जैन साहित्य की प्रवृत्तियां ( jain sahitya ki pravartiya)

जैन साहित्य की प्रवृत्तियां ( jain sahitya ki pravartiya)

1. आध्यात्मिक चिंतन की प्रधानता।

2. रहस्यवादी विचारधारा का समावेश।

3. बाह्य उपासना पूजा-पाठ, रूढ़ियों और शुद्ध आत्मानुभूति पर जोर।

4. दार्शनिकता और शास्त्रीय ज्ञान की अपेक्षा।

5. जैन धर्म की प्रतिष्ठा।

6. नारी रूप का चित्रण ।

7. भाव व्यंजना की अभिव्यक्ति।

8. रस निरूपण।

9. विरह की मार्मिक व्यंजना ।

10. प्रकृति का चित्रण।

11. प्रेम के विविधत रूपों का चित्रांकन।

12. संस्कृति और समाज का अंकन।

13. अलंकार और छंद योजना।

14. गीत तत्व की प्रधानता।

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