रुबाइयाँ (काव्य)
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शायर: फ़िराक़ गोरखपुरी (मूल नाम: रघुपति सहाय ‘फ़िराक़’)
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काव्य-रूप / छंद: रुबाई (उर्दू-फ़ारसी का चार पंक्तियों वाला लोकप्रिय छंद)
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मूल विषय: वात्सल्य रस, माँ-बच्चे का आत्मीय संबंध, भारतीय लोक-जीवन तथा दीवाली व रक्षाबंधन जैसे पावन पर्वों की सांस्कृतिक छटा।
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शायरी की विशेषताएँ:
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उर्दू शायरी को पारंपरिक रूमानी व दरबारी घेरे से निकालकर आम आदमी के लोक-जीवन, संस्कृति और प्रकृति के साथ जोड़ा।
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सूरदास के वात्सल्य वर्णन जैसी सहजता और भारतीय पारिवारिक जीवन का सजीव अंकन।
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हिंदी, उर्दू और लोकभाषा का सुंदर समन्वय (गांधीवादी ‘हिंदुस्तानी’ भाषा-दृष्टि)।
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1. रुबाई छंद का स्वरूप
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रुबाई उर्दू और फ़ारसी का एक विशिष्ट छंद या लेखन शैली है, जिसमें चार पंक्तियाँ होती हैं।
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इसकी पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुक (क़ाफ़िया/रदीफ़) मिलाया जाता है तथा तीसरी पंक्ति स्वच्छंद (तुकमुक्त) होती है।
2. विस्तृत पाठ-सार एवं प्रमुख रुबाइयाँ
रुबाई 1: माँ का वात्सल्य एवं बच्चे की क्रीड़ा
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माँ अपने आँगन में कलेजे के टुकड़े (चाँद के टुकड़े) जैसे सुंदर बच्चे को गोद में लेकर खड़ी है और उसे हाथों पर झुलाती है।
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जब माँ बच्चे को हवा में ऊपर उछालती (लोका देती) है, तो बच्चा खिलखिलाकर हँस पड़ता है और उसकी हँसी पूरे आँगन में गूँज उठती है।
रुबाई 2: स्नान, बाल सँवारना और वात्सल्य भरी दृष्टि
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माँ बच्चे को निर्मल और स्वच्छ जल से नहलाती है, फिर उसके बिखरे-उलझे बालों (गेसुओं) में कंघी करती है।
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जब माँ अपने घुटनों के बीच बच्चे को बैठाकर प्यार से कपड़े पहनाती है, तब बच्चा बड़ी आत्मीयता और प्रेम से अपनी माँ के चेहरे को निहारता है।
रुबाई 3: दीवाली का पावन पर्व और घरौंदे के दिए
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दीवाली की शाम घर पुते हुए और सजे-धजे हैं। घरों में चीनी मिट्टी के बने खिलौने और खील-बताशे (लावे) जगमगा रहे हैं।
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सुंदर मुखड़े वाली माँ के चेहरे पर एक कोमल व शांत चमक (नर्म दमक) है और वह बच्चे के बनाए छोटे से मिट्टी के घरौंदे में दीए जलाकर उत्सव की खुशियाँ बिखेरती है।
रुबाई 4: बाल-हठ और आईने में चाँद
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बच्चा आँगन में मचल (ठुनक) रहा है और आकाश के चमकते चाँद को पाने के लिए ज़िद (हठ) कर बैठा है।
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माँ चतुराई और ममता से बच्चे के हाथ में आईना (दर्पण) थमा देती है और कहती है—“देख, आईने में चाँद उतर आया है”। (सूरदास के ‘मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों’ प्रसंग का सुंदर आधुनिक रूप)।
रुबाई 5: रक्षाबंधन का पावन पर्व और भाई-बहन का प्रेम
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रक्षाबंधन की पावन सुबह सावन के महीने में आई है; आकाश में हल्की-हल्की घटा छाई हुई है।
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बहन (रस की पुतली) स्नेह और उमंग से भरी है। राखी के चमकीले लच्छे बिजली की तरह चमक रहे हैं, जिन्हें वह अपने भाई की कलाई पर बड़े प्रेम से बाँधती है।
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3.’रुबाइयाँ’ पाठ का मूल उद्देश्य
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वात्सल्य और मातृ-स्नेह की सहज अभिव्यक्ति: भारतीय पारिवारिक परिवेश में माँ और बच्चे के बीच के असीम, निश्छल और स्वाभाविक प्रेम को उजागर करना।
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शायरी को लोक-जीवन से जोड़ना: उर्दू शायरी को पारंपरिक दरबारी, रूमानी और रहस्यमयी घेरे से बाहर निकालकर आम घरेलू जीवन, लोक-संस्कृति और बाल-सुलभ गतिविधियों के करीब लाना।
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भारतीय सांस्कृतिक पर्वों का अंकन: दीवाली और रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक त्योहारों के उल्लास, आत्मीयता और पारिवारिक समरसता को काव्य का विषय बनाना।
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भाषागत समन्वय (गंगा-जमुनी तहज़ीब): हिंदी, उर्दू और ठेठ लोकभाषा के शब्दों का सहज गठबंधन प्रस्तुत करना, जिससे भाषा अधिक जीवंत, घरेलू और संप्रेषणीय बन सके।
4.’रुबाइयाँ’ की मूल संवेदना
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मातृत्व और शिशु-क्रीड़ा का तादात्म्य: पाठ की मूल संवेदना माँ की ममता और शिशु की निश्छल अठखेलियों के इर्द-गिर्द घूमती है। बच्चे को नहलाना, गेसुओं में कंघी करना, हवा में उछालना और चाँद की ज़िद करने पर आईने में चाँद दिखाना मातृ-हृदय की सूझबूझ और वात्सल्य रस की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
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पवित्र पारिवारिक रिश्ते: रक्षाबंधन के संदर्भ में भाई-बहन के अटूट, निर्मल और स्नेहपूर्ण बंधन को सावन की घटाओं और बिजली की चमक के प्राकृतिक बिंबों से जोड़कर रिश्तों की मिठास और गहराई को व्यक्त करना।
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सरल जीवन-मूल्य और आत्मीयता: साधारण व अभावग्रस्त जीवन में भी त्योहारों की खुशियाँ, दीयों की रोशनी और खिलौनों से उत्पन्न होने वाले आत्मिक संतोष को रेखांकित करना।
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5. पाठ में आए कठिन एवं विशिष्ट शब्दों के अर्थ (शब्द-छवि)
| शब्द | अर्थ |
| चाँद का टुकड़ा |
बहुत सुंदर / अत्यधिक प्यारा बालक (प्रतीकात्मक प्रयोग)
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| गोद-भरी |
गोद में बच्चे को लिए हुए / संतानवती
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| लोका देना |
बच्चे को प्यार से हवा में ऊपर की ओर उछालना
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| छलके-छलके |
लबालब भरे हुए / छलकता हुआ
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| गेसुओं |
बाल / लटें / केश
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| पिन्हाती |
पहनाती है
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| लावे |
खील / धान का भुना हुआ लावा
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| घरौंदे |
मिट्टी या गत्ते का बना बच्चों का छोटा खेल-घर
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| ठुनकना |
मचलना / रोते हुए रूठना
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| ज़िदयाया |
ज़िद पर अड़ा हुआ / हठी
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| हई |
है ही (अवधी/लोकभाषा का प्रयोग)
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| रस की पुतली |
अत्यधिक मीठी, स्नेहमयी व कोमल बहन/बालिका
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| लच्छे |
राखी के चमकदार धागे / रेशमी गुच्छे
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| शब |
रात (उर्दू शब्द)
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| नर्म दमक |
चेहरे की सौम्य व कोमल चमक / कांति
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6. मुख्य परीक्षा-उपयोगी प्रश्नोत्तर सारांश
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प्रश्न 1: शायर राखी के लच्छे को ‘बिजली की चमक की तरह’ कहकर क्या भाव व्यक्त करना चाहता है?उत्तर: सावन के महीने में जिस प्रकार बादलों की घटाओं में बिजली चमकती है, उसी प्रकार रक्षाबंधन पर भाई की कलाई पर बँधी राखी के रेशमी लच्छे चमकते हैं। यह चमक भाई-बहन के रिश्ते के पवित्र, उज्ज्वल और प्रगाढ़ प्रेम का प्रतीक है।
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प्रश्न 2: ‘गोदी के चाँद’ और ‘गगन के चाँद’ का क्या संबंध दिखाया गया है?उत्तर: माँ की गोद का बच्चा ‘गोदी का चाँद’ है और आकाश में चमकता चाँद ‘गगन का चाँद’ है। जब गोदी का चाँद गगन के चाँद को लेने की ज़िद करता है, तो माँ दर्पण में गगन के चाँद का प्रतिबिंब दिखाकर दोनों का मिलन करवा देती है।
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प्रश्न 3: रुबाइयों में हिंदी, उर्दू और लोकभाषा के समन्वय के उदाहरण दीजिए।उत्तर: ‘लोका देना’, ‘घुटनियों में लेना’, ‘पिन्हाती’, ‘ठुनक रहा’, ‘ज़िदयाया’ जैसे लोकभाषा के शब्दों के साथ ‘गेसुओं’, ‘नर्म दमक’, ‘मुखड़े’ (उर्दू) तथा ‘निर्मल जल’, ‘दर्पण’, ‘घटा गगन की’ (हिंदी तत्सम/तद्भव) का सुंदर मिश्रण हुआ है
फ़िराक़ गोरखपुरी द्वारा रचित ‘रुबाइयाँ’ के सभी प्रमुख अंशों की विस्तृत सन्दर्भ, प्रसंग, व्याख्या एवं विशेष दी जा रही है:
रुबाई 1:
“आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ीहाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरीरह-रह के हवा में जो लोका देती हैगूँज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हँसी”
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सन्दर्भ: प्रस्तुत रुबाई हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित काव्य ‘रुबाइयाँ’ से अवतरित है। इसके रचयिता उर्दू-फ़ारसी के प्रसिद्ध शायर फ़िराक़ गोरखपुरी (रघुपति सहाय ‘फ़िराक़’) हैं।
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प्रसंग: प्रस्तुत रुबाई में शायर ने माँ और शिशु के बीच के सहज, निश्छल वात्सल्य और आँगन में बच्चे के साथ खेलने के आनंदमय क्षण का चित्रण किया है।
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व्याख्या: शायर कहते हैं कि एक माँ अपने चाँद के टुकड़े जैसे अत्यंत सुंदर और प्यारे बच्चे को अपनी गोद में लेकर आँगन में खड़ी है। वह उसे अपने हाथों के सहारे प्यार से झुलाती है। खेलते-खेलते माँ जब बीच-बीच में बच्चे को प्यार से हवा में ऊपर उछालती (लोका देती) है, तो हवा में उछलते ही बच्चा खुशी से खिलखिला उठता है और उसकी वह मासूम हँसी पूरे आँगन में गूँजने लगती है।
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विशेष:
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वात्सल्य रस की अत्यंत स्वाभाविक एवं मनोहारी अभिव्यक्ति।
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‘चाँद का टुकड़ा’ में रूपक अलंकार की छटा।
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‘रह-रह’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार।
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‘लोका देना’ जैसे लोकभाषा के ठेठ शब्द का सुंदर प्रयोग।
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रुबाई छंद के नियमानुसार पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुकांतता (खड़ी, गोद-भरी, हँसी)।
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रुबाई 2:
“नहला के छलके-छलके निर्मल जल सेउलझे हुए गेसुओं में कंघी करकेकिस प्यार से देखता है बच्चा मुँह कोजब घुटनियों में ले के है पिन्हाती कपड़े”
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सन्दर्भ: पूर्ववत्।
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प्रसंग: माँ द्वारा बच्चे को नहलाने, बाल सँवारने और कपड़े पहनाने के दौरान बच्चे की माँ के प्रति आत्मीय दृष्टि का वर्णन किया गया है।
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व्याख्या: माँ अपने नन्हे बच्चे को लबालब भरे हुए पात्र से स्वच्छ व पवित्र (निर्मल) जल से नहलाती है। स्नान के बाद वह उसके उलझे हुए बालों (गेसुओं) को कंघी से सँवारती है। जब माँ बच्चे को अपने घुटनों के बीच सहारा देकर प्यार से कपड़े पहनाती है, तब वह अबोध बालक अत्यंत कृतज्ञता और स्नेह भरी आँखों से अपनी माँ के चेहरे को एकटक निहारता है।
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विशेष:
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‘छलके-छलके’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार।
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माँ और बच्चे के बीच के मूक प्रेम का सजीव व संवेदनशील बिंब।
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हिंदी (निर्मल जल), उर्दू (गेसुओं) और लोकभाषा (घुटनियों, पिन्हाती) का त्रिवेणी संगम।
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भाषा अत्यंत सरल, कोमल और दृश्यप्रधान है।
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रुबाई 3:
“दीवाली की शाम घर पुते और सजेचीनी के खिलौने जगमगाते लावेवो रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमकबच्चे के घरौंदे में जलाती है दिए”
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सन्दर्भ: पूर्ववत्।
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प्रसंग: इसमें दीवाली के पावन पर्व पर घर की सजावट, उल्लास और माँ द्वारा बच्चे के खिलौना-घर में दीप जलाने के दृश्य का चित्रण है।
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व्याख्या: शायर कहते हैं कि दीवाली की शाम को घर स्वच्छ रूप से पुते हुए और सजे-धजे हैं। घर में चीनी मिट्टी के बने खिलौने और धान की खीलें (लावे) जगमगा रही हैं। उस अवसर पर सुंदर रूप वाली माँ के चेहरे पर ममता और पर्व के उल्लास की एक सौम्य व कोमल चमक (नर्म दमक) दिखाई देती है। वह माँ अपने बच्चे की खुशी के लिए उसके छोटे से मिट्टी के घरौंदे में दीए जलाकर प्रकाश फैलाती है।
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विशेष:
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भारतीय लोक-संस्कृति और पारिवारिक पर्व के उल्लास का जीवंत अंकन।
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‘रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमक’ में सुंदर दृश्य बिंब।
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भाषा में माधुर्य गुण और शांति का भाव।
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रुबाई छंद की स्वाभाविक गेयता और प्रवाह।
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रुबाई 4:
“आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया हैबालक तो हई चाँद पै ललचाया हैदर्पण उसे दे के कह रही है माँदेख आईने में चाँद उतर आया है”
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सन्दर्भ: पूर्ववत्।
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प्रसंग: बालक द्वारा आकाश के चाँद को खिलौना समझकर पाने की ज़िद (बाल-हठ) और माँ द्वारा युक्तिपूर्वक उसे बहलाने का वर्णन है।
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व्याख्या: आँगन में खेलता हुआ बालक मचल रहा है और ज़िद पर अड़ गया है। बालक का स्वभाव ही ऐसा है कि वह आकाश में चमकते चाँद को देखकर ललचा गया है और उसे ही पाने की हठ कर रहा है। माँ अपने बालक की इस ज़िद को समझदारी और स्नेह से पूरा करने के लिए उसके हाथ में एक आईना (दर्पण) थमा देती है और कहती है—”देख बेटा, तेरा वह प्यारा चाँद अब इस आईने में उतर आया है”।
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विशेष:
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सूरदास के प्रसिद्ध पद “मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों” की आधुनिक और लोकधर्मी प्रस्तुति।
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‘ठुनक रहा’, ‘ज़िदयाया’, ‘हई’ जैसे लोकभाषा के स्वाभाविक शब्दों का प्रयोग।
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बाल-मनोविज्ञान और मातृ-हृदय की सूझबूझ का अनुपम चित्रण।
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तुकांत योजना अत्यंत चुस्त और प्रभावशाली है।
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रुबाई 5:
“रक्षाबंधन की सुबह रस की पुतलीछायी है घटा गगन की हलकी हलकीबिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छेभाई के है बाँधती चमकती राखी”
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सन्दर्भ: पूर्ववत्।
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प्रसंग: रक्षाबंधन के पावन पर्व पर सावन के प्राकृतिक सौंदर्य के बीच भाई-बहन के पवित्र प्रेम और राखी बाँधने के उल्लास का चित्रण किया गया है।
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व्याख्या: शायर कहते हैं कि रक्षाबंधन की पावन सुबह आई है और बहन प्रेम व मिठास से भरी हुई साक्षात ‘रस की पुतली’ लग रही है। सावन का महीना होने के कारण आकाश में बादलों की हल्की-हल्की घटाएँ छाई हुई हैं। जिस प्रकार बादलों के बीच बिजली चमकती है, ठीक उसी प्रकार राखी के चमकीले और रेशमी लच्छे चमक रहे हैं। बहन अपार स्नेह और मंगल-कामना के साथ अपने भाई की कलाई पर वह चमकती हुई राखी बाँधती है।
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विशेष:
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‘रस की पुतली’ में बहन के लिए मधुर लाक्षणिक एवं रूपक प्रयोग।
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‘बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे’ में उपमा अलंकार।
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‘हलकी हलकी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार।
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सावन की घटा, बिजली और राखी के लच्छों के बीच गहरा प्राकृतिक व भावनात्मक सामंजस्य।
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