बिहारी के बारे में कथन :-
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“इसका एक-एक दोहा हिन्दी साहित्य में एक-एक रत्न माना जाता है।”
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“बिहारी की भाषा चलती होने पर भी साहित्यिक है।”
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“इसमें तो रस के ऐसे छींटे पड़ते हैं जिनसे हृदय-कलिका थोड़ी देर के लिए खिल उठती है।”
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“जिस कवि में कल्पना की समाहार शक्ति के साथ भाषा की समाहार शक्ति जितनी अधिक होगी उतनी ही वह मुक्तक की रचना में सफल होगा।”
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“कविता उनकी श्रृंगारी है, पर प्रेम की उच्च भूमि पर नहीं पहुंचती, नीचे ही रह जाती है।”
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“यदि प्रबंधकाव्य एक विस्तृत वनस्थली है, तो मुक्तक चुना हुआ गुलदस्ता।” (बिहारी के बारे में)
मतिराम के बारे में कथन :-
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“इनका सच्चा कवि हृदय था।”
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“रीतिकाल के प्रतिनिधि कवियों में पद्माकर को छोड़ और किसी कवि में मतिराम की-सी चलती भाषा और सरल व्यंजना नहीं मिलती।”
भूषण के बारे में कथन :-
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“उनके प्रति भक्ति और सम्मान की प्रतिष्ठा हिंदू जनता के हृदय में उस समय भी थी और आगे भी बराबर बनी रही या बढ़ती गई।”
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“भूषण के वीर रस के उद्गार सारी जनता के हृदय की संपत्ति हुए।”
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“जिसकी रचना को जनता का हृदय स्वीकार करेगा उस कवि की कीर्ति तब तक बराबर बनी रहेगी, जब तक स्वीकृति बनी रहेगी।”
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“शिवाजी और छत्रसाल की वीरता का वर्णनों को कोई कवियों की झूठी ख़ुशामद नहीं कह सकता।”
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“वे हिंदू जाति के प्रतिनिधि कवि हैं।”
देव के बारे में कथन :-
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“ये आचार्य और कवि दोनों रूपों में हमारे सामने आते हैं।”
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“रीतिकाल के कवियों में यह बड़े ही प्रतिभा सम्पन्न कवि थे।”
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“कवित्वशक्ति और मौलिकता देव में खूब थी पर उनके सम्यक स्फूर्ण में उनकी रुचि विशेष प्रायः बाधक हुई है।”
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“रीतिकाल के कवियों में ये बड़े ही प्रगल्भ और प्रतिभासंपन्न कवि थे, इसमें संदेह नहीं।”
ग्वाल कवि के बारे में कथन :-
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“रीतिकाल की सनक इन में इतनी अधिक थी कि इन्हें ‘यमुना लहरी’ नामक देव-स्तुति में भी नवरस और षट् ऋतु सुझाई पड़ी है।”
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“षट् ऋतुओं का वर्णन इन्होंने विस्तृत किया है पर वही श्रृंगारी उद्दीपन के ढंग का।”
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“ग्वाल कवि ने देशाटन अच्छा किया था और उन्हें भिन्न-भिन्न प्रांतों की बोलियों का अच्छा ज्ञान हो गया था।”
घनानन्द के बारे में कथन :-
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“घनानन्द ‘साक्षात रस मूर्ति’ है।”
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“प्रेम मार्ग का ऐसा प्रवीण और वीर पथिक तथा ज़बांदानी का दावा रखने वाला ब्रजभाषा का दूसरा कवि नहीं हुआ।”
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“भाषा के लक्षक एवं व्यंजक बल की सीमा कहाँ तक है, इसकी पूरी परख इन्हीं को थी।”
रीतिकाल के अन्य कवियों के बारे में कथन :-
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“इनकी भाषा ललित और सानुप्रास होती थी।” (चिंतामणि त्रिपाठी के बारे में)
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“भाषा चलती होने पर भी अनुप्रासयुक्त होती थी।” (बेनी के बारे में)
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“भाषा इनकी बड़ी स्वाभाविक, चलती और व्यंजना पूर्ण होती थी।” (मंडन के बारे में)
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“ऐसा सर्वप्रिय कवि इस काल के भीतर बिहारी को छोड़ दूसरा नहीं हुआ है। इनकी रचना की रमणीयता ही इस सर्वप्रियता का एकमात्र कारण है।” (पद्माकर के बारे में)
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“इस ग्रंथ को इन्होंने वास्तव में आचार्य के रूप में लिखा है, कवि के रूप में नहीं।” (महाराजा जसवंत सिंह के ग्रंथ ‘भाषा भूषण’ के बारे में)
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“श्रीपति ने काव्य के सब अंगों का निरूपण विशद रीति से किया है।” (श्रीपति के बारे में)
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“छंदशास्त्र पर इनका-सा विशद निरूपण और किसी कवि ने नहीं किया है।” (सुखदेव मिश्र के बारे में)
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“इनकी रचना कलापक्ष में संयत और भावपक्ष में रंजनकारिणी है।” (भिखारी दास के बारे में)
रीति काल का आरम्भ :-
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हिन्दी रीति ग्रंथों की अखंड परम्परा एवं रीति काल का आरम्भ आचार्य शुक्ल चिन्तामणि से मानते हैं।
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आ. शुक्ल ने प्रथम आचार्य चिन्तामणि को माना है।
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केशव को ‘कठिन काव्य का प्रेत’ शुक्ल ने उनकी क्लिष्टता के कारण कहा है।