दो बार प्रयुक्त हुआ है। पहली ‘घटा’ का अर्थ है काले बादल और दूसरी ‘घटा’ का अर्थ है कम होना (घट जाना)।
  3. “तीन बेर खाती थी वे तीन बेर खाती हैं।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘बेर’ शब्द दो बार आया है। पहले ‘बेर’ का अर्थ है संख्या या बार (तीन बार) और दूसरे ‘बेर’ का अर्थ है ‘बेर’ नाम का फल।
  4. “सजना है मुझे सजना के लिए।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘सजना’ शब्द दो बार आया है। पहले ‘सजना’ का अर्थ है श्रृंगार करना (तैयार होना) और दूसरे ‘सजना’ का अर्थ है पति या प्रियतम।
  5. “जेते तुम तारे, तेते नभ में न तारे हैं।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘तारे’ शब्द दो बार आया है। पहले ‘तारे’ का अर्थ है उद्धार करना (कल्याण करना) और दूसरे ‘तारे’ का अर्थ है आसमान के सितारे।
  6. “ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहन वारी, ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहाती हैं।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘मन्दर’ शब्द दो बार आया है। पहले ‘मन्दर’ का अर्थ है ऊँचे-ऊँचे महल और दूसरे ‘मन्दर’ का अर्थ है पहाड़ की गुफाएं।
  7. “कहै कवि बेनी बेनी ब्याल की चुराई लीनी।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘बेनी’ शब्द दो बार आया है। पहले ‘बेनी’ का अर्थ है रीतिबद्ध काव्य के प्रसिद्ध कवि बेनी और दूसरे ‘बेनी’ का अर्थ है चोटी (बालों की चोटी)।
  8. “भजन कह्यो ताते भज्यो, भज्यो न एकौ बार। दूरी भजन जासों कह्यो, सो तू भज्यो गवार।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘भजन’ और ‘भज्यो’ शब्दों के दो अलग अर्थ हैं। एक जगह ‘भजन’ का अर्थ है भगवान की भक्ति करना और दूसरी जगह ‘भजन’ (भज्यो) का अर्थ है भाग जाना (दूर भागना)।
  9. “तोपर वारौ उरबसी सुनि राधिके सुजान। तू मोहन के उरबसी हवै उरबसी समान।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ ‘उरबसी’ शब्द तीन बार आया है। पहले उरबसी का अर्थ है ‘उर्वशी अप्सरा’, दूसरे उरबसी का अर्थ है ‘हृदय में बसी’ और तीसरे उरबसी का अर्थ है गले में पहना जाने वाला एक ‘आभूषण’।
  10. “सारंग ले सारंग चल्यो, कर सारंग की ओट। सारंग झीणों पाईके, सारंग कर गयो चोट।”
    स्पष्टीकरण: इस पद में ‘सारंग’ शब्द कई बार आया है और हर बार अर्थ अलग है। यहाँ सारंग के क्रमशः अर्थ हैं— घड़ा, सुंदरी (स्त्री), आँचल (कपड़ा), दीपक और हवा।
एक लाइन का महा-मंत्र:
एक शब्द जब दो बार आए और दोनों बार अलग अर्थ समझाए, तो वह बिना किसी उलझन के यमक अलंकार कहलाए।

श्लेष अलंकार

  • परिभाषा: श्लेष का शाब्दिक अर्थ होता है चिपका हुआ। जहाँ काव्य में कोई शब्द केवल एक ही बार प्रयुक्त होता है, लेकिन उस एक ही शब्द के साथ एक से अधिक अर्थ जुड़े या चिपके हुए होते हैं, वहाँ श्लेष अलंकार होता है।
    सरल शब्दों में, जब कविता की किसी पंक्ति में शब्द तो एक ही बार आए, लेकिन अलग-अलग व्यक्तियों, वस्तुओं या परिस्थितियों के संदर्भ में उसके दो या तीन अलग-अलग मतलब निकलते हों, तो उसे श्लेष अलंकार कहते हैं। यह एक अत्यंत चमत्कारिक शब्दालंकार है।
  • पहचानने की सबसे आसान व्यावहारिक ट्रिक: कविता में आपको कोई मुख्य शब्द केवल एक ही बार दिखाई देगा (यमक की तरह वह शब्द दोबारा नहीं लिखा होगा)। लेकिन जब आप उस पूरी पंक्ति का भाव समझेंगे, तो उस अकेले शब्द से कई अर्थ निकलते हुए प्रतीत होंगे। (याद रखें : शब्द एक बार, अर्थ अनेक बार, यही है श्लेष का त्योहार)

श्लेष अलंकार के 10 प्रमुख उदाहरण और उनका स्पष्टीकरण:

  1. “रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून।”
    स्पष्टीकरण: ‘पानी’ के तीन अर्थ—
    ▶ मोती के लिए चमक
    ▶ मनुष्य के लिए इज्जत
    ▶ चून (आटा / चूना) के लिए जल
  2. “चरन धरत चिंता करत, चितवत चारों ओर। सुबरन को खोजत फिरत, कबि, व्यभिचारी, चोर।”
    स्पष्टीकरण: ‘सुबरन’ के तीन अर्थ—
    ▶ कवि के लिए अच्छे शब्द (सु-वर्ण)
    ▶ व्यभिचारी के लिए अच्छा रूप-रंग
    ▶ चोर के लिए सोना (स्वर्ण)
  3. “जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय। बारे उजियारो करे, बढ़े अँधेरो होय।”
    स्पष्टीकरण: ‘बारे’ और ‘बढ़े’— दीपक के लिए: जलाने पर (बारे), बुझने पर (बढ़े); और कपूत के लिए: बचपन में (बारे), बड़ा होने पर (बढ़े)।
  4. “मंगन को देखि पट देत बार-बार है।”
    स्पष्टीकरण: ‘पट’ के दो अर्थ— वस्त्र (कपड़ा) और किवाड़ / दरवाजा।
  5. “मधुबन की छाती को देखो, सूखी इसकी कितनी कलियाँ।”
    स्पष्टीकरण: ‘कलियाँ’ के दो अर्थ—
    ▶ फूल के खिलने से पहले की अवस्था (कली)
    ▶ यौवन (जवानी) आने से पहले की अवस्था
  6. “विपति हरत, पूरण करत, सब को सुख उपजात। आए तुम सों राम तुम, बाजत आज अनात।”
    स्पष्टीकरण: ‘राम’ के दो अर्थ—
    ▶ भगवान श्री राम
    ▶ राजा / रक्षक
  7. “अजौं तस्योंना ही रहयौ, श्रुति सेवत इक अंग। नाक बास बेसरी लहयौ, तनु मुकुतन के संग।”
    स्पष्टीकरण: ‘तस्योंना’ = कान का आभूषण / जिसका उद्धार न हुआ हो; ‘श्रुति’ = कान / वेद।
  8. “रावन सिर सरोज बन चारी, चलि रघुबीर सिलीमुख धारी।”
    स्पष्टीकरण: ‘सिलीमुख’ = बाण (तीर) / भौंरा (भ्रमर)।
  9. “मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोई। जा तन की झाँई परै, स्याम हरित दुति होई।”
    स्पष्टीकरण: ‘हरित दुति’ के तीन अर्थ—
    ▶ हरे रंग का हो जाना
    ▶ प्रसन्न (खुश) हो जाना
    ▶ चमकहीन या फीका पड़ जाना
  10. “विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत।”
    स्पष्टीकरण: ‘वाणी’ के दो अर्थ—
    ▶ सरस्वती जी की पवित्र वाणी (आवाज)
    ▶ स्वयं माता सरस्वती का स्वरूप
एक लाइन का महामंत्र:
शब्द अकेला एक ही बार आए, पर अपने साथ कई अर्थ चिपका कर लाए, तो वह बिना किसी दुविधा के श्लेष अलंकार कहलाए।

वक्रोक्ति अलंकार

  • परिभाषा: वक्रोक्ति शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: वक्र + उक्ति। ‘वक्र’ का अर्थ होता है टेढ़ा और ‘उक्ति’ का अर्थ होता है कथन या बात।
    जहाँ कहने वाला (वक्ता) किसी बात को सीधे या साधारण अर्थ में कहता है, लेकिन सुनने वाला (श्रोता) जानबूझकर या अपनी चतुराई से उसका दूसरा टेढ़ा (व्यंग्यात्मक या मजाकिया) अर्थ निकाल लेता है, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है। इसमें अक्सर दो लोगों के बीच बातचीत या संवाद (Dialogue) जैसी स्थिति होती है। यह एक अत्यंत चमत्कारिक शब्दालंकार है।
  • वक्रोक्ति अलंकार के दो मुख्य भेद:
    1. श्लेष वक्रोक्ति: जहाँ शब्द के एक से अधिक अर्थ होने के कारण टेढ़ा अर्थ निकाला जाए।
    2. काकु वक्रोक्ति: जहाँ बोलने के लहजे या आवाज के उतार-चढ़ाव के कारण टेढ़ा अर्थ निकाला जाए।
  • पहचानने की सबसे आसान व्यावहारिक ट्रिक: कविता की पंक्तियों में आपको दो लोगों के बीच हो रही बातचीत (सवाल-जवाब) साफ़ दिखाई देगी। कहने वाले की बात का जवाब सामने वाला बिल्कुल उलट या अलग ढंग से देता है।

वक्रोक्ति अलंकार के 5 प्रमुख उदाहरण और उनका सटीक स्पष्टीकरण:

क्र. उदाहरण स्पष्टीकरण
1
“को तुम? — हौं घनश्याम हम।”

 

“तौ बरसो कितहूँ जाइ।”
यहाँ ‘घनश्याम’ का पहला अर्थ कृष्ण (नाम) है और दूसरा अर्थ काले बादल। राधा जी दूसरा अर्थ लेकर कहती हैं कि अगर तुम बादल हो तो यहाँ क्या कर रहे हो?
2
“भिक्षुक गो कित कौ गिरिजे?”

 

“सो तौ माँगन को बलि-द्वार गयौं री।”
यहाँ ‘भिक्षुक’ का पहला अर्थ शिव जी (जो भीख माँगते हैं) और दूसरा अर्थ वामन अवतार (जो राजा बलि से तीन पग भूमि माँगने गए) है।
3
“कौन द्वार पर?”

 

“हरि मैं राधे।”

 

“क्या वानर का काम यहाँ?”
‘हरि’ का पहला अर्थ कृष्ण और दूसरा अर्थ वानर (बंदर) है। राधा जी दूसरा अर्थ लेकर कहती हैं कि अगर तुम वानर हो तो घर में क्या काम?
4
“कहा कौशल्या ने सखे! राम गए वनवास।”

 

“पुत्र वियोगी तात क्या, जिएँगे अब इस आस?”
यहाँ सुनने वाला (सखा) बोलने के लहजे (काकु) से टेढ़ा अर्थ निकालता है कि क्या पुत्र-वियोग में तड़पने वाले दशरथ जीवित रहेंगे? (अर्थात नहीं रहेंगे)।
5
“एक कबूतर देख हाथ में, पूछा कहाँ अपर है?”

 

“उसने कहा अपर कैसा! वह उड़ गया सफर है।”
‘अपर’ का पहला अर्थ दूसरा (कबूतर) और दूसरा अर्थ अ + पर = बिना परों (पंखों) का। कबूतर के पंख थे, इसलिए वह उड़ गया (सफ़र कर गया)।
एक लाइन का महा-मंत्र:
कहने वाला सीधी बात कहे पर सुनने वाला जानबूझकर टेढ़ा अर्थ लगाए, दो लोगों की उस सुंदर बातचीत को दुनिया वक्रोक्ति अलंकार बताए।

वक्रोक्ति अलंकार के 7 सबसे अचूक संकेत बिंदु (ट्रिक्स)

  1. संवाद या बातचीत का ढांचा (Dialogue Format):
    संकेत: इस अलंकार की सबसे पहली पहचान यह है कि कविता की पंक्तियाँ किसी एक व्यक्ति का भाषण नहीं होतीं, बल्कि दो लोगों के बीच हो रही बातचीत या सवाल-जवाब के रूप में होती हैं।
    उदाहरण से समझिए: जब राधा पूछती हैं “को तुम?” (तुम कौन हो?) और कृष्ण उत्तर देते हैं “हौं घनश्याम हम” (मैं घनश्याम हूँ)। यहाँ साफ़ तौर पर दो लोगों के बीच बातचीत का ढांचा दिखाई दे रहा है।
  2. वक्ता और श्रोता की मौजूदगी:
    संकेत: पंक्तियों को पढ़ते ही आपको दो चरित्र साफ़ नज़र आएँगे— एक बात को कहने वाला (वक्ता) और दूसरा उस बात को सुनकर उसका उत्तर देने वाला (श्रोता)।
    उदाहरण से समझिए: जहाँगीर जब नूरजहाँ से पूछता है, “कहाँ अपर है?” तो यहाँ जहाँगीर वक्ता है और नूरजहाँ श्रोता है, जो तुरंत उसका जवाब देती है।
  3. जानबूझकर गलत अर्थ निकालना (Intention):
    संकेत: सुनने वाला सामने वाले की बात को समझता तो सही है, लेकिन वह शरारत, मज़ाक या चालाकी के कारण जानबूझकर उसका दूसरा टेढ़ा अर्थ प्रकट करता है।
    उदाहरण से समझिए: राधा जी अच्छी तरह जानती थीं कि दरवाजे पर कृष्ण हैं, लेकिन उन्होंने जानबूझकर ‘हरि’ शब्द का अर्थ ‘वानर’ (बंदर) निकाल लिया और कहा, “क्या वानर का काम यहाँ?”
  4. अनेकार्थी शब्दों का जाल (Double Meaning Words):
    संकेत: वक्ता जिस मुख्य शब्द का प्रयोग करता है, वह शब्द हमेशा ‘अनेकार्थी’ (जिसके एक से ज्यादा मतलब हों) होता है। इसी वजह से यह श्लेष वक्रोक्ति बनता है।
    उदाहरण से समझिए: लक्ष्मी जी जब पार्वती जी से शिव जी के बारे में पूछती हैं, “भिक्षुक गो कित कौ गिरिजे?” तो यहाँ ‘भिक्षुक’ शब्द के दो अर्थ हैं (एक शिव जी और दूसरा विष्णु जी का वामन अवतार)।
  5. बोलने के लहजे या आवाज का उतार-चढ़ाव (Tone of Voice):
    संकेत: कई बार शब्द के दो अर्थ नहीं होते, बल्कि सुनने वाला अपनी आवाज़ के लहजे को इस तरह बदलता है कि साधारण बात भी एक सवाल या उल्टे अर्थ में बदल जाती है (काकु वक्रोक्ति)।
    उदाहरण से समझिए: “पुत्र वियोगी तात क्या, जिएँगे अब इस आस?” यहाँ साधारण वाक्य को भी बोलने के ढंग से एक गहरे प्रश्नवाचक दुख में बदल दिया गया है, जिसका मतलब निकलता है कि वे अब जीवित नहीं बचेंगे।
  6. शब्दों को तोड़कर नया अर्थ बनाना (Word Splitting):
    संकेत: सुनने वाला वक्ता के शब्द को बीच में से तोड़कर (संधि विच्छेद करके) एक नया ही अर्थ सामने रख देता है।
    उदाहरण से समझिए: जहाँगीर ने ‘अपर’ का मतलब ‘दूसरा’ पूछा था, लेकिन नूरजहाँ ने उसे ‘अ-पर’ (बिना पंखों वाला) समझकर कबूतर को उड़ा दिया और कहा, “वह उड़ गया सफ़र है” (स-पर = पंखों के साथ)।
  7. तात्कालिक उत्तर (हाजिरजवाबी):
    संकेत: वक्ता की बात खत्म होते ही श्रोता बिना देर किए तुरंत ऐसा करारा या मज़ाकिया जवाब देता है कि वक्ता की बोलती बंद हो जाती है।
    उदाहरण से समझिए: जैसे ही कृष्ण ने कहा कि मैं ‘घनश्याम’ हूँ, राधा जी ने तुरंत हाजिरजवाबी दिखाते हुए कह दिया, “तौ बरसो कितहूँ जाइ” (तो फिर यहाँ क्या कर रहे हो, कहीं और जाकर बरसो)।

वक्रोक्ति और श्लेष अलंकार में तुलनात्मक अंतर

तुलना का आधार श्लेष अलंकार वक्रोक्ति अलंकार
मूल अर्थ श्लेष का अर्थ है — चिपका हुआ। यहाँ एक ही शब्द में कई अर्थ चिपके होते हैं। वक्रोक्ति का अर्थ है — टेढ़ा कथन। यहाँ सीधी बात का टेढ़ा अर्थ निकाला जाता है।
अनिवार्य शर्त (संवाद) इसमें किसी बातचीत या संवाद का होना ज़रूरी नहीं है। यह किसी एक व्यक्ति का साधारण कथन भी हो सकता है। इसमें दो लोगों के बीच संवाद (बातचीत या सवाल-जवाब) का होना सबसे पहली और अनिवार्य शर्त है।
पात्रों की भूमिका इसमें केवल एक वक्ता (कवि या लेखक) होता है, जो अपनी बात चमत्कारी ढंग से कहता है। इसमें दो पात्र होते हैं— एक बात को कहने वाला (वक्ता) और दूसरा उसका उल्टा जवाब देने वाला (श्रोता)।
श्रोता की चतुराई या मज़ाक इसमें श्रोता की किसी चतुराई या मज़ाक का कोई रोल नहीं होता। इसमें सारा चमत्कार श्रोता की चतुराई, शरारत या हाजिरजवाबी पर ही टिका होता है।
चमत्कार का केंद्र इसका चमत्कार केवल शब्द के अर्थ की परतों को खोलने में होता है। इसका चमत्कार सामने वाले को करारा या मज़ाकिया जवाब (Reply) देने में होता है।
कार्यप्रणाली शब्द एक बार आता है, पाठक उसके एक से अधिक अर्थ निकालकर कविता का आनंद लेता है। वक्ता एक शब्द बोलता है, श्रोता जानबूझकर उसका दूसरा अर्थ पकड़कर वक्ता को निरुत्तर कर देता है।
सटीक उदाहरण “मंगन को देखि पट देत बार-बार है।” (यहाँ केवल एक कथन है कि भिखारी को देख पट यानी वस्त्र या दरवाजा देते / बंद करते हैं।) “कौन द्वार पर? हरि मैं राधे। क्या वानर का काम यहाँ?” (यहाँ राधा-कृष्ण की बातचीत है, जहाँ हरि का अर्थ वानर लेकर मज़ाक किया गया है।)

दोनों का आपसी संबंध (इनका जुड़ाव कहाँ होता है?)

इन दोनों का संबंध श्लेष वक्रोक्ति के रूप में सामने आता है:
जब कोई वक्ता कोई बात कहता है और श्रोता उसकी बात में मौजूद किसी द्विअर्थी (श्लेष युक्त) शब्द का फायदा उठाकर उसका टेढ़ा अर्थ निकाल लेता है और तुरंत जवाब दे देता है, तब वहाँ श्लेष और वक्रोक्ति दोनों का मिला-जुला रूप यानी श्लेष वक्रोक्ति बनता है।
संक्षेप में कहें तो श्लेष अलंकार केवल एक शब्द का जाल है, जबकि वक्रोक्ति अलंकार उस जाल का उपयोग करके खेला जाने वाला दो लोगों के बीच का एक मज़ाकिया या व्यंग्यात्मक खेल है।

शब्दालंकार के 4 प्रमुख भेदों का तुलनात्मक चार्ट

अलंकार का नाम मुख्य पहचान की जादुई ट्रिक शब्द या वर्ण की स्थिति सबसे सरल उदाहरण उदाहरण का स्पष्टीकरण
1. अनुप्रास अलंकार वर्णों या अक्षरों का बार-बार दोहराव होना। एक ही अक्षर (वर्ण) तीन या तीन से अधिक बार लगातार आता है। तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए। यहाँ ‘त’ अक्षर की आवृत्ति पाँच बार हुई है।
2. यमक अलंकार एक जैसे दिखने वाले जुड़वा शब्द आना। एक ही शब्द कम से कम दो बार लिखकर आता है, पर अर्थ अलग होता है। काली घटा का घमंड घटा। यहाँ पहले ‘घटा’ का अर्थ बादल है और दूसरे ‘घटा’ का अर्थ कम होना है।
3. श्लेष अलंकार एक ही शब्द में कई अर्थों का छिपा या चिपका होना। मुख्य शब्द केवल एक ही बार आता है, लेकिन उसके मतलब अनेक निकलते हैं। मंगन को देखि पट देत बार-बार है। यहाँ ‘पट’ शब्द एक ही बार आया है, जिसके दो अर्थ हैं: वस्त्र और दरवाजा।
4. वक्रोक्ति अलंकार सीधी बात का जानबूझकर टेढ़ा या मज़ाकिया अर्थ निकालना। दो लोगों के बीच संवाद (Dialogue) होता है, जहाँ श्रोता अर्थ बदल देता है। को तुम? – हौं घनश्याम हम। तौ बरसो कितहूँ जाइ। कृष्ण ने अपना नाम ‘घनश्याम’ बताया, पर राधा ने उसका अर्थ ‘काले बादल’ लेकर मज़ाक किया।

2. अर्थालंकार (Arthalankar)

  • परिभाषा: जहाँ काव्य में शब्दों के स्थान पर उनके अर्थ के कारण सौंदर्य, चमत्कार या आकर्षण उत्पन्न होता है, वहाँ अर्थालंकार होता है। यहाँ यदि शब्द का पर्यायवाची भी रख दिया जाए, तो भी अलंकार का सौंदर्य नष्ट नहीं होता।

अर्थालंकार के प्रकार:

1. अतिशयोक्ति अलंकार (Trick: “हद पार” या “गप्प मारना”)
  • पहचानने की ट्रिक: इसमें किसी बात को इतना बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाता है जिसकी लोक-सीमा में संभावना ही न हो। काव्य का अर्थ निकालते ही आपको लगेगा कि यह तो “सरासर गप्प” या “असंभव बात” है।
  • याद रखने का कीवर्ड: लोक-सीमा पार (बढ़ा-चढ़ाकर कहना)
  • उदाहरण: “हनुमान की पूंछ में लगन न पाई आग, लंका सिगरी जल गई गए निसाचर भाग।” (आग लगने से पहले ही लंका जल गई अर्थात बात बहुत बढ़ा दी गई है)
2. भ्रांतिमान अलंकार (Trick: “गलती से मान लेना” या “Action ले लेना”)
  • पहचानने की ट्रिक: जब किसी एक वस्तु को दूसरी वस्तु समझकर भ्रम (गलती) में कोई काम (Action) कर दिया जाता है या उसे पक्का मान लिया जाता है। इसके पदों में अक्सर ‘जानि’, ‘समुझि’, ‘भ्रम’ जैसे शब्द छिपे होते हैं।
  • याद रखने का कीवर्ड: भ्रम + क्रिया / कार्य (धोखे से सच मान लेना)
  • उदाहरण: “नाक का मोती अधर की कांति से, बीज दाड़िम का समझकर भ्रांति से, देख उसको ही हुआ शुक मौन है, सोचता है अन्य शुक यह कौन है।” (नाक के मोती को तोते ने अनार का दाना समझ लिया और वह सोच में पड़ गया)
☆ भ्रांतिमान और संदेह में अंतर की सुपर ट्रिक:
  • भ्रांतिमान: भ्रम में इंसान काम कर बैठता है (जैसे रस्सी को साँप समझकर लाठी मारना)।
  • संदेह: इंसान दुविधा में खड़ा रहता है (जैसे यह रस्सी है या साँप? पता नहीं चल रहा)।
3. संदेह अलंकार (Trick: “पक्का न होना” या “Confusion”)
  • पहचानने की ट्रिक: इसमें अंत तक असमंजस या दुविधा बनी रहती है कि ‘यह है या वह है?’ का संशय चलता रहता है, निर्णय नहीं हो पाता। इसकी पहचान के लिए काव्य में ‘किधौं’, ‘या’, ‘अथवा’, ‘कि’ जैसे शब्द मिलते हैं।
  • याद रखने का कीवर्ड: संशय / डाउट (संदेह अंत तक बना रहे)
  • उदाहरण: “सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है, कि सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है।” (नारी और साड़ी में अंत तक दुविधा बनी हुई है)
4. विभावना अलंकार (Trick: “बिना कारण के काम होना”)
  • पहचानने की ट्रिक: जहाँ कारण (साधन) के न होने पर भी कार्य हो जाए। बिना पैर के चलना, बिना हाथ के काम होना। इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि काव्य में ‘बिनु’, ‘बिना’ या ‘रहित’ शब्द आते हैं।
  • याद रखने का कीवर्ड: कारण गायब = कार्य चालू
  • उदाहरण: “बिनु पद चलै सुनै बिनु काना, कर बिनु करम करै बिधि नाना।” (बिना पैर के चलना और बिना कान के सुनना)
5. विरोधाभास अलंकार (Trick: “उल्टी बात” या “Opposite”)
  • पहचानने की ट्रिक: जहाँ वास्तविक विरोध न होने पर भी केवल देखने / सुनने में बात एक-दूसरे के विपरीत (उल्टी) लगे। जब आप उसका गहरा अर्थ निकालेंगे, तब वह विरोध खत्म हो जाएगा।
  • याद रखने का कीवर्ड: विलोम शब्द जैसा जोड़ (जैसे- शीतल और आग, मीठा और तीखा एक साथ आना)।
  • उदाहरण: “या अनुरागी चित की, गति समुझै नहिं कोई। ज्यों-ज्यों बूड़े श्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होइ।” (काले रंग में डूबने से कोई उज्ज्वल कैसे हो सकता है? पर अर्थ यह है कि कृष्ण की भक्ति में डूबने से मन पवित्र होता है)

अतिशयोक्ति अलंकार

  • परिभाषा: जब किसी बात को इतना बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाए कि लोक मर्यादा या लोक-सीमा का उल्लंघन हो जाए (यानी जो सामान्य रूप से संभव न लगे), वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
    सरल शब्दों में: जहाँ किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना का वर्णन बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर किया जाता है, उसे अतिशयोक्ति अलंकार कहते हैं। इसका उपयोग काव्य में सुंदरता और प्रभाव पैदा करने के लिए किया जाता है।

अतिशयोक्ति अलंकार के 10 प्रमुख और प्रसिद्ध उदाहरण:

  1. हनुमान जी की पूँछ का उदाहरण:
    “हनुमान की पूंछ में लगन न पाई आग, लंका सिगरी जल गई, गए निसाचर भाग।”
    समझें: यहाँ कहा गया है कि हनुमान जी की पूँछ में अभी आग लग भी नहीं पाई थी कि पूरी लंका जलकर राख हो गई और राक्षस भाग गए। आग लगने से पहले ही लंका का जल जाना बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहना है।
  2. महाराणा प्रताप के चेतक का उदाहरण:
    “आगे नदियाँ पड़ी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार। राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार।”
    समझें: महाराणा प्रताप अभी नदी पार करने के बारे में सोच ही रहे थे कि उनके सोचने मात्र से ही चेतक (घोड़े) ने इतनी बड़ी नदी को पार कर लिया। सोचने की गति से घोड़े का नदी पार करना अतिशयोक्ति है।
  3. सुदामा की दीन दशा पर कृष्ण के आँसू:
    “देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुनानिधि रोये। पानी परात को हाथ छुयो नहीं, नैनन के जल सों पग धोये।”
    समझें: जब सुदामा जी कृष्ण से मिलने आए, तो कृष्ण इतने भावुक हुए कि उन्होंने पैर धोने के लिए परात के पानी को छुआ तक नहीं, बल्कि अपने आँखों के आँसुओं से ही सुदामा के पैर धो दिए। आँखों के पानी से पैर धुल जाना अत्यधिक वर्णन है।
  4. धनुष टूटने का प्रभाव:
    “भूप सहस दस एकहीं बारा। लगे उठावन टरत न टारा।”
    समझें: सीता स्वयंवर में जब दस हजार राजा एक साथ मिलकर भी धनुष को उठाने लगे, तब भी वह अपनी जगह से हिला तक नहीं। दस हजार लोगों का एक साथ एक ही धनुष को उठाना असंभव सा वर्णन है।
  5. साकेत नगरी (अयोध्या) का वर्णन:
    “देख लो साकेत नगरी है यही, स्वर्ग से मिलने गगन में जा रही।”
    समझें: यहाँ साकेत नगरी के महलों की ऊँचाई का वर्णन करते हुए कहा गया है कि ये महल इतने ऊँचे हैं कि स्वर्ग से मिलने आसमान में जा रहे हैं।
  6. बाण छूटने से पहले ही शत्रु का मरना:
    “बान मुँह से छूटने पाए न थे, कि शत्रु के सिर कटकर गिर पड़े।”
    समझें: अभी धनुष से बाण निकला भी नहीं था कि सामने वाले शत्रुओं के सिर कटकर नीचे गिर गए। कार्य होने से पहले ही परिणाम का आ जाना अतिशयोक्ति है।
  7. सुकुमारता (कोमलता) का वर्णन:
    “पायन नूपुर सोहैं भली, छुवत ही कुंभिलानी सुहाई।”
    समझें: यहाँ किसी नायिका की कोमलता का ऐसा वर्णन है कि पैरों में पायल बाँधने या उसे छूने मात्र से ही वह कुम्हला (मुरझा) जाती है।
  8. आँखों के काजल और आँसुओं का वर्णन:
    “अंसुवन जल सींचि-सींचि प्रेम-बेली बोई।”
    समझें: मीराबाई कहती हैं कि उन्होंने अपने आंसुओं के जल से सींच-सींचकर प्रेम की बेल को बड़ा किया है। आँसुओं से बेल का सींचा जाना और उसका बढ़ना लोक सीमा से परे है।
  9. रूप सौंदर्य का प्रभाव:
    “बाँधा था विधु को किसने इन काली जंजीरों से, मणियों वाले फणियों का मुख क्यों भरा हुआ हीरों से?”
    समझें: यहाँ जयशंकर प्रसाद जी ने नायिका के मुख को चंद्रमा (विधु), बालों को काली जंजीरें और मांग के मोतियों को हीरों से भरा साँप कहा है। सौंदर्य का यह वर्णन अत्यंत बढ़ा-चढ़ाकर किया गया है।
  10. युद्ध में वीरता का वर्णन:
    “करत साथ ही तेहि सर संधाना, भयउ बिकल कतई नहिं जाना।”
    समझें: युद्ध वर्णन में कहा गया है कि जैसे ही धनुष पर बाण संधान किया गया (चढ़ाया गया), वैसे ही दिशाएँ कांप उठीं और शत्रुओं को समझ नहीं आया कि वे कहाँ जाएँ। बाण चलाने से पहले ही पूरी प्रकृति का व्याकुल हो जाना अतिशयोक्ति का सुंदर उदाहरण है।

भ्रांतिमान अलंकार

  • परिभाषा: जब किसी पद में किसी वस्तु के सादृश्य (एक जैसा दिखने) के कारण भ्रमवश दूसरी वस्तु का निश्चय हो जाता है, तब वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है।
    सरल शब्दों में: जब हम किसी एक चीज़ को उसके रूप, रंग या आकार की समानता के कारण पूरी तरह से कोई दूसरी चीज़ मान लेते हैं और उसी के अनुसार क्रिया भी कर बैठते हैं, तो उसे भ्रांतिमान अलंकार कहते हैं। इसमें भ्रम पक्का होता है (संदेह नहीं रहता)।

भ्रांतिमान अलंकार के 10 प्रमुख और प्रसिद्ध उदाहरण:

  1. तोते की नाक और अनार के दाने का उदाहरण:
    “नाक का मोती अधर की कांति से, बीज दाड़िम का समझकर भ्रांति से, देखकर सहसा हुआ शुक मौन है, सोचता है अन्य शुक यह कौन है।”
    समझें: यहाँ लक्ष्मण जी की पत्नी उर्मिला की नाक के मोती को तोता अनार का दाना समझ बैठता है और उनकी लाल नाक को दूसरा तोता समझकर भ्रम में पड़ जाता है।
  2. हाथी और सर्प का उदाहरण:
    “शुक तोंड में कली कीन की लखि ज्यों भयो आनंद, द्विरद उठायो सुंड में लेवन को मकरंद।”
    समझें: एक हाथी ने तोते की लाल चोंच को पलाश का फूल समझ लिया और तोते ने हाथी की सूँड को काली सर्प की बामी समझ लिया। दोनों एक-दूसरे को पकड़ने की कोशिश करते हैं।
  3. ओस की बूंदों और मोतियों का उदाहरण:
    “ओस बिंदु चुग रही हंसिनी, मोती उनको जान।”
    समझें: यहाँ हंसिनी ओस की बूंदों को उनके चमकते रूप के कारण असली मोती समझ बैठती है और उन्हें चुगने (खाने) लगती है। रूप की समानता से यहाँ पक्का भ्रम हुआ है।
  4. काले बादलों और हाथियों का उदाहरण:
    “घन घमंड नभ गरजत घोरा, प्रिया हीन डरपत मन मोरा। दामिनि दमक रह न घन माहीं, खल कै प्रीति थिर नाहीं।”
    समझें: यहाँ बादलों की सघनता और उनके रंग को देखकर मतवाले हाथियों का भ्रम हो जाता है। बादलों के गर्जन को हाथियों की चिंघाड़ मान लिया जाता है।
  5. साँप और रस्सी का उदाहरण:
    “रज्जु देखि अही जानि के, भागेउ जथा भयल परान।”
    समझें: मार्ग में पड़ी हुई एक साधारण रस्सी को देखकर किसी व्यक्ति को यह पक्का विश्वास हो जाता है कि वह साँप है, और वह डरकर अपने प्राण बचाने के लिए वहाँ से भाग खड़ा होता है।
  6. अंधेरे में परछाई का उदाहरण:
    “तरू छाया में खड़ा था कोई, प्रेत समझ कर जनता रोई।”
    समझें: रात के समय पेड़ की परछाई को लोगों ने सचमुच का भूत (प्रेत) मान लिया और डर के मारे चिल्लाने और रोने लगे। परछाई को पूरी तरह प्रेत समझ लेना भ्रांतिमान है।
  7. गोपी और कृष्ण का उदाहरण:
    “जमुना तट हरी खेलत थे, राधिका आई वहाँ धाई, स्याम घटा समझी तिनको, मोरन ने धुनि मचाई।”
    समझें: यमुना के किनारे श्रीकृष्ण को देखकर वहाँ वन के मोरों को लगा कि आकाश में श्याम (काले) बादल छा गए हैं। बादलों के भ्रम में मोर जोर-जोर से बोलने और नाचने लगे।
  8. कमल और भौंरे का उदाहरण:
    “पुहुप कली समझि कै अलि गयो, तहाँ बैठ्यो आनंद मानि।”
    समझें: एक भौंरा किसी सुंदर वस्त्र के लाल रंग को असली फूल की कली समझ बैठता है और रसपान करने के लिए उस पर जाकर बैठ जाता है। रंग की समानता ने यहाँ भ्रम पैदा किया है।
  9. पाँवों के महावर (रंग) का उदाहरण:
    “जानी स्याम घनस्याम को, नाच उठे बन मोर।”
    समझें: जब श्रीकृष्ण वन में विचरण कर रहे थे, तो उनके सांवले शरीर को देखकर जंगलों के मोरों को काले बादलों (घनश्याम) का भ्रम हो गया और वे खुशी से नाचने लगे।
  10. सुकुमारता और अंगों का उदाहरण:
    “कुमुदनी समझि रजनीपति को, अलि दौड़्यो रस लेन।”
    समझें: रात के समय चंद्रमा की अत्यधिक उज्ज्वल किरणों को देखकर भौंरा भ्रमित हो जाता है। वह चंद्रमा को ही कुमुदनी (फूल) समझ बैठता है और उसका रस लेने के लिए उसकी ओर उड़ पड़ता है।
भ्रांतिमान अलंकार की पहचान:
रूप, रंग या आकार की समानता के कारण किसी एक वस्तु को दूसरी वस्तु समझकर उसी के अनुसार क्रिया कर बैठना।

संदेह अलंकार

  • परिभाषा: जहाँ किसी वस्तु के रूप, रंग या सादृश्यता को देखकर यह निश्चित न हो पाए कि वह वस्तु वास्तव में क्या है, अर्थात जहाँ अंत तक मन में संशय या दुविधा बनी रहे कि “यह वस्तु ‘अ’ है या ‘ब'”, वहाँ संदेह अलंकार होता है।
    सरल शब्दों में: जब उपमेय और उपमान में इतनी अधिक समानता हो कि यह तय करना मुश्किल हो जाए कि असली वस्तु कौन सी है और मन में दुविधा बनी रहे, उसे संदेह अलंकार कहते हैं। भ्रांतिमान अलंकार में भ्रम पक्का हो जाता है (लोग रस्सी को साँप मान लेते हैं), लेकिन संदेह अलंकार में निर्णय नहीं हो पाता (मन सोचता रहता है कि रस्सी है या साँप)।
  • इसके वाचक शब्द: मुख्य रूप से या, अथवा, कि, कैधों, की आदि।

संदेह अलंकार के 10 प्रमुख और प्रसिद्ध उदाहरण:

क्रम उदाहरण समझें (व्याख्या)
1 सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है, सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है। चीरहरण में दुशासन के साड़ी खींचने पर यह संशय होता है कि साड़ी के बीच में नारी है या नारी के बीच में साड़ी है।
2 कैधों व्योम बीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु, वीर रस वीर तरवारि सी उधारी है। लंका दहन के समय हनुमान जी की पूँछ की भयानक आग को देखकर संशय होता है कि क्या आकाश में धूमकेतु हैं या वीर ने तलवार म्यान से निकाली है।
3 यह मुख है या चंद्र है। सुंदरी के मुख को देखकर यह निश्चित नहीं हो पाता कि वह सुंदर मानवीय मुख है या साक्षात चंद्रमा है।
4 की वीर रसाश्रय अथवा, सुरपति के सुत बारह दोऊ। वन मार्ग में राम-लक्ष्मण को देखकर संशय होता है कि क्या वे वीर रस के आश्रय हैं या इंद्रदेव के दो पराक्रमी पुत्र हैं।
5 किधौं यह मदन गोपाल की माधुरी है, किधौं ऋतुराज को विलास मन भायो है। सुंदरता को देखकर दुविधा है कि यह श्रीकृष्ण की मधुर छवि है या ऋतुराज बसंत का कोई मनमोहक विलास है।
6 तारा घट यह कि नभ मंडल, कछु समझ न पड़ता भाई। आकाश में टिमटिमाते तारों को देखकर यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि यह तारों का समूह है या पूरा अंतरिक्ष मंडल है।
7 यह काया है या शेष उसी की छाया, क्षणिक वासना की क्रूर नभ में माया। अत्यधिक कमजोर विरहणी को देखकर संशय होता है कि यह उसका शरीर है या केवल उसकी परछाई मात्र बची है।
8 यह मार्ग में सर्प पड़ा है या केवल रस्सी है। धुंधलके में टेढ़ी-मेढ़ी वस्तु देखकर मन अंत तक निर्णय नहीं कर पाता कि वह भयानक साँप है या साधारण रस्सी।
9 स्याम घटा उमड़ी नभ में अथवा तम का सागर लहराया। आकाश में छाए काले बादलों को देखकर यह निश्चित नहीं हो पा रहा कि काले बादल घिरे हैं या अंधकार का समुद्र लहरा रहा है।
10 मानव हो तुम या कोई देवदूत आए हो। किसी व्यक्ति के असाधारण कार्यों और दिव्य तेज को देखकर संशय बना रहता है कि वह सामान्य मनुष्य है या ईश्वर का भेजा कोई देवदूत है।
याद रखने का महा-मंत्र:
जहाँ मन में अंत तक संशय या दुविधा बनी रहे कि “यह ‘अ’ है या ‘ब'”, वहाँ संदेह अलंकार होता है।

संदेह अलंकार और भ्रांतिमान अलंकार में अंतर

संदेह अलंकार और भ्रांतिमान अलंकार दोनों ही सादृश्यमूलक (समानता पर आधारित) अलंकार हैं और दोनों में ही उपमेय और उपमान के बीच रूप-रंग की अत्यधिक समानता के कारण दुविधा उत्पन्न होती है। इसी वजह से अक्सर विद्यार्थी इन दोनों में भ्रमित हो जाते हैं।
अंतर का आधार संदेह अलंकार (Doubt) भ्रांतिमान अलंकार (Illusion/Mistake)
1. मूल प्रकृति इसमें मन में केवल संशय या दुविधा बनी रहती है, कोई अंतिम निर्णय नहीं हो पाता। इसमें भ्रम पक्का हो जाता है और एक वस्तु को दूसरी वस्तु मान लिया जाता है।
2. निश्चय की स्थिति इसमें अनिश्चय की स्थिति अंत तक बनी रहती है (“यह है या वह है”)। इसमें गलत बात का पक्का निश्चय (निश्चित ज्ञान) हो जाता है।
3. कार्य / क्रिया होना दुविधा के कारण व्यक्ति कोई क्रिया या कार्य नहीं कर पाता, केवल सोचता रहता है। भ्रम पक्का होने के कारण व्यक्ति उसी के अनुसार क्रिया या कार्य भी कर बैठता है।
4. वाचक शब्द इसमें ‘या’, ‘अथवा’, ‘कि’, ‘किधौं’, ‘कैधों’ जैसे संशय सूचक शब्द आते हैं। इसमें ‘समुझि’, ‘जानि’, ‘भ्रांति’, ‘मानि’ जैसे निश्चय सूचक शब्द आते हैं।
5. मानसिक अवस्था बुद्धि दो विचारों के बीच झूलती रहती है (संदेह बना रहता है)। बुद्धि एक विचार को सत्य मानकर बैठ जाती है (चाहे वह गलत ही क्यों न हो)।
6. सरल उदाहरण मार्ग में पड़ी रस्सी को देखकर यह सोचना कि — “यह सांप है या रस्सी?” मार्ग में पड़ी रस्सी को सचमुच सांप समझकर डरकर भाग जाना।

उदाहरणों के माध्यम से अंतर को विस्तार से समझें:

  • संदेह अलंकार का विस्तृत पक्ष:
    “सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है, सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है।”
    स्पष्टीकरण: महाभारत के चीरहरण प्रसंग के इस उदाहरण में दुशासन द्रौपदी की साड़ी खींचते-खींचते थक जाता है, लेकिन साड़ी समाप्त नहीं होती। वहाँ बैठे लोगों के मन में अंत तक यह दुविधा बनी रहती है कि नारी के बीच में साड़ी है या साड़ी के बीच में नारी है। वे किसी एक निर्णय पर नहीं पहुंच पाते। यह संदेह है।
  • भ्रांतिमान अलंकार का विस्तृत पक्ष:
    “ओस बिंदु चुग रही हंसिनी, मोती उनको जान।”
    स्पष्टीकरण: यहाँ हंसिनी ओस की बूंदों को चमक के कारण केवल संदेह की दृष्टि से नहीं देख रही है, बल्कि उसने पक्का निश्चय कर लिया है कि ये ओस की बूंदें ही मोती हैं। इसी भ्रामक निश्चय के कारण वह उन्हें खाने (चुगने) की क्रिया भी करने लगती है। यह भ्रांतिमान है।
संक्षेप में: जहाँ अंत तक “अथवा / या” का विकल्प बना रहे, वह संदेह अलंकार है; और जहाँ अज्ञानवश किसी वस्तु को कुछ और ही “समझ / जान” लिया जाए और तदनुसार कार्य कर दिया जाए, वह भ्रांतिमान अलंकार है।

विभावना अलंकार

  • परिभाषा: काव्य में जहाँ कारण (Cause) के न होने पर भी कार्य (Effect) का होना पाया जाता है, वहाँ विभावना अलंकार होता है।
    सरल शब्दों में, सामान्य रूप से किसी भी काम को पूरा करने के लिए किसी साधन या कारण की जरूरत होती है, लेकिन जब कविता में बिना किसी साधन या कारण के ही काम का होना दर्शाया जाए, तो उसे विभावना अलंकार कहते हैं। यह अलंकार विशेष रूप से अलौकिक या चमत्कारी स्थितियों को दिखाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  • विभावना अलंकार के वाचक शब्द: पदों में प्रायः निम्नलिखित शब्दों का प्रयोग देखने को मिलता है — • बिनु (बिना) • बिना • बिन • रहित • नहिं (कारण के अभाव को दर्शाने वाले शब्द)।

विभावना अलंकार के 10 प्रमुख और प्रसिद्ध उदाहरण:

क्रम उदाहरण (पद) समझें (व्याख्या)
1 बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना, कर बिनु करम करइ बिधि नाना। आनन रहित सकल रस भोगी, बिनु बानी बकता बड़ जोगी।। यहाँ ईश्वर बिना पैर के चलते हैं, बिना कान के सुनते हैं, बिना हाथ के अनेक कर्म करते हैं, बिना मुख के सभी रसों का भोग करते हैं और बिना वाणी के बड़े वक्ता हैं।
2 घनश्याम बिना ब्रज मण्डल में, नित वसति बहार वर्षा की है। कृष्ण (घनश्याम) के बिना भी ब्रज मंडल में गोपियों के आँसुओं की वर्षा होती रहती है। यहाँ वर्षा का कारण (कृष्ण/बादल) नहीं है, फिर भी वर्षा हो रही है।
3 नाचि अचानक ही उठे, बिनु पावस बन मोर। वर्षा ऋतु (पावस) के बिना ही जंगल में मोर अचानक नाच उठे। नाच का कारण (वर्षा) नहीं है, फिर भी कार्य हो रहा है।
4 सुलगि सुलगि मुसुकुराति विरह की अगन बिना धुआँ। बिना किसी धुएँ और बिना दिखाई देने वाले ईंधन के विरह की आग भीतर ही भीतर जलती रहती है।
5 बिनु श्रम लही संपदा मनचाही, बिनु बीजे उपजी लुन लाई। बिना परिश्रम के मनचाही संपत्ति मिल गई और बिना बीज बोए ही फसल उग गई और काट ली गई।
6 अंजन दियो न आँखि में, तऊ कजरारी लाग। आँखों में काजल (अंजन) नहीं लगाया गया है, फिर भी आँखें कजरारी (सुंदर) लग रही हैं।
7 बिनु ही छुए मन हरत है, लखि सुंदर मुसकान। बिना स्पर्श किए केवल सुंदर मुस्कान को देखकर ही मन वश में हो जाता है।
8 नहाए बिनु ही नीर सों, पावन भयो शरीर। बिना पानी से नहाए ही शरीर पवित्र और स्वच्छ हो गया।
9 लागी नहिँ लाठी कहुँ, तऊ कराहत गात। शरीर पर कहीं भी लाठी या चोट नहीं लगी है, फिर भी पूरा शरीर दर्द से कराह रहा है।
10 बिनु ही रंग रंगी चुनरिया, पिया के रंग में आज। बिना बाहरी रंग या पानी के उपयोग के चुनरी प्रियतम के प्रेम के रंग में रंग गई है।
याद रखने का महा-मंत्र:
कारण गायब = कार्य चालू
यानी बिना साधन या कारण के ही काम होना = विभावना अलंकार।

विरोधाभास अलंकार

  • परिभाषा: काव्य में जहाँ वास्तविक विरोध न होते हुए भी केवल शब्दों के माध्यम से विरोध का आभास या प्रतीति हो, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है।
    सरल शब्दों में: जब किसी पद में ऐसी दो बातें एक साथ कही जाएँ जो ऊपर से देखने पर एक-दूसरे के उल्टी (विरोधी) लगती हैं और असंभव मालूम होती हैं, लेकिन गहराई से विचार करने पर उनका असली अर्थ समझ में आ जाता है और विरोध समाप्त हो जाता है, उसे विरोधाभास अलंकार कहते हैं।
  • विरोधाभास अलंकार के वाचक शब्द: इस अलंकार में सीधे तौर पर कोई निश्चित वाचक शब्द नहीं होते, बल्कि इसमें परस्पर विरोधी अर्थ रखने वाले शब्दों का युग्म (जोड़ा) दिखाई देता है। जैसे — • ज्यों-ज्यों … त्यों-त्यों • शीतल … आग • मीठी … खात / लगना • अंधा … देखना • जीवित … मरना आदि।

विरोधाभास अलंकार के 10 प्रमुख और प्रसिद्ध उदाहरण:

क्रम उदाहरण (पद) समझें (व्याख्या)
1 या अनुरागी चित की, गति समुझै नहिं कोइ। ज्यों-ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होई।। मन ज्यों-ज्यों श्याम (कृष्ण) रंग में डूबता है, त्यों-त्यों वह पवित्र और उज्ज्वल होता जाता है। काले में डूबने पर उज्ज्वल होना विरोधाभास है।
2 शीतल बानी में आग लिए फिरता हूँ, हो जिसमें राजाओं के प्रासाद न्योछावर, मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।। कवि अपनी शीतल वाणी में भी आग (विद्रोह या प्रेम की तड़प) लिए घूमते हैं। वाणी का शीतल होना और उसमें आग होना विरोधाभास है।
3 विषमय यह गोदावरी, अमृतन को फल देत। जहरीला (विषमय) जल होने पर भी गोदावरी से अमृत समान फल मिलना विरोधाभास है।
4 ज्यों-ज्यों सुलझाना चाहूँ, त्यों-त्यों और उलझता जाए। जितना सुलझाने का प्रयास करो, उतना ही अधिक उलझना विरोधाभास है।
5 रो-रोकर हँसती है आँखें, जब-जब तेरी याद आती है। एक ही समय में आँखों का रोना और हँसना विरोधाभास है।
6 देखें तुम्हें आँखें मूंदकर, समझें तुम्हें बिना सोचे। आँखें मूंदकर देखना और बिना सोचे समझना तार्किक रूप से विरोधाभास है।
7 तंत्री नाद कबित रस, सरस राग रति रंग। अनबूड़े बूड़े तिरे, जे बूड़े सब अंग।। जो नहीं डूबे (अनबूड़े) वे डूब गए, और जो सब अंगों से डूबे वे तैर गए; यह विरोधाभास है।
8 अचरज है, यह भरा-पूरा घर कितना खाली खाली लगता है। सबसे भरा-पूरा घर भी खाली (सूना) लगना विरोधाभास है।
9 जियते मुए कहावहिं वेई, जो केवल अपना पेट भरहीं। जीवित होकर भी मरे समान कहलाना विरोधाभास है।
10 सुलगी अनुरागी आग यहाँ, जो बुझने पर भी जलती है। बुझने के बाद भी आग का जलता रहना प्रकृति के विरुद्ध है— यह विरोधाभास है।
याद रखने का महा-मंत्र:
जहाँ वास्तविक विरोध न हो, पर शब्दों से विरोध का आभास हो, वहीं विरोधाभास अलंकार होता है।

विभावना अलंकार और विरोधाभास अलंकार में अंतर

विभावना अलंकार और विरोधाभास अलंकार दोनों ही काव्य में ‘कारण और कार्य’ या ‘दो विरोधी तत्वों’ के अंतर्संबंध पर आधारित होते हैं। इन दोनों अलंकारों में मूल अंतर कार्य के होने की परिस्थितियों और तर्क पर निर्भर करता है।
आधार विभावना अलंकार विरोधाभास अलंकार
1. मूल अर्थ जहाँ कारण (साधन) के न होने पर भी कार्य का होना पाया जाता है। जहाँ वास्तविक विरोध न होते हुए भी केवल शब्दों में विरोध दिखाई देता है।
2. मूल तत्व इसमें कारण का पूर्ण अभाव (कमी) होता है, फिर भी परिणाम सामने आता है। इसमें दो विरोधी बातें या गुण एक ही समय में एक साथ दिखाई देते हैं।
3. तार्किक स्थिति बिना किसी साधन के काम का होना (जैसे बिना पैर के चलना)। एक ही समय में दो विपरीत स्थितियों का होना (जैसे शीतल वाणी में आग होना)।
4. वाचक शब्द इसमें बिनु, बिना, बिन, रहित, नहिं जैसे अभाव सूचक शब्दों का प्रयोग होता है। इसमें ज्यों-ज्यों… त्यों-त्यों, शीतल… आग, अंधा… देखना जैसे विरोधी शब्द-युग्म आते हैं।
5. बुद्धि पर प्रभाव यह देखकर आश्चर्य होता है कि बिना कारण के काम कैसे हो गया। इसे पढ़कर पहली बार में बात असंभव लगती है, पर अर्थ समझने पर विरोध शांत हो जाता है।
6. व्यावहारिक सूत्र साधन गायब + काम चालू। बाहरी रूप से उल्टा + आंतरिक रूप से बिल्कुल सही।

उदाहरणों के माध्यम से अंतर को विस्तार से समझें:

  1. विभावना अलंकार का उदाहरण:
    “बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना, कर बिनु करम करइ बिधि नाना।”
    विस्तार से समझें: यहाँ ईश्वर के बारे में कहा गया है कि उनके पास पैर नहीं हैं, फिर भी वे चलते हैं; कान नहीं हैं, फिर भी सुनते हैं। यहाँ चलने और सुनने का कोई साधन (कारण) मौजूद नहीं है, फिर भी कार्य पूरी तरह संपन्न हो रहा है। इसलिए यहाँ विभावना अलंकार है।
  2. विरोधाभास अलंकार का उदाहरण:
    “या अनुरागी चित की, गति समुझै नहिं कोइ। ज्यों-ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होई।”
    विस्तार से समझें: यहाँ कहा गया है कि मन जैसे-जैसे श्याम (काले) रंग में डूबता है, वैसे-वैसे वह उज्ज्वल (सफेद या साफ) होता जाता है। किसी वस्तु का काले रंग में डूबकर सफेद होना बिल्कुल उल्टी और विरोधी बात लगती है। लेकिन जब हम इसका गहरा अर्थ समझते हैं कि कृष्ण (श्याम) की भक्ति में डूबने से मन पवित्र (उज्ज्वल) होता है, तो यह विरोध समाप्त हो जाता है। इसलिए यहाँ विरोधाभास अलंकार है।
★ संक्षेप में: जहाँ “बिना साधन या कारण” के ही कोई अनोखा काम हो जाए वहाँ विभावना अलंकार होता है, और जहाँ “दो उल्टी बातें” एक साथ कहकर कोई गहरा अर्थ प्रकट किया जाए वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है।

3. उभयालंकार

उभयालंकार की परिभाषा

जिस अलंकार में शब्द और अर्थ— दोनों की समान रूप से चमत्कारपूर्ण भूमिका हो तथा दोनों के कारण काव्य-सौन्दर्य उत्पन्न हो, उसे उभयालंकार कहते हैं।
सरल परिभाषा: जहाँ शब्द और अर्थ दोनों के कारण अलंकार का सौन्दर्य उत्पन्न हो, वहाँ उभयालंकार होता है।

श्लेष अलंकार उभयालंकार है या नहीं?

हाँ, परंपरागत संस्कृत काव्यशास्त्र में श्लेष को प्रायः उभयालंकार माना जाता है।
  • कारण :
    • श्लेष में एक ही शब्द से एक से अधिक अर्थ निकलते हैं।
    • यदि शब्द बदल दिया जाए तो श्लेष समाप्त हो जाता है (अर्थात शब्द आवश्यक है)।
    • और चमत्कार अनेक अर्थों के कारण भी उत्पन्न होता है।
    • इसलिए शब्द और अर्थ दोनों की भूमिका होने के कारण श्लेष अलंकार को उभयालंकार माना जाता है।
  • उदाहरण :
    “पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून।”
    यहाँ “पानी” शब्द के अनेक अर्थ हैं —
       जल
     चमक (मोती का पानी)
     प्रतिष्ठा / इज्जत (मनुष्य का पानी)
    एक ही शब्द से अनेक अर्थ निकलने के कारण श्लेष अलंकार है।
नोट (महत्वपूर्ण) : हिंदी काव्यशास्त्र की कुछ पुस्तकों में श्लेष को शब्दालंकार भी बताया जाता है, जबकि संस्कृत काव्यशास्त्र के अनेक आचार्य इसे उभयालंकार मानते हैं।

रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए (प्रश्न एवं उत्तर)

  1. अलंकार सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य __________ माने जाते हैं
    उत्तर: भामह
  2. आचार्य भामह ने छठी शताब्दी में अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘__________’ की रचना की थी
    उत्तर: काव्यालंकार
  3. सबसे पहले अलंकार को काव्य की __________ के रूप में आचार्य भामह ने प्रतिष्ठित किया
    उत्तर: आत्मा
  4. ‘अलंकार’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है— अलं + __________
    उत्तर: कार
  5. ‘अलं’ शब्द का अर्थ __________ या सजावट होता है
    उत्तर: आभूषण (या पर्याप्त)
  6. ‘काव्यशोभाकरान् धर्मानलंकारान् प्रचक्षते’ परिभाषा आचार्य __________ द्वारा दी गई है
    उत्तर: दण्डी
  7. आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, अलंकार काव्य का साधन है, __________ नहीं
    उत्तर: साध्य
  8. हिंदी साहित्य में अलंकारों के मुख्य रूप से __________ भेद होते हैं
    उत्तर: तीन (3)
  9. जहाँ शब्दों के बाहरी रूप या वर्णों के दोहराव से चमत्कार उत्पन्न हो, वहाँ __________ अलंकार होता है
    उत्तर: शब्दालंकार
  10. काव्य में जहाँ एक ही वर्ण या अक्षर की आवृत्ति बार-बार होती है, वहाँ __________ अलंकार होता है
    उत्तर: अनुप्रास
  11. अनुप्रास अलंकार के कुल __________ भेद होते हैं
    उत्तर: 5
  12. जहाँ कोई एक या अनेक वर्ण केवल दो बार आए (आवृत्ति एक बार हो), वहाँ __________ अलंकार होता है
    उत्तर: छेकानुप्रास
  13. ‘छेक’ शब्द का शाब्दिक अर्थ __________ होता है
    उत्तर: चतुर
  14. “इस करुणा-कलित हृदय में…” पंक्ति में ‘क’ वर्ण के जोड़े के कारण __________ अलंकार है
    उत्तर: छेकानुप्रास
  15. जहाँ एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति दो से अधिक बार (बार-बार) हो, वहाँ __________ अलंकार होता है
    उत्तर: वृत्यानुप्रास
  16. “तरनि तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाए” में ‘त’ वर्ण की आवृत्ति के कारण __________ अलंकार है
    उत्तर: वृत्यानुप्रास (या अनुप्रास)
  17. जहाँ समान अर्थ वाले शब्दों या पूरे वाक्यों की आवृत्ति अन्वय/भावार्थ भेद के साथ हो, वहाँ __________ अलंकार होता है
    उत्तर: लाटानुप्रास
  18. लाटानुप्रास अलंकार गुजरात के ‘__________’ प्रदेश के कवियों को बहुत प्रिय था
    उत्तर: लाट
  19. “पूत कपूत तो क्यों धन संचय, पूत सपूत तो क्यों धन संचय” पंक्ति __________ अलंकार का सटीक उदाहरण है
    उत्तर: लाटानुप्रास
  20. जहाँ मुख के एक ही उच्चारण स्थान से बोले जाने वाले वर्णों की बहुलता हो, वहाँ __________ अलंकार होता है
    उत्तर: श्रुत्यानुप्रास
  21. ‘श्रुति’ शब्द का शाब्दिक अर्थ __________ होता है
    उत्तर: सुनना
  22. “दिनांत था, थे दिननाथ डूबते…” पंक्ति में दंत्य वर्णों की प्रधानता के कारण __________ अलंकार है
    उत्तर: श्रुत्यानुप्रास
  23. छंद के चरणों (लाइनों) के अंत में समान तुकबंदी होने पर __________ अलंकार होता है
    उत्तर: अंत्यानुप्रास
  24. “जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर” में अंत की तुकबंदी के कारण __________ अलंकार है
    उत्तर: अंत्यानुप्रास
  25. जहाँ एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए और हर बार उसका अर्थ अलग हो, वहाँ __________ अलंकार होता है
    उत्तर: यमक
  26. “कनक कनक ते सौ गुनी…” में पहले ‘कनक’ का अर्थ धतूरा और दूसरे ‘कनक’ का अर्थ __________ है
    उत्तर: सोना (स्वर्ण)
  27. “काली घटा का घमंड घटा” पंक्ति में __________ अलंकार है
    उत्तर: यमक
  28. ‘श्लेष’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘__________’ होता है
    उत्तर: चिपका हुआ
  29. जहाँ कोई शब्द एक ही बार प्रयुक्त हो परंतु उसके एक से अधिक अर्थ निकलें, वहाँ __________ अलंकार होता है
    उत्तर: श्लेष
  30. “रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून…” में ‘पानी’ शब्द के मोती, मनुष्य और __________ के संदर्भ में तीन अर्थ हैं
    उत्तर: चून (आटा/जल)
  31. ‘वक्रोक्ति’ शब्द ‘वक्र’ और ‘__________’ से मिलकर बना है
    उत्तर: उक्ति
  32. ‘वक्र’ का शाब्दिक अर्थ ‘__________’ होता है
    उत्तर: टेढ़ा
  33. वक्ता की कही बात का श्रोता द्वारा जानबूझकर टेढ़ा अर्थ निकालना __________ अलंकार कहलाता है
    उत्तर: वक्रोक्ति
  34. वक्रोक्ति अलंकार के दो मुख्य भेद ‘श्लेष वक्रोक्ति’ और ‘__________ वक्रोक्ति’ हैं
    उत्तर: काकु
  35. “को तुम? – हौं घनश्याम हम। तौ बरसो कितहूँ जाइ।” यह उदाहरण __________ अलंकार का है
    उत्तर: वक्रोक्ति
  36. जहाँ काव्य में शब्दों के स्थान पर अर्थ के कारण चमत्कार उत्पन्न हो, वहाँ __________ अलंकार होता है
    उत्तर: अर्थालंकार
  37. जब किसी बात का वर्णन लोक-सीमा का उल्लंघन करके बहुत बढ़ा-चढ़ाकर किया जाए, तब __________ अलंकार होता है
    उत्तर: अतिशयोक्ति
  38. “हनुमान की पूंछ में लगन न पाई आग, लंका सिगरी जल गई…” में __________ अलंकार है
    उत्तर: अतिशयोक्ति
  39. “राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार” पंक्ति में __________ अलंकार का प्रयोग हुआ है
    उत्तर: अतिशयोक्ति
  40. जब किसी वस्तु की समानता के कारण भ्रमवश दूसरी वस्तु का पक्का निश्चय हो जाए और क्रिया भी हो जाए, वहाँ __________ अलंकार होता है
    उत्तर: भ्रांतिमान
  41. “नाक का मोती अधर की कांति से, बीज दाड़िम का समझकर भ्रांति से…” उदाहरण __________ अलंकार का है
    उत्तर: भ्रांतिमान
  42. “ओस बिंदु चुग रही हंसिनी, मोती उनको जान।” पंक्ति में __________ अलंकार है
    उत्तर: भ्रांतिमान
  43. जहाँ उपमेय और उपमान में अत्यधिक समानता के कारण अंत तक संशय/दुविधा बनी रहे, वहाँ __________ अलंकार होता है
    उत्तर: संदेह
  44. ‘या’, ‘अथवा’, ‘कि’, ‘कैधों’ आदि शब्द मुख्य रूप से __________ अलंकार के वाचक शब्द हैं
    उत्तर: संदेह
  45. “सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है…” में __________ अलंकार है
    उत्तर: संदेह
  46. जहाँ कारण (साधन) के न होने पर भी कार्य का होना पाया जाए, वहाँ __________ अलंकार होता है
    उत्तर: विभावना
  47. “बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना…” पंक्ति __________ अलंकार का सबसे प्रमुख उदाहरण है
    उत्तर: विभावना
  48. जहाँ वास्तविक विरोध न होते हुए भी शब्दों के माध्यम से विरोध का आभास हो, वहाँ __________ अलंकार होता है
    उत्तर: विरोधाभास
  49. “ज्यों-ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होई” पंक्ति में __________ अलंकार है
    उत्तर: विरोधाभास
  50. जिस अलंकार में शब्द और अर्थ दोनों के कारण काव्य-सौन्दर्य उत्पन्न होता है, उसे __________ कहते हैं
    उत्तर: उभयालंकार

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