स्कन्दगुप्त नाटक (Skandagupt natak)

💐💐 स्कंदगुप्त  नाटक 💐💐

◆ प्रकाशन :- 1928 ई.

◆ जयशंकर प्रसाद की सबसे प्रौढ़ रचना है।

◆ आलोचकों ने प्रसाद के इस नाटक को शास्त्रीय दृष्टि से उत्तम माना है।

◆  140 पृष्ठ का नाटक

◆ अंक :- पाँच अंक

◆  शेक्सपियर के नाटकों में भी पाँच अंकों की परम्परा मिलती हैं।

◆  कुल दृश्य :- 33 दृश्य(इसके पाँच अंक क्रमशः 7, 7, 6, 7 तथा 6 दृश्यों में विभक्त है।)

◆ कुल  :- 17 गीत

◆ स्कन्दगुप्त नाटक भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण कालखंड गुप्त साम्राज्य की ऐतिहासिक घटनाओं को आधार बनाकर  लिखा गया एक ऐतिहासिक नाटक है।

◆ यह नाटक गुप्त वंश के प्रसिद्ध सम्राट स्कन्दगुप्त के जीवन पर आधारित है जिन्होंने पांचवी सदी में उज्जैन पर शासन किया और भारत के उत्तर तथा पश्चिम के क्षेत्रों से विदेशी आक्रमणकारियों, शकों और हूणों के साम्राज्य को समाप्त किया ।

◆ स्कन्दगुप्त के शासनकाल में विदेशी आक्रान्ताओं का आतंक और ब्राह्मण और बौद्ध धर्म के बीच संघर्ष चरम पर था। प्रसाद जी के समय भी वही समस्याएँ थीं। यहाँ विदेशी आक्रमणकारी अंग्रेज़ थे और ब्राह्मण और बौद्ध की जगह हिन्दू मुस्लिम थे ।

◆ नाटक का उद्देश्य :-

★  ‘स्कन्दगुप्त’ नाटक का  प्रमुख उद्देश्य राष्ट्रीयता की भावना का प्रचार ।

★  विश्व-प्रेम, मानवता, लोक कल्याण, सहिष्णुता तथा क्षमाशीलता का प्रचार भी प्रस्तुत नाटक में किया है।

★ ‘स्कन्दगुप्त’ नाटक में देशभक्ति का स्वर अधिक मुखरित हुआ है।

◆ नाटक के पात्र :-

★ पुरुष पात्र  :-

1. स्कंदगुप्त – युवेराज (विक्रमादित्य )
2. कुमारगुप्त (मगध का सम्राट)
3. गोविन्दगुप्त (कुमारगुप्त का भाई)
4. पर्णदत्त (मगध का महानायक)
5. चक्रपालित (पद का पुत्र)
6. बन्धुवर्मा (मालव का राजा)
7. भीमवर्मा (बन्धुवर्मा का भाई)
8. मातृगुप्त (काव्यकर्त्ता कालिदास )
9. प्रपंचबुद्धि(बौद्ध कापालिक)
10. शर्वनाग  (अन्तर्वेद का विषयपति)
11. कुमारदास (धातुसेन )  – सिंहल का राजकुमार
12.  पुरगुप्त (कुमारगुप्त का छोटा पुत्र)
13.  भटार्क (नवीन महाबलाधिकृत)
14. पृथ्वीसेन (मंत्री कुमारामात्य)
15. खिंगिल (हूण आक्रमणकारी)
16. मुद्गल (विदूषक)
17. प्रख्यातकीर्त्ति  – लंकाराज-कुल का श्रमण, महाबोधिबिहार स्थविर
18. महाप्रतिहार, महादंडनायक, नन्दी-ग्राम का दंडनायक, प्रहरी, सैनिक इत्यादि

★ स्त्री पात्र :-

1. देवकी  (कुमारगुप्त की बड़ी रानी, स्कंदगुप्त की माता)
2. अनन्तदेवी (कुमारगुप्त की छोटी रानी ,पुरगुप्त की माता)
3. जयमाला (बंधुवर्मा की स्त्री, मालव की रानी)
4. देवसेना (बंधुवर्मा की बहिन)
5. विजया (मालव के धनकुबेर की कन्या)
6. कमला (भटार्क की जननी)
7. रामा (शर्वनाग की स्त्री)
8. मालिनी (मातृगुप्त की प्रणयिनी)
9. सखी, दासी इत्यादि

◆ नाटक में गीत योजना:-

1. प्रिय! संसृति के वे सुंदरतम क्षण यों ही भूल नहीं जाना (मातृगुप्त प्रथम अंक)

2. हमारे निर्बलों के बल कहाँ हो हमारे दीन के सम्बल कहाँ हो (स्त्रियाँ प्रथम अंक)

3. घने प्रेम-तरु तले
   फूल चू पड़े बात से भरे हृदय का घाव,
   मन की कथा व्यथा-भरी बैठो सुनते जाव,
   मिलो स्नेह से गले।
  घने प्रेम-तरु तले। (देवसेना, द्वितीय अंक)

4. उमड़ कर चली भिगोने आज तुम्हारा निश्चल अंचल छोर (विजया, तृतीय अंक)

5. बजा दो वेणु मनमोहन! बजा दो!
    हमारे सुप्त जीवन को जगा दो
    विमल स्वातन्त्रय का बस मंत्र फूंको।
    हमें सब भीति – बन्धन से छुड़ा दो।(स्कन्दगुप्त द्वारा गाया गया एकमात्र प्रार्थना गीत है जिसमें कवि ईश्वर से स्वतंत्रता की प्रार्थना करता है।)

6. शून्य गगन में खोजता जैसे चंद्र निराश, राका में रमणीय यह किसका मधुर प्रकाश (देवसेना, पाँचवाँ अंक)

7. देश की दुर्दशा निहारोगे, डूबते को कभी उबारोगे (देवसेना, पाँचवाँ अंक)

8. वीरों! हिमालय के आँगन में उसे प्रथम किरणों का दे उपहार (समवेत गान, पाँचवाँ अंक)

9. आह वेदना मिली विदाई, मैंने भ्रमवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई… विश्व ! न सँभलेगी यह मुझसे, इसने मन की लज गँवाई। (देवसेना, पाँचवाँ अंक)

10. पलना बनें प्रलय की लहरें
शीतल हो ज्वाला की आंधी करुणा केघन छहरें।
दया दुलार करें पल भर भी विपदा पास न ठहरे। प्रभु का हो विश्वास सत्य तो सुख के तन फहरैं।
(यह गीत कुमार गुप्त की बडी रानी तथा स्कन्द गुप्त की माता देवकी की मनः स्थिति की सूचना देता है ।)

11. न छेडना उस अतीत स्मृति से
     खिंचे हुए बीन-तार कोकिल
     करुण रागिनी तडप उठेगी
     सुना न ऐसी पुकार कोकिल
     हृदय धूल में मिला दिया है
     उसे चरण चिन्ह सा किया है
    खिले फूल सब गिरा दिया है
     न अब बसन्ती बहार कोकिल।
(नर्तकियां कोयल को सम्बोधित करते हुए कहतीं हैं)

12  संसृति के वे सुन्दरतम क्षण यों ही भूल नहीं जाना।
वह उच्छृंखलता थी अपनी कहकर मन मत बहलाना।(मातृगुप्त )

13. उतरोगे कब – कब भूभार पर बारबार क्यों कह रखा था।
लूंगा मैं अवतार। उमड रहा है इस भूतल पर दुख का
पारावार बाडव लेलिहान जिह्वा का करता विस्तार।” (मातृगुप्त)

14. “हिमालय के आंगन में उसे प्रथम किरणों का दे
उपहार उषा ने हंस अभिनन्दन किया और यह पाया हीरक हार।
जगे हम लगे जगाने विश्व लोक में फैला फिर आलोका।
व्योम-तम- पुंज हुआ तब नष्ट अखिल संसृति हो उठी अशोका ।। (मातृगुप्त)

◆ महत्वपूर्ण कथन :-

(1.) “तुम लोग भाग की चिनगारियाँ हो, या स्त्री हो ?”(विजया का कथन)

(2.) – “मुझे इसका दुःख है कि मैं मर क्यों न गई; मैं क्यों अपने कलंकपूर्ण जीवन को पालती रही, मटार्क ! तेरी माँ की एक ही प्राशा थी कि पुत्र देश का सेवक होगा, म्लेच्छों से पददलित भारत-भूमि का उद्धार करके मेरा कलंक धो डालेगा, मेरा सिर ऊँचा होगा। परन्तु हाय !”( कमला का कथन)

(3.) “आर्य साम्राज्य का उद्धार हुआ है बहिन ! सिन्धु के प्रदेश से म्लेच्छ-राज ध्वंस हो गया है। प्रवीर सम्राट् स्कन्दगुप्त ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की है। गौ, ब्राह्मण और देवताओं की ओर कोई भी आत तायी आँख उठाकर नहीं देखता । लौहित्य से सिंधु तक, हिमालय की कन्दराओं में भी, स्वच्छन्दतापूर्वक सामगान होने लगा ।”(भीमवर्मा का कथन)

(4.) “वीरो ! तुम्हारी विश्वविजयिनी वीरगाथा सुर-सुन्दरियों की वीणा के साथ मन्दध्वनि से नंदन में गूंज उठेगी । असीम साहसी आर्य सैनिक ! तुम्हारे शस्त्र ने बर्बर हूणों को बता दिया है कि रण-विद्या केवल नृशंसत्ता नहीं है। जिनके आतंक से आज रूम-साम्रज्य पदाक्रान्त है, उन्हें तुम्हारा लोहा मानना होगा कि भारतीय दुर्जेय वीर हैं।(बन्धुवर्मा का कथन)

(5.) “स्वर्ण रत्न की चमक देखने वाली आँख बिजली की तलवारों के तेज को कब तक सह सकती हैं। श्रेष्ठ कन्ये ! हम क्षत्राणी हैं।” (जयमाला का कथन)

(6.) “यदि कोई साथी न मिला तो साम्राज्य के लिए नहीं जन्मभूमि के उद्धार के लिए मैं अकेला ही युद्ध करूँगा।”( स्कन्दगुप्त का कथन)

(7.) “कष्ट हृदय की कसौटी है, तपस्य अग्नि है। सम्राट! यदि – इतना भी न कर सके तो क्या ! सब क्षणिक सुखों का अंत है। जिसमें सुखों का अंत न हो, इसलिए सुख करना ही न चाहिए। मेरे इस जीवन के देवता और उस जीवन के प्राप्य ! क्षमा ।’ (देवसेना का कथन, 5 अंक, 6 दृश्य )

(8.) “हम क्षत्राणी है, चिरसंगिनी खड्गलता का हम लोगों से चिर स्नेह है।” (जयमाला का कथन)

(9.)“विश्वप्रेम, सर्वभूत – हित -कामना परम धर्म है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि अपने पर प्रेम न हो।” (देवसेना की उदार वाणी का जयमाला विरोध करती हुये कहती है)

(10.)“मै प्रतिज्ञा करता हूँ कि अब से इस वीर परोपकारी के लिए मेरा सर्वस्व अर्पित है।”(बन्धु वर्मा का कथन)

(11.) “मालव का राज कुटुंब, एक-एक बच्चा आर्य जाति के कल्याण के लिए जीवन उत्सर्ग करने को प्रस्तुत है। ” (बंधु वर्मा का कथन)

(12.)”भीख दो बाबा, देश के बच्चे भूखे हैं, नंगे हैं, असहाय है,कुछ दो बाबा।” (पर्णदत्त का कथन)

(13.) ‘मैने उनसे (स्कंद से ) प्रेम की चर्चा करके उनका अपमान नहीं होने दिया है। आज ही मै प्रेम के नाम पर जी खोलकर रोती हूँ, बस, फिर नहीं। यह एक क्षण का रुदन अनंतर स्वर्ग का सृजन करेगा जब हृदय में रुदन का स्वर उठता है, तभी मैं संगीत की वीणा मिला लेती हूँ। उसी में सब छिप जाता है।”(देवसेना सखियों से कहती है)

(14.) “कूलों में उफनकर बहनेवाली नदी, तुमुल तरंग, प्रचंड पवन और भयानक वर्षा; परंतु उसमें भी नाव चलानी ही होगी।” (देवसेना का कथन)

(15.) ‘भटार्क’ ! यदि कोई साथी न मिला तो साम्राज्य के लिए नहीं जन्मभूमि के उद्धार के लिए मैं अकेला युद्ध करूँगा।'(स्कंदगुप्त का कथन)

(16.)”साम्राज्य के लिए मैं अपने को नहीं बेच सकता।”(स्कंदगुप्त का कथन)

(17.)”सुख के लोभ से, मनुष्य के भय से, मैं उत्कोच देकर क्रांत साम्राज्य नहीं चाहता।” (इस कथन में स्कंदगुप्त का प्रकृति गर्व और आत्मसम्मान का भाव निहित)

◆ नाटक का सारांश :-

★ प्रथम अंक में गुप्त साम्राज्य में आन्तरिक विद्रोह और सम्राट कुमारगुप्त के विलासपूर्ण जीवन गुप्त साम्राज्य की शान्ति और सुव्यवस्था अशांति में बदली हुई है। इसका चित्रण लेखक ने किया हुआ है। सम्राट अयोग्यता, वीरसेन के असमय मृत्यु विदेशी आक्रमण से गुप्त साम्र पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है। ऐसे स्थिति में स्कंदगुप्त का कर्तव्य भाविक रूप से बढ़ जाता है। स्कंदगुप्त के लिए पारिवारिक विद्रोह की शान्ि और आर्यावृत की गौरव की रक्षा यही प्रथम कर्तव्य बन जाता है। उसी समय पुरुगुप्त भटार्क और अनंतदेवी की जो षडयंत्र पूर्ण योजना है, को असफल किया जाता है। अर्थात इन लोगों का षडयंत्र सफल नहीं हो पाता ही नहीं साम्राज्य के परम शुभचिंतक पृथ्वीसेन महाप्रतिहार, दंडनायक ये लोग आत्महत्या कर लेते हैं। ऐसे स्थिति में स्कंदगुप्त विचलित हो है। वह व्दन्द में रहता है। फिर भी लक्ष्य

प्राप्ति के लिए अपनी शक्ति लगाकर पुन जुड़ जाता है।

★ दूसरे अंक में स्कंदगुप्त का प्रयत्न अपने लक्ष्य के लिए रहता है किन्तु उसे लक्ष्य के आड़े में ग्रह संघर्ष प्रथम विघ्न के रूप में आता है। यह हमें अनंतदेवी और भटार्क से षडयंत्रों से पता चलता है। इस अंक में ये दोनों देवकी के हत्या का भी षडयंत्र रचते है। स्कंदगुप्त के सामने की दूसरी समस्या यह है कि, दुश्मनों के क्रूर प्रहार से देश की रक्षा करना है। उसी समय स्कंदगुप्त कुसुमपुर पहुँचकर अपने माँ की रक्षा करता है। उसके बाद दुश्मनों का सामना करने के लिए अपनी सैन्यशक्ति संघटित करता है। अर्थात सैनिकों को एकत्रित करता है। जिसमें वह सफल भी होता है। उसे राज्य की प्राप्ति भी होती है। दूसरी ओर उसे दुश्मनों के सामने उसे बंधी रूप में लाया जाता है।

★ तृतीय अंक में प्रपंचबुद्धी अनंतदेवी भटार्क के षडयंत्र पूर्ण योजना का सामना करना पड़ता है। स्कंदगुप्त और मातृगुप्त मिलकर देवसेन की रक्षा करते हैं। पश्चिमउत्तोर सेना के साथ मिलकर दुश्मनों का सामना करना, रणक्षेत्र में भटार्क का दुश्मनों के साथ मिल जाना इन घटनाओं से पता चलता है कि भटार्क अलग-अलग तरीकों से स्कंदगुप्त का विश्वासघात करता है। स्कंदगुप्त बार-बार उसे क्षमा करता है, भटार्क ऊपर दे तो कृतज्ञ होने का दावा करता है। लेकिन भीतर से षडयंत्र बनाता रहता है। स्कंदगुप्त के सेना को दुश्मनों के साथ मिलकर कुंभ पर बाँधकर काटकर डालता है। यह घटनाएँ इसमें आती है।

★ चौथा अंक में चन्द्रगुप्त सिकन्दर के निमन्त्रण पर कुछ समय के लिए यवन सेना के शिविर में रहता है| सिल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया उससे प्रभावित होती है। सिकन्दर पर व्यंग्यात्मक चौट करने के कारण चन्द्रगुप्त को वहाँ से भी भागना पड़ता है। उधर चाणक्य की सलाह से सिंहरण चन्द्रगुप्त और नटों का रूप धारण कर्के पर्वतेश्वर की सेना के शिविर में जाते हैं। की राजकुमारी कल्याणी भी पुरुष वेश में पर्वतेश्वर का सिकन्दर के साथ युध्द होता है प्रकृति उसका साथ नहीं देती। सिंहरण उसकी सही वक्त पर साहयता करता है फिर भी पर्वतेश्वर की पराजय होती है। सिकन्दर उसकी वीरता से प्रभावित होकर उसके साथ मैत्री कर लेता है। सिंहरण और को पर्वतेश्वर के बंदीगृह में मिलता है।

★ पांचवे अंक में सिंकदर की नीर मगध पर आक्रमण करने की भी होती है चाणक्य, चन्द्रगुप्त और उसे रोकने की योजना बनाते है। मालव गणराज्य के सैनिक चन्द्रगुप्त को अपना सेनापति स्वीकार कर लेता हैं। अलका पर्वतेश्वर को लोभ देती है कि वह उसके साथ विवाह कर लेगी और बदले में वह सिंहरण को मुक्त करा लेती है। अलका पर्वतेश्वर को बाध्य करती है कि वह सिकन्दर के रण निमन्त्रण पर वह न जाए इसी बीच मालविका और चन्द्रगुप्त की बीच प्रणय पनपता है सिकंदर मगध पर आक्रमण करने की योजना बदल देता है भारत से लौटते समय उसे मालव गणराज्य से लड़ना पड़ता है। चन्द्रगुप्त सिंहरण आदि सामूहिक रूप से सिकंदर का मुकाबला करते है युध्द में सिकंदर घायल होता है। सिंहरण सिकंदर को प्राणशिक्षा देता है और चन्द्रगुप्त कृतज्ञतावश सिल्यूकस को छोड़ता है सिकन्दर इन सबसे मैत्री करके लौट जाता है।

स्कन्दगुप्त नाटक

चन्द्रगुप्त नाटक 

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