ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (महोबा का युद्ध – 1182 ई.)
यह संपूर्ण काव्य-प्रसंग चंदेल शासक परमर्दिदेव (परमाल) के काल और दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान के मध्य हुए ऐतिहासिक महोबा युद्ध (सिरसागढ़ एवं महोबा का घेरा) से जुड़ा है।
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आल्हा और ऊदल का निष्कासन: राजा परमाल ने माहिल (रानी मल्हना के भाई) के षड्यंत्र में आकर अपने वीर सेनापतियों—आल्हा और ऊदल—को राज्य से निकाल दिया था। दोनों भाई कन्नौज के राजा जयचंद की शरण में चले गए थे।
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महोबा पर संकट: पृथ्वीराज चौहान ने जब महोबा पर आक्रमण किया, तब रानी मल्हना ने संदेश भेजकर आल्हा-ऊदल को मातृभूमि की रक्षा के लिए वापस बुलाया। इस युद्ध में कवि जगनिक भी उपस्थित थे।
छंदों का सरल हिंदी अर्थ
1. डिंगल-अपभ्रंश मिश्रित छंद (कविराज और युद्ध कौशल)
कबिराज बली बिधु बान लियं…
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अर्थ: कविराज (जगनिक अथवा चारण कवि) ने प्रचंड बल के साथ धनुष-बाण संभाले। राजा सुजैत (जैत) की रक्षा करते हुए शत्रु दल को ललकारा। हाहुलीराय की सेना पर भीषण प्रहार हुआ। जब हाहुलेराय का अश्व (घोड़ा) मारा गया, तब जैत ने अत्यंत क्रोधित होकर सम्मुख सांग (बरछी/भाला) चलाकर भीषण प्रहार किया। रणभूमि में वीर योद्धा इस प्रकार लड़े कि शीश कट जाने के बाद भी उनके रुंड (धड़) दोनों दलों के बीच तलवारें चलाते रहे।
2. बुंदेली आल्हा छंद: तलवारबाजी व सेना की भिड़ंत
चलै जुनुब्बी और गुजराती…
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अर्थ: युद्ध में जुनुब्बी (दक्षिणी/अरबी शैली की तलवारें), गुजराती और विलायती (विदेशी/उत्कृष्ट फौलादी) तलवारें चलने लगीं। तलवारों के टकराने से ‘खट-खट’ और उनके चलने से ‘छपक-छपक’ की ध्वनियाँ गूँजने लगीं। युद्ध का संतुलन ऐसा था कि पैदल सैनिकों से पैदल सैनिक, घुड़सवारों से घुड़सवार और हाथियों के हौदों से हौदे टकराने लगे; यहाँ तक कि हाथी भी दाँत से दाँत लड़ाकर भिड़ गए।
3. तोपों और गोलियों की आवाज़ों का ध्वन्यात्मक चित्रण
दागी सलामी तब दोउ दल में…
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अर्थ: दोनों सेनाओं के आमने-सामने आते ही तोपों से गोले दागकर सलामी दी गई, जिससे पूरी रणभूमि में गहरा धुआँ छा गया। ‘अररर-अररर’ की भयानक गड़गड़ाहट के साथ तोप के गोले छूटे और बंदूक की गोलियाँ ‘सन्न-सन्न’ की सनसनाहट के साथ चलने लगीं। साथ ही तेगा (बड़ी तलवार) और खड्ग का प्रहार निरंतर जारी रहा।
4. जगनिक का अमर जीवन-दर्शन
बारह बरस लै कूकर जीएं…
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अर्थ: कुत्ते का जीवन केवल बारह वर्ष का होता है और सियार (गीदड़) लगभग तेरह वर्ष ही जीता है (अर्थात् कायरता और दीनता का जीवन छोटा और तुच्छ है)। एक क्षत्रिय (योद्धा) की वास्तविक आयु अठारह वर्ष (युवावस्था का रण-काल) ही मानी जाती है, यदि वह इसके बाद भी बिना पराक्रम और स्वाभिमान के जीवित रहता है, तो ऐसे कायरतापूर्ण जीवन को धिक्कार है।
5. पारंपरिक छंद (दोहा और सोरठा)
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दोहा:भूपति के ये वचन सुनि…अर्थ: राजा के कटु वचनों को सुनकर और सभा में उपजे रोष (क्रोध) को देखकर, श्रेष्ठ बुद्धि वाले जगनिक कवि ने दोनों पक्षों में मंत्रणा करते हुए नीतिगत बात कही।
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सोरठा:मल्हन कहिब सन्देस…अर्थ: रानी मल्हना ने कन्नौज संदेश भेजा कि “हे वीरों! शीघ्र महोबा लौट आओ, अन्यथा हमारी मातृभूमि छूट जाएगी और चंदेलों की यह ऐतिहासिक रियासत शत्रु द्वारा छीन ली जाएगी।”
आल्हा और ऊदल के प्रमुख शौर्य-प्रसंगों के साथ-साथ उनके मूल काव्यात्मक छंदों (बुंदेली और डिंगल) का समन्वय :-
1. मातृभूमि का आह्वान और ऊदल का स्वाभिमानरानी मल्हना के संदेशवाहक जब कन्नौज पहुँचे, तो आरंभ में ऊदल निष्कासन के अपमान से आहत थे। किंतु मातृभूमि की रक्षा के प्रश्न पर उनका क्षत्रिय धर्म जाग उठा:जा दिन जनम भयो आल्हा को, धरती धँसी अढ़ाई हाथ।खट-खट बाजीं खड़ग मियानें, चमक उठीं चम-चम तलवार।।महोबा की माटी पुकारे जबै, रोस गयो सब भूल पराय।जननी जन्मभूमि की खातिर, शीश कटै पै पीठ न जाय।।-
प्रसंग: कन्नौज नरेश जयचंद ने उन्हें रोकने का प्रयास किया और महोबा से बड़ा राज्य देने का प्रस्ताव रखा, किंतु आल्हा-ऊदल ने कहा कि विपत्ति के समय अपनी जन्मभूमि का त्याग करना सबसे बड़ा कलंक है।
2. सिरसागढ़ का भीषण संग्राम और मलखान की वीरता
पृथ्वीराज की सेना का पहला सामना सिरसागढ़ के दुर्ग पर आल्हा-ऊदल के चचेरे भाई मलखान (मलखे) से हुआ। मलखान ने अकेले ही चौहान सेना के छक्के छुड़ा दिए:मलखे जूझे सिरसागढ़ में, जैसे बन में जूझै सेर।खप्पर भरि-भरि पियै जोगिनी, रुंड-मुंड की लागी ढेर।।सांग गिरे तब धरती काँपे, तेगा छूटै अगिनि बिलाय।एक घाय मलखे जो मारै, दो टुक होय भुइयाँ गिर जाय।।-
प्रसंग: सिरसागढ़ के पतन और मलखान के वीरगति पाने के बाद ही युद्ध महोबा की सीमा (कीरत सागर) तक पहुँचा। मलखान का यह बलिदान आल्हा-खंड के सबसे मार्मिक और ओजस्वी अध्यायों में गिना जाता है।
3. कीरत सागर का युद्ध और ऊदल का महापराक्रम
महोबा के कीरत सागर तट पर ऊदल और पृथ्वीराज के वीर सेनापति चामुंडराय तथा राजकुमार ताहर के बीच भयंकर द्वंद्व हुआ:ऊदल लड़े खूब रजपूती, बांकी बरछी हाथ सँभार।आगे बढ़ि-बढ़ि सीस काटि कै, रकत नदी दीन्ही बहाय।।चामुंडराय सन्मुख जब आयौ, ऊदल दीन्हीं हाँक पुकार।संभलहु वीर आज समरांगन, मिटिहै कायरता को भार।।-
प्रसंग: ऊदल ने युद्ध में अप्रतिम पराक्रम दिखाया, किंतु छल और संख्या-बल के कारण अंततः वे वीरगति को प्राप्त हुए।
4. आल्हा का रौद्र रूप और अमरत्व की लोक-मान्यता
छोटे भाई ऊदल के वीरगति के समाचार ने शांत स्वभाव वाले आल्हा को प्रचंड रौद्र रूप में ला खड़ा किया। उन्होंने अकेले ही सेना में हाहाकार मचा दिया:सुनि कै ऊदल के मरबे की, आल्हा के तन लागी आग।नैन लाल अंगार भये तब, छूट्यो हाथन से बैराग।।ढूँढ़ि-ढूँढ़ि बैरी दल मारै, काहू के नहिं छूटे प्रान।गुरु गोरख की किरपा पाई, अमर भये आल्हा बलवान।।-
प्रसंग व लोक-विश्वास: गुरु गोरखनाथ के हस्तक्षेप पर आल्हा ने संन्यास ले लिया और शस्त्र त्याग दिए। बुंदेलखंडी जनमानस में आज भी यह दृढ़ मान्यता है कि आल्हा अमर हैं और मैहर की शारदा माता की प्रथम पूजा आज भी वही करने आते हैं।
परमाल रासो में प्रयुक्त प्रमुख काव्य-शैलियों की विशेषताएँ
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आल्हा छंद का स्वरूप: यह 31 मात्राओं का अत्यंत लयबद्ध मात्रिक छंद है, जिसमें 16 और 15 मात्राओं पर यति (विराम) होती है। अंत में गुरु-लघु का प्रयोग युद्ध के जोश को तीव्र गति देता है।
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ध्वन्यात्मक बिंब विधान: ‘खट-खट’, ‘छपक-छपक’, ‘अररर’, ‘सन्न-सन्न’ जैसे ध्वन्यात्मक शब्दों से युद्ध का दृश्य श्रोता के मानस-पटल पर सजीव हो उठता है।
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डिंगल का प्रभाव: संयुक्त वर्णों की बहुलता (द्वित्व वर्ण) और ओज गुण से युक्त शब्दावली वीर रस के स्थायी भाव (उत्साह) को चरम पर पहुँचाती है।
प्रस्तुत विवरण महाकवि जगनिक द्वारा रचित ‘परमाल रासो’ (आल्हा-खंड) के समग्र मूल्यांकन की एक सटीक प्रस्तावना है। इस रूपरेखा के आधार पर इसके प्रमुख आयामों का व्यवस्थित विश्लेषण:1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं तत्कालीन परिस्थितियां-
कालखंड: 12वीं शताब्दी का उत्तरार्ध (लगभग 1182 ई.), जब उत्तरी भारत में चंदेलों (महोबा), चौहानों (दिल्ली-अजमेर) और गहरवारों (कन्नौज) के बीच त्रिकोणीय संघर्ष चल रहा था।
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प्रमुख घटनाएं: महोबा के राजा परमर्दिदेव (परमाल), दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान और कन्नौज नरेश जयचंद के राजनीतिक संबंध तथा सिरसागढ़ व कीरत सागर के ऐतिहासिक युद्ध।
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चारण परंपरा: कवि जगनिक केवल दरबारी कवि नहीं थे, बल्कि वे स्वयं युद्धों में भाग लेने वाले योद्धा और प्रत्यक्षदर्शी थे।
2. प्रमुख आचार्यों एवं इतिहासकारों के मत-
आचार्य रामचंद्र शुक्ल: शुक्ल जी के अनुसार, “यद्यपि इसका मूल रूप सुरक्षित नहीं है और यह मौखिक परंपरा में सुरक्षित रहा, फिर भी जगनिक के आल्हा के समान वीर रस का ऐसा अप्रतिम लोक-उत्साह अन्यत्र दुर्लभ है।” उन्होंने इसे मूलतः ‘आल्हा-खंड’ के रूप में लोक-प्रचलित माना।
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चार्ल्स इलियट व विलियम वाटरफील्ड: 1865 ई. में फर्रुखाबाद के कलेक्टर चार्ल्स इलियट ने सर्वप्रथम मौखिक रूप से गाए जाने वाले इस काव्य को संकलित कराकर छपवाया, जिसका बाद में वाटरफील्ड ने अंग्रेजी अनुवाद (The Lay of Alha) किया।
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डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी: उन्होंने माना कि भले ही इसमें भाषा का आधुनिक रूप जुड़ता गया हो, परंतु इसकी मूल अंतःचेतना और वीर गाथात्मक स्वरूप 12वीं शती का ही है।
3. काव्य-शास्त्रीय तत्व-
रस विधान:
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अंगी रस: वीर रस (उत्साह स्थायी भाव; युद्धवीर और दानवीर दोनों रूपों की अभिव्यक्ति)।
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सहायक रस: रौद्र (शत्रु के प्रति क्रोध), भयानक (रणभूमि का दृश्य), बीभत्स (रुंड-मुंड और रक्तपात) तथा विवाह प्रसंगों में शृंगार रस।
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छंद विधान:
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आल्हा छंद (वीर छंद): 31 मात्राओं का मात्रिक छंद (16 और 15 पर यति), जो गेयता और त्वरित प्रवाह के लिए प्रसिद्ध है।
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पारंपरिक छंदों में दोहा, सोरठा, पद्धरी आदि का भी समन्वय मिलता है।
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अलंकार योजना:
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शब्दालंकार: अनुप्रास, यमक और विशेष रूप से ध्वन्यात्मक पुनरुक्ति प्रकाश (खट-खट, छपक-छपक)।
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अर्थालंकार: उपमा, रूपक और वीरोचित अतिशयोक्ति अलंकार का सजीव प्रयोग।
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भाषा एवं शैली:
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मूलतः डिंगल और अपभ्रंश का आधार लिए हुए बुंदेली और बैसवाड़ी का लोक-प्रचलित रूप।
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ओज गुण और गौड़ी रीति की प्रधानता।
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4. बहुआयामी वस्तु-वर्णन-
युद्ध एवं सैन्य व्यूह: पैदल, अश्वारोही, गज-सेना और तत्कालीन अस्त्र-शस्त्रों (तेगा, सांग, खड्ग, ढाल) का सजीव चित्रण तथा दुर्ग रक्षा के व्यूहों का विवरण।
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नगर एवं संस्कृति: महोबा, कन्नौज और दिल्ली के वैभव, हाट-बाजार, राजदरबार तथा महोबा के ऐतिहासिक कीरत सागर व मदन सागर तालों का चित्रण।
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विवाह प्रसंग (आल्हा-विवाह, ऊदल-विवाह): तत्कालीन ‘हरण-विवाह’ और ‘युद्धोपरान्त विवाह’ की परंपरा का विस्तृत आख्यान, जिसमें वीरता ही वरण का एकमात्र आधार होती थी।
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नारी पात्रों का चरित्र-चित्रण:
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रानी मल्हना: कूटनीतिज्ञ, स्वाभिमानी राजमाता और विपत्ति में राज्य की मार्गदर्शक।
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रानी तिलका व चन्द्रावलि: क्षत्राणी धर्म का पालन करने वाली, युद्ध के लिए पुरुषों को प्रेरित करने वाली और स्वाभिमान पर प्राण न्योछावर करने वाली वीरांगनाएं।
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