पश्चिमी हिंदी की बोलियाँ (शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित)
पश्चिमी हिंदी (शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित) के अंतर्गत मुख्य रूप से 5 बोलियाँ (या उपभाषाएँ) आती हैं। इन्हें याद रखने और समझने की सुविधा के लिए दो वर्गों में बाँटा जाता है:
1. आकार-बहुल बोलियाँ (जिनमें ‘आ’ की ध्वनि अधिक होती है)
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खड़ी बोली (कौरवी) : यह आधुनिक मानक हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी की आधार-बोली है। इसका मुख्य क्षेत्र दिल्ली, मेरठ, सहारनपुर, बिजनौर और मुजफ्फरनगर है।
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हरियाणवी (बांगरू) : यह हरियाणा राज्य और दिल्ली के देहाती क्षेत्रों में बोली जाती है।
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दक्खिनी : यह दक्षिण भारत (हैदराबाद, बीजापुर आदि) के क्षेत्रों में प्रयुक्त होने वाली पश्चिमी हिंदी का ही एक ऐतिहासिक रूप है।
2. ओकार-बहुल बोलियाँ (जिनमें ‘ओ’ की ध्वनि अधिक होती है)
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ब्रजभाषा : यह मध्यकाल की सबसे प्रमुख साहित्यिक भाषा रही है। इसमें सूरदास, रसखान और बिहारी जैसे कवियों ने साहित्य रचना की। इसका मुख्य क्षेत्र मथुरा, आगरा, अलीगढ़ और एटा-मैनपुरी है।
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बुंदेली : यह बुंदेलखंड क्षेत्र (झाँसी, ग्वालियर, सागर, ओरछा, दमोह आदि) में बोली जाती है। प्रसिद्ध ‘आल्हा-खंड’ की मूल बोली बुंदेली से ही प्रभावित है।
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कन्नौजी : यह उत्तर प्रदेश के कन्नौज, फर्रुखाबाद, इटावा, कानपुर और पीलीभीत क्षेत्रों में बोली जाती है। यह ब्रजभाषा से काफी मिलती-जुलती है।
संक्षिप्त सारांश
| बोली | अन्य नाम | मुख्य क्षेत्र / पहचान |
| खड़ी बोली | कौरवी | मेरठ, दिल्ली / मानक हिंदी का मूल आधार |
| ब्रजभाषा | ब्रजी | मथुरा, आगरा / कृष्ण-काव्य का समृद्ध साहित्य |
| हरियाणवी | बांगरू | हरियाणा / ओजस्वी लोक-संस्कृति |
| बुंदेली | बुंदेलखंडी | झाँसी, सागर / लोकगाथा ‘आल्हा’ |
| कन्नौजी | — | कन्नौज, इटावा / ब्रज और अवधी के बीच की कड़ी |
नोट : कुछ भाषावैज्ञानिक ‘दक्खिनी’ को भी पश्चिमी हिंदी की ही एक विशिष्ट शाखा मानते हैं।