आचार्य रामचंद्र शुक्ल के प्रमुख कथन (आधुनिक काल)(acharya ramchandra shukl ke pramukh kathan (aadhunik kal))

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के प्रमुख कथन (आधुनिक काल)

1. रामप्रसाद निरंजनी
  • भाषा योगवासिष्ठ: “अब तक पाई गई पुस्तकों में यह ‘भाषा योगवासिष्ठ’ ही सबसे पुराना है, जिसमें गद्य अपने परिष्कृत रूप में दिखाई पड़ता है।”
  • प्रथम प्रौढ़ गद्य लेखक: “भाषा योगवासिष्ठ को परिमार्जित गद्य की प्रथम पुस्तक और रामप्रसाद निरंजनी को प्रथम प्रौढ़ गद्य लेखक मान सकते हैं।”
2. इंशा अल्ला ख़ाँ एवं राजा लक्ष्मणसिंह
  • भाषा भेद: “जिस प्रकार वे अपनी अरबी-फारसी मिली हिन्दी को ही उर्दू कहते थे, उसी प्रकार संस्कृत मिली हिन्दी को भाखा।”
  • शैलीगत विशेषता: “आरंभिक काल के चारों लेखकों में इंशा की भाषा सबसे चटकीली, मटकीली, मुहावरेदार और चलती है।”
  • कहानी का आरम्भ: “अपनी कहानी का आरम्भ ही उन्होंने इस ढंग से किया है, जैसे लखनऊ के भाँड़ घोड़ा कुदाते हुए महफ़िल में आते हैं।”
  • राजा लक्ष्मणसिंह: “असली हिन्दी का नमूना लेकर उस समय राजा लक्ष्मणसिंह ही आगे बढ़े।”
3. भारतेंदु हरिश्चंद्र
  • साहित्य को नवीन मार्ग: “इससे भी बड़ा काम उन्होंने यह किया कि साहित्य को नवीन मार्ग दिखाया और वे उसे शिक्षित जनता के सहचर्य में ले आए।”
  • भाषा का स्वरूप: हरिश्चन्द्र की भाषा को ‘हरिश्चन्द्री हिन्दी’ कहा है।
  • कवि रूप: “वे सिद्ध वाणी के अत्यन्त सरल हृदय कवि थे।”
  • कलागत माधुर्य: “प्राचीन और नवीन का ही सुन्दर सामंजस्य भारतेन्दु की कला का विशेष माधुर्य है।”
4. उपन्यासकार (देवकीनंदन खत्री एवं पं. किशोरीलाल गोस्वामी)
  • बाबू देवकीनन्दन खत्री:
    • “पहले मौलिक उपन्यास लेखक जिनके उपन्यासों की सर्वसाधारण में धूम हुई काशी के बाबू देवकीनन्दन खत्री थे।”
    • “ये वास्तव में घटना-प्रधान कथानक या क़िस्से हैं जिनमें जीवन के विविध पक्षों के चित्रण का कोई प्रयत्न नहीं, इससे ये साहित्य कोटि में नहीं आते हैं।”
    • “उन्होंने साहित्यिक हिन्दी ना लिखकर हिन्दुस्तानी लिखी जो केवल इसी प्रकार की हल्की रचनाओं में काम दे सकती है।”
  • पं. किशोरीलाल गोस्वामी:
    • “उपन्यासों का ढेर लगा देने वाले दूसरे मौलिक उपन्यासकार पं. किशोरीलाल गोस्वामी हैं, जिनकी रचनाएँ साहित्य कोटि में आती है।”
    • “साहित्य की दृष्टि से उन्हें हिन्दी का पहला उपन्यासकार कहना चाहिए।”
5. चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’
  • यथार्थवाद एवं भावुकता: “इसके पक्के यथार्थवाद के बीच, सुरुचि की चरम मर्यादा के भीतर, भावुकता का चरम उत्कर्ष अत्यन्त निपुणता के साथ सम्पुटित है। घटना इसकी ऐसी है जैसे बराबर हुआ करती है, पर उसमें भीतर से प्रेम का एक स्वर्गीय स्वरूप झांक रहा है – केवल झाँक रहा है, निर्लज्जता के साथ पुकार या कराह नहीं रहा है।”
  • घटना प्रधानता: “इसकी घटनाएं ही बोल रही है, पात्रों के बोलने की अपेक्षा नहीं।”
  • शैलीगत वक्रता: “यह बेधड़क कहा जा सकता है कि शैली कि जो विशिष्टता और अर्थगर्भित वक्रता गुलेरी जी में मिलती है और किसी लेखक में नहीं।”
6. महावीर प्रसाद द्विवेदी
  • लेखों का स्वरूप: आचार्य शुक्ल ने महावीर प्रसाद द्विवेदी के लेखों को “बातों का संग्रह” कहा है।
  • आलोचनात्मक दृष्टिकोण: “इन पुस्तकों (महावीर प्रसाद द्विवेदी की आलोचनात्मक पुस्तकों) को एक मुहल्ले में फैली बातों से दूसरे मुहल्ले वालों को कुछ परिचित कराने के प्रयत्न के रूप में समझना चाहिए, स्वतंत्र समालोचना के रूप में नहीं।”
  • भाषा सुधार का उपकार: “यद्यपि द्विवेदी जी ने हिन्दी के बड़े-बड़े कवियों को लेकर गम्भीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा आदि की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसी अव्यवस्थित व्याकरण विरुद्ध और उटपटांग भाषा चारों ओर दिखाई पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी ना रुकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया।”
  • पाठकीय दृष्टिकोण: “द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक़्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है।”
7. आधुनिक काल के अन्य कवि एवं लेखक
  • पं. गोविंदनारायण मिश्र: “पं.गोविंदनारायण मिश्र के गद्य को समास अनुप्रास में गुँथे शब्द-गुच्छों का एक अटाला समझिए।”
  • पं. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी: “उनके अधिकांश लेख भाषण मात्र हैं, स्थायी विषयों पर लिखे हुए निबन्ध नहीं।”
  • प्रसाद और प्रेमी: “प्रसाद जी ने अपना क्षेत्र प्राचीन हिन्दू काल के भीतर चुना और प्रेमी जी ने मुस्लिम काल के भीतर। प्रसाद के नाटकों में स्कन्दगुप्त श्रेष्ठ है और प्रेमी के नाटकों में रक्षाबन्धन।”
  • अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’: “काव्य अधिकतर भावव्यंजनात्मक और वर्णनात्मक है।”
  • मैथिलीशरण गुप्त: “गुप्त जी वास्तव में सामंजस्यवादी कवि है; प्रतिक्रिया का प्रदर्शन करने वाले अथवा मद में झूमाने वाले कवि नहीं हैं। सब प्रकार की उच्चता से प्रभावित होने वाला हृदय उन्हें प्राप्त है। प्राचीन के प्रति पूज्य भाव और नवीन के प्रति उत्साह दोनों इनमें है।”
  • पं. सत्यनारायण कविरत्न: “उनका जीवन क्या था; जीवन की विषमता का एक छाँटा हुआ दृष्टान्त था।”
  • बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’: “प्रेमघन में पुरानी परम्परा का निर्वाह अधिक दिखाई पड़ता है।” (यहाँ पुरानी परम्परा से तात्पर्य भाषा से है)
8. छायावाद
  • लक्ष्य एवं विषय: “उसका प्रधान लक्ष्य काव्य-शैली की ओर था, वस्तु विधान की ओर नहीं। अर्थभूमि या वस्तुभूमि का तो उसके भीतर बहुत संकोच हो गया।”
  • प्रतीकवाद: “छायावाद शब्द का प्रयोग रहस्यवाद तक ही न रहकर काव्य-शैली के सन्बन्ध में भी प्रतीकवाद (सिंबालिज्म) के अर्थ में होने लगा।”
  • परिभाषा: “छायावाद को चित्रभाषा या अभिव्यंजन-पद्धति कहा है।”
  • दो अर्थ: “छायावाद शब्द का प्रयोग दो अर्थों में समझना चाहिए। एक तो रहस्यवाद के अर्थ में, जहाँ उसका सम्बन्ध काव्य वस्तु से होता है अर्थात जहाँ कवि उस अनन्त और अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकर अत्यन्त चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है। छायावाद शब्द का दूसरा प्रयोग काव्य-शैली या पद्धति विशेष की व्यापक अर्थ में हैं।”
  • सामान्य अर्थ: “छायावाद का सामान्यतः अर्थ हुआ प्रस्तुत के स्थान पर उसकी व्यंजना करने वाली छाया के रूप में अप्रस्तुत का कथन।”
  • महादेवी वर्मा: “छायावाद का केवल पहला अर्थात मूल अर्थ लिखकर तो हिन्दी काव्य-क्षेत्र में चलने वाली सुश्री महादेवी वर्मा ही हैं।”
  • पंत, प्रसाद, निराला: “पन्त, प्रसाद, निराला इत्यादि और सब कवि प्रतीक-पद्धति या चित्रभाषा शैली की दृष्टि से ही छायावादी कहलाए।”
  • पद्धति व उत्पत्ति:
    • “अन्योक्ति-पद्धति का अवलम्बन भी छायावाद का एक विशेष लक्षण हुआ।”
    • “छायावाद का चलन द्विवेदी काल की रूखी इतिवृत्तात्मकता की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था।”
  • शैलीगत विशेषता व प्रवृत्ति:
    • “लाक्षणिक और व्यंजनात्मक पद्धति का प्रगल्भ और प्रचुर विकास छायावाद की काव्य-शैली की असली विशेषता है।”
    • “छायावाद की प्रवृत्ति अधिकतर प्रेमगीतात्मक है।”

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