अलंकारों के मुख्य भेद
- शब्दालंकार
- अर्थालंकार
- उभयालंकार
1. शब्दालंकार के अंतर्गत आने वाले अलंकार:
- अनुप्रास अलंकार
- यमक अलंकार
- श्लेष अलंकार
- वक्रोक्ति अलंकार
2. अर्थालंकार के अंतर्गत आने वाले अलंकार:
- अतिशयोक्ति अलंकार
- भ्रांतिमान अलंकार
- संदेह अलंकार
- विभावना अलंकार
- विरोधाभास अलंकार
याद रखने की ट्रिक (अर्थालंकार के लिए):
“बढ़ा-चढ़ाकर (अतिशयोक्ति), भ्रम में आकर (भ्रांतिमान), संदेह में पड़कर (संदेह), बिना साधन के (विभावना), उल्टी बात का अर्थ (विरोधाभास) समझा जाता है।”
3. उभयालंकार के अंतर्गत आने वाले अलंकार:
- श्लेष अलंकार
2. अर्थालंकार (Arthalankar)
अर्थालंकार के प्रकार
1. अतिशयोक्ति अलंकार
- Trick: “हद पार” या “गप्प मारना”
- पहचानने की ट्रिक: इसमें किसी बात को इतना बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाता है जिसकी लोक-सीमा में संभावना ही न हो। काव्य का अर्थ निकालते ही आपको लगेगा कि यह तो “सरासर गप्प” या “असंभव बात” है।
- याद रखने का कीवर्ड: लोक-सीमा पार (बढ़ा-चढ़ाकर कहना)
- उदाहरण:
“हनुमान की पूंछ में लगन न पाई आग,
लंका सिगरी जल गई गए निशाचर भाग।”
(व्याख्या: आग लगने से पहले ही लंका जल गई – अर्थात बात बहुत बढ़ा दी गई है।)
2. भ्रांतिमान अलंकार
- Trick: “गलती से मान लेना” या “Action ले लेना”
- पहचानने की ट्रिक: जब किसी एक वस्तु को दूसरी वस्तु समझकर भ्रम (गलती) में कोई काम (Action) कर दिया जाता है या उसे पक्का मान लिया जाता है। इसके वाचकों में अक्सर ‘जानि’, ‘समुझि’, ‘भ्रम’ जैसे शब्द छिपे होते हैं।
- याद रखने का कीवर्ड: भ्रम + क्रिया / कार्य (धोखे से सच मान लेना)
- उदाहरण:
“नाक का मोती अधर की कांति से, बीज दाड़िम का समझकर भ्रांति से,
देख उसको ही हुआ शुक मौन है, सोचता है अन्य शुक यह कौन है।”
(व्याख्या: नाक के मोती को तोते ने अनार का दाना समझ लिया और वह सोच में पड़ गया।)
- भ्रांतिमान: भ्रम में इंसान काम कर बैठता है (जैसे: रस्सी को साँप समझकर लाठी मारना)।
- संदेह: इंसान दुविधा में खड़ा रहता है (जैसे: यह रस्सी है या साँप? पता नहीं चल रहा)।
3. संदेह अलंकार
- Trick: “पक्का न होना” या “Confusion”
- पहचानने की ट्रिक: इसमें अंत तक असमंजस या दुविधा बनी रहती है कि ‘यह है या वह है?’ का संशय चलता रहता है, निर्णय नहीं हो पाता। इसकी पहचान के लिए काव्य में ‘किधों’, ‘या’, ‘अथवा’, ‘कि’ जैसे शब्द मिलते हैं।
- याद रखने का कीवर्ड: संशय / डाउट (संदेह अंत तक बना रहे)
- उदाहरण:
“सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है,
कि सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है।”
(व्याख्या: नारी और साड़ी में अंत तक दुविधा बनी हुई है।)
4. विभावना अलंकार
- Trick: “बिना कारण के काम होना”
- पहचानने की ट्रिक: जहाँ कारण (साधन) के न होने पर भी कार्य हो जाए। बिना पैर के चलना, बिना हाथ के काम होना। इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि काव्य में ‘बिनु’, ‘बिना’ या ‘रहित’ शब्द आते हैं।
- याद रखने का कीवर्ड: कारण गायब = कार्य चालू
- उदाहरण:
“बिनु पद चलै सुनै बिनु काना, कर बिनु करम करै बिधि नाना।”
(व्याख्या: बिना पैर के चलना और बिना कान के सुनना।)
5. विरोधाभास अलंकार
- Trick: “उल्टी बात” या “Opposite”
- पहचानने की ट्रिक: जहाँ वास्तविक विरोध न होने पर भी केवल देखने/सुनने में बात एक-दूसरे के विपरीत (उल्टी) लगे। जब आप उसका गहरा अर्थ निकालेंगे, तब वह विरोध खत्म हो जाएगा।
- याद रखने का कीवर्ड: विलोम शब्द जैसा जोड़ा (जैसे- शीतल और आग, मीठा और तीखा एक साथ आना)।
- उदाहरण:
“या अनुरागी चित की, गति समुझै नहिं कोइ।”
“ज्यों-ज्यों बूड़े श्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होइ।”
(व्याख्या: काले रंग में डूबने से कोई उज्ज्वल कैसे हो सकता है? पर अर्थ यह है कि कृष्ण की भक्ति में डूबने से मन पवित्र होता है।)