?? मुर्दहिया (आत्मकथा) ??
【डॉ. तुलसीराम】
◆ प्रकाशन :- 2010 ई.
?मुर्दहिया की भूमिका :-
◆ लेखक के गांव धरमपुर (आजमगढ़) की बहुद्देशीय कर्मस्थली :- मुर्दहिया
◆ चरवाही से लेकर हरवाही तक के सारे रास्ते मुर्दहिया से गुजरते थे।
◆ स्कूल हो या दुकान, बाजार हो या मंदिर, यहाँ तक कि मजदूरी के लिए कलकत्ता वाली रेलगाड़ी पकड़ना हो, तो भी मुर्दहिया से ही गुजरना पड़ता था।
◆ लेखक के गांव की ‘जिओ पॉलिटिक्स’ यानी ‘भू-राजनीति’ में दलितों के लिए मुर्दहिया एक सामरिक केन्द्र जैसी थी।
◆ जीवन से लेकर मरण तक की सारी गतिविधियाँ मुर्दहिया समेट लेती थी।
◆ मुर्दहिया मानव और पशु की मुक्तिदाता थी।
◆ हमारी दलित बस्ती के अनगिनत दलित हजारों दुख-दर्द अपने अंदर लिये मुर्दहिया में दफन हो गए थे। यदि उनमें से किसी की भी आत्मकथा लिखी जाती तो उसका शीर्षक ‘मुर्दहिया’ ही होता ।
◆ मुर्दहिया सही मायनों में हमारी दलित बस्ती की जिंदगी थी। इस जिंदगी को मुर्दा से खोदकर बाहर लाने का पूरा श्रेय ‘तद्भव’ के मुख्य संपादक अखिलेश को जाता है।
◆ अखिलेश हमेशा लेखक के सामने कलम के बदले फावड़ा लिये तैयार मिलते थे। सही अर्थों में लेखक ने उनके ही फावड़े से खोदकर ‘मुर्दहिया’ से अपनी जिंदगी को बाहर निकाला।
◆ मेरे घर से भागने के बाद जब ‘मुर्दहिया’ का प्रथम खंड समाप्त हो जाता है, तो गांव के हर किसी के मुख से निकले पहले शब्द से तुकबंदी बनाकर गानेवाले जोगीबाबा, लक्कड़ ध्वनि पर नृत्यकला बिखेरती नटिनिया, गिद्ध-प्रेमी परगल बाबा तथा सिंघा बजाता बंकिया डोम आदि जैसे जिन्दा लोक पात्र हमेशा के लिए गायब होकर मुझे बड़ा दुख पहुंचाते हैं।
◆ सबसे ज्यादा दुखित करने वाली बात दिल्ली में रह रहे मेरे गांव के कुछ प्रवासी मजदूरों से मालूम हुई।
◆ पचास-साठ साल पहले की जिस ‘मुर्दहिया’ का वर्णन मैंने किया है, वह पूर्णरूपेण उजड़ चुकी है। सारे जंगल कटकर खेत में बदल चुके हैं, जिसके चलते गिद्धों जैसे अनगिनत दुर्लभ पक्षियों तथा साहि, सियारों और खरगोशों जैसे पशुओं का विलोप हो चुका है।
◆ बचपन में दुखित होने का मतलब होता था आंखों में आंसू आ जाना। ऐसे अवसरों पर मेरी दादी आंख धो लेने को कहती थी, किंतु आज का अनुभव बताता है कि चंद पानी के छींटों से दुख की निशानी नहीं मिट पाती।
◆ प्रवासी मजदूरों से ही पता चला कि ‘मुर्दहिया’ से होकर जानेवाली एक सरकारी सड़क ने हमारे गांव को तीन जिलों- आजमगढ़, गाजीपुर तथा बनारस से जोड़ दिया है। उस पर टैम्पो भी चलने लगे हैं।
◆ जिस तरह हमारे गांव से बड़ी संख्या में मजदूरों का पलायन बड़े शहरों में हो चुका है, संभवतः मुर्दहिया से सड़क निकल जाने के कारण वहां के भूत-पिशाचों का भी पलायन अवश्य हो गया होगा।
◆ बढ़ते हुए शहरीकरण ने हर एक के जीवन को प्रभावित किया है। भूत भी इससे अछूते नहीं हैं।
◆ आने वाले ‘मुर्दहिया’ के दूसरे खंड में घर से भागने के बाद कलकत्ता, बनारस तथा दिल्ली होते इंग्लैंड तथा सोवियत संध / रसिया तक की जीवनयात्रा का लेखा-जोखा होगा।मूलतः यह यात्रा मार्क्सवाद से बौद्ध दर्शन की है।
◆ राजकमल प्रकाशन के निदेशक अशोक महेश्वरी इस बात के लिए धन्यवाद के पात्र हैं कि उन्होंने ‘तद्भव’ में अब तक प्रकाशित सात किस्तों को ‘मुर्दहिया’ (खंड-1) के रूप में अविलंब प्रकाशित करने का निर्णय लिया, जबकि आगे का लेखन अभी जारी है।【डॉ. तुलसी राम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली-110067】
1. भुतही पारिवारिक पृष्ठभूमि
2. मुर्दहिया तथा स्कूली जीवन
3. अकाल में अंधविश्वास
4. मुर्दहिया के गिद्ध तथा लोकजीवन
5. भुतनिया नागिन
6. चले बुद्ध की राह
7. आजमगढ़ में फाकाकशी
मुर्दहिया का आत्मकथा (murdahiya ka aatmakatha) पार्ट – 1
?? 4 मुर्दहिया के गिद्ध तथा लोकजीवन??
◆ पांचवीं पास करने के समय अकाल अपनी विभीषिका की चरम सीमा पर था।
◆ पांचवीं के बच्चों को परीक्षा के लिए सात मिला दूर बबुरा धनवां’ नामक गांव के स्कूल जाना था।
◆ हेडमास्टर परशुराम सिंह ने सभी बच्चों से कहा कि परीक्षा स्थल पर एक दिन रुकना है, किन्तु वहां खाने की कोई व्यवस्था नहीं होगी ।
◆ हेडमास्टर परशुराम सिंह के आदेश से हम लाइन बनाकर सैनिकों की तरह परेड करते हुए सात मील का रास्ता तय करके इम्तहान स्थल पर पहुंचे थे। हमारा वह अभियान माओत्से तुंग के उस ऐतिहासिक ‘लांग मार्च’ से कम नहीं था, क्योंकि उसमें भी तो वही ‘लाटा सत्तु वाले ही लोग शामिल थे।
◆ पोखरे की तरफ से आते हुए रामचरन यादव जी मुझे देखकर बोल पड़े : ‘आज त कौनो काम ना होई । ई कनवा सम्हने पड़ि गयल।’ मैंने पोखरे में नहाने जाने की बात बता दी। इतना सुनते ही उन्होंने उसी शेरपुर कुटी की रामलीला के ऋषि परशुराम की तरह रौद्र मुद्र चाटा तानत हुए आदेश दिया : ‘जल्दी से भाग चमार कहीं क।
◆ मुझे बड़ी राहत मिली जब मेरे सहपाठी संकठा सिंह ने नल चलाकर मेरे हाथ-पैर धुलवाया। चुपके से थोड़ी दूर पर स्थित एक ताड़ के पेड़ की आड़ में बैठकर चमरिया माई के थान की दिशा में देखते हुए मैंने ‘धार – पुजौरा की मनौती माना।
◆ बचपन की असहाय यादों में यह भी एक ऐसी याद थी, जो वर्षों तक मेरे दिमाग को हरदम कुरेदती रही। किन्तु इसके लगभग दो दशक बाद जब महाकवि शूद्रक का सदाबहार नाटक ‘मृच्छकटिकम्’ (मिट्टी की गाड़ी) के आठवें अंक को पढ़ने का मौका मिला, तो सारी दुर्भावना हमेशा के लिए मिट गई।
◆ उस जमाने में वैदिकों की बौद्धों के बारे में यह आम अवधारणा थी, जिसकी अभिव्यक्ति ‘मृच्छकटिकम्’ में एक सौन्दर्यथास्त्रीय विधा में शूद्रक ने की है।
◆ बबुरा घनहुवां के पोखरे पर पहुंचने से पहले जो कुछ मेरे साथ उस अकाल की कड़की में हुआ, उसमें रामचरन भैया मेरे आधुनिक शकार ही थे।
◆ शाम को पांचवी का रिजल्ट घोषित किया गया। उस परीक्षा स्थल पर मैं प्रथम घोषित हुआ।
◆ सन् 1959 की गर्मियों में सम्पन्न पाँचवी परीक्षा के बाद दो महीने से ज्यादा समय की छुट्टियां थीं। अकाल की गर्मी चरम सीमा पर थी।
◆ चमड़ों की कीमत प्रायः बीस रुपया होती थी।
◆ मुन्नर चाचा चमड़ा छुड़ाने में माहिर थे। चमड़ा छुड़ाते
◆ गिद्ध के चोंच मुन्नर चाचा की छुरी से कहीं ज्यादा तेज थे। यदि किसी गिद्ध की चोंच मेरे हाथों पर लग जाती तो मैं भी स्वयं उस मुर्दा गाय का एक हिस्सा बनकर रह जाता।
◆ गिद्ध रात में कुछ भी नहीं खाते थे। इस मायने में वे बौद्ध भिक्षुओं जैसे होते हैं, जो दिन में सिर्फ एक बार भोजन करते हैं।
◆ पागल बाबा के सम्बन्ध :-
● बगल के टड़वां गांव का एक व्यक्ति
● जिसे लोग सर्फ ‘पग्गल’ यानी पागल के नाम से जानते थे।
● पग्गल बाबा उसी फक्कड़ बाबा की तरह सिर्फ पतली सी लंगोटी पहने रहते थे।
● उसकी एक विचित्र आदत थी :- ठूंठे बरगद पर चढ़ जाते और गिद्धों की अनुपस्थिति में उनके खोते से सटकर बैठ जाते। वे हमेशा गिद्ध के अंडों को सहलाते रहते थे और उनके एक-दो अंडा नीचे उतार लाते।
● पग्गल बाबा पुराने अंडों को पुनः उसी खोते पर रख देते और किसी नए अंडे के साथ उतरकर इधर-उधर फिर बौड़ियाने लगते थे।
● वे अंडों को कभी नुकसान नहीं पहुंचाते।
● वे एक अद्भुत गिद्धप्रेमी थे।
◆ जोखू पांडे का के घर की एक रमौती नामक दलित महिला जो मुर्दहिया पर घास छील रही थी, उससे रहा नहीं गया। वह डांगर के लालचवश खुर्पा लेकर गिद्धों से भिड़ गई और मरे हुए बैल का कलेजा काटकर उनके खूंखार चोंचों से बचते हुए घास से भरी टोकरी में छिपाकर घर लाई।
◆ चौधरी चाचा ने रमौती के परिवार को कुजाति घोषित कर दिया गया और उसका सामाजिक बहिष्कार शुरू हो गया।
◆ चौधरी चाचा ने फैसला सुनाया कि उसका परिवार पूरी बिरादरी को ‘सुअर भात’ की दावत देगा, जिसके बाद उनका कुजातिपन समाप्त किया जाएगा।
◆ अकाल की उस भुखमरी सूअर – भात’ की यह दावत एक अनोखी घटना थी। अंततोगत्वा इस स्वादिष्ट दावत में के पीछे रमौती का परिवार एक बार फिर भारी कर्ज में डूब गया।
◆ भूत पिशाच को दलित ‘हवा-बतास’ भी कहते थे ।
◆ किसुनी भौजी के संबंध में :-
● उसका पति कतरास की कोइलरी में कोयला काटता था।
● पति नाम :- मुन्नी लाल ।
● उसके दो बच्चों थे ।
● उम्र – बाईस साल
● यह लेखक से चिट्ठी लिखवाती थी, तो लगता था कि दुखड़ा स्वयं अपना आत्मविवेचन कर रहा है।
● इनके ससुर का नाम :-‘जैदी’ (जो अपने बेटे से अलग रहते थे।)
◆ जेदी चाचा के संबंध में :-
● इनके ससुर का नाम :-‘जैदी’ (जो अपने बेटे से अलग रहते थे।)
● अपनी जवानी के दिनों में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उसी बंसू पाड़े के खानदान की हरवाही करते थे।
● विश्वयुद्ध के दौरान एक दिन वे हल जोत रहे थे। वहीं खेत से ही वे गायब हो गए। गांव वाले कहते थे कि अंग्रेज ढेर सारे मजदूरों का अपहरण करके लड़ाई के लिए विलायत ले गए थे।
● अनपढ़ थे लेकिन बातें अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के प्रोफेसर जैसी।
● जेदी चाचा को अंग्रेज विश्वयुद्ध के दौरान एक अस्थायी टहलुवा में बगदाद ले गए थे।
● जेदी चाचा का मूल नाम ‘लुरखुर’ था।
● बगदाद पहुंचने पर किसी अंग्रेज अफसर ने उन्हें शिया मुसलमानों के लोकप्रिय उपनाम ‘जैदी’ के नाम से पुकारना शुरू कर दिया।
● बंसू ने बकरी चोरी के आरोप में सबक सिखाने के लिए चिरैयाकोट थाने के एक ब्राह्मणं सिपाही, जिससे उनकी दोस्ती थी, को बुलाकर जेदी चाचा को बहुत पिटवाया और डोरी में बांधकर थाने ले जाने की तैयारी करने लगे । किसी तरह जेदी चाचा पांच रुपया घूस देकर पुलिस से छुटकारा पाए।
●बंसू पाड़े के इस छलिया कपट से आयातित होकर जेदी चाचा प्रतिरोधस्वरूप एक नए किस्म का सत्याग्रह करने लगे।
● वे सब काम-धाम बंद कर दाढ़ी-मूंछ बढ़ाना शुरू कर दिए तथा निचंड धूप में चारपाई डालकर एक चादर ओढ़कर दिन भर सोते रहते थे। वे इस मामले में निहायत जिद्दी थे। पंचायत आदि द्वारा किसी अन्य समझौते को वे मानने से साफ इनकार कर दिए थे। उसी अकाल में वे प्राण त्याग दिए।
● जेदी चाचा गुरमुख थे।
● वे शिव नारायण पंथ को मानने वाले थे।
● भुक्खड़ क्रांतिकारी बगदाद रिटर्न’ जेदी’ चाचा ।
◆ वर्तमान में लेखक अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के एक बड़े सेंटर का प्रोफेसर एवं अध्यक्ष बन चुका हूं,
◆ लेखक के असली प्रेरणा जनक वे तीन गरीब मजदूर थे:-
1. सोवियत संघ में समोहीखेती’ वाले मुन्नर चाचा
2. डांगे को डंगरिया’ कहने वाले सोनई
3. वद्रियल जेदी चाचा।
◆ जेदी चाचा के बाड़ी-मूंछ रखने का रहस्य मेरे मस्तिष्क में तब खुला जब सन् 1978-79 में ईरान पर शोध के दौरान मुझे पता चला कि वहां के गिलान प्रांत के मिर्जा कुछेक खां नामक एक क्रांतिकारी के नेतृत्व में सन् 1910 तथा 20 के दशक में हजारों युवकों ने कसम खाई थी कि जब तक वे अंग्रेज साम्राज्यवादियों को ईरान की धरती से भगा नहीं देंगे तब तक वे दाढ़ी-मूंछ बढ़ाते रहेंगे तथा घर छोड़कर जंगल में रहेंगे। ईरान में है। उनके इस आंदोलन को ‘जंगल आंदोलन’ तथा क्रांतिकारियों को जंगली कहा जाता है।
◆ डाकिया हमारे घर चौधरी चाचा को चिट्टी देने आया और बोला कि ‘मुवदास’ की चिट्ठी है। चौधरी चाचा ने कहा कि ‘मुवदास’ नाम का कोई व्यक्ति गांव में है ही नहीं।
◆ हमारे घर के पड़ोस में रहने वाले फेरू काका से उसकी मुलाकात हो गई। फेरू काका ने कहा कि चिट्ठी ‘तुलसिया’ को दिखाई जाए। मैं उस समय मुर्दहिया पर भैंस चरा रहा था। फेरू काका ने ही मुझे मुर्दहिया से जोरदार आवाज लगाकर बुलाया। मैं घबराया हुआ आया। घर पहुंचने पर डाकिया ने मेरे हाथ में चिट्ठी दे दी और कहा कि ‘देख त बेटा ई केकर चिट्ठी ही?’
उस पोस्टकार्ड पर पूरा पता यह लिखा था :
‘पावबल — मुर्बीदास
ग्राम—धरमपुर थाना चिरैयाकोट
(जिला आजमगढ़।)
◆ जब मैंने ‘पावबल मुर्बीदास’ का खुलासा ‘पावैं बलमू रविदास’ के रूप में किया। वास्तव में कलकत्ता जाकर बलमू अपने नाम के आगे ‘रविदास’ जोड़ लिये थे।
◆ मुर्बीदास’ का रहस्य खोलना मेरे लिए आर्किमिडीज या न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों द्वारा आविष्कृत किसी वैज्ञानिक फॉर्मूले से कम नहीं था।
◆ बलमू भैया के संबंध में :-
● अनाथ दलित युवक
● बचपन में ही भागकर कलकत्ता चले गए थे।
● वे वर्षों बाद उसे अकाल के बारे में सुनकर वहां से कौतूहलवश हालचाल लेने गांव आए।
● कलकत्ता जाकर बलमू अपने नाम के आगे ‘रविदास’ जोड़ लिये थे।
● वे कलकत्ता के ‘बेलिया घट्टा’ इलाके में बनानी दास नामक एक बंगाली दलित महिला की बाड़ी में रहते थे।
◆ जमकुरियवा वानर, यानी काले मुंह तथा लम्बी पूंछ वाला बंदर आ गया।
◆ मैं अपने ननिहाल आजमगढ़ के प्रसिद्ध गांव ‘तरवां’ चला गया। आज तरवां इसलिए भी प्रसिद्ध है क्योंकि भारतीय राजनीति में मुलायम सिंह के भूतपूर्व संकटमोचक ठाकुर अमर सिंह भी उसी गांव के रहने वाले हैं। (गर्मियों की छुट्टियां में)
◆ तरवां क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व तेज बहादुर सिंह नामक एक प्रख्यात कम्युनिस्ट नेता ने किया था।
◆ जब मैं इंटरमीडियट में पढ़ रहा था, तो तेजबहादुर सिंह के सम्पर्क में आया। उनका भी मेरे ऊपर गहन प्रभाव पड़ा था।
◆ लेखक के मामा नाम – राम सरन मामा (तरवां थाने से बहोरीपुर की तरफ सड़क बनाने का काम कर रहे थे)
◆ नाचनेवालियों का झुंड ‘मेलाघुमनी’कहा करते थे।
◆ वर्षा की इस आस के बीच 1 जुलाई, 1959 ने आगमन मेरी चिंता को धधका दिया। यह एक ऐसी तारीख थी जिससे मेरा भविष्य तय होने वाला था। घर में कोहराम मचा हुआ था। नग्गर चाचा जैसे विस्फोटक दिमाग वाले घर के लोग आरोप लगाने लगे कि मैं पढ़ाई के बहाने कामचोर बनना चाहता हूँ। बड़ी मुश्किल से दादी की जिद पर मुझे चार आना मिला, जो छठी कक्षा में नाम लिखाने की फीस थी। यह चवन्नी इस बात की गारंटी थी कि अब छठी से लेकर दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई का मार्ग खुल गया।
◆ मुधाफिर लाल के संबंध में :-
● छठी में अंग्रेजी पढ़ाने वाले मास्टर
● सभी लोग सिर्फ मुंशी जी के नाम से जानते थे।
● वे उसी जिगरमंडी गांव के रहने वाले थे, जहां के बाबू परशुराम सिंह थे।
● ये अंग्रेजी वाले मुंशी जी प्राइमरी वाले मुंशी जी से बिल्कुल भिन्न थे।
● वे अत्यंत मेहनती और अनुशासन वाले व्यक्ति थे।
● वे किसी के साथ भेदभाव नहीं करते थे।
● मेरी इस याददाश्त के कारण मुंशी जी मेरे सबसे बड़े प्रशंसक बन गए।
◆ मेरी बस्ती के बदलू और बलराम दो ऐसे हरवाहे थे, जो शाम के समय काम से वापस आने पर सीधे मेरे पास आते थे और मुझे हमेशा अंग्रेजी बोलने के लिए कहते।
◆ प्राइमरी स्कूल में मेरा जो स्थान गणित के लिए था वही छठी के बाद अंग्रेजी के लिए हो गया।
◆ अंग्रेजी भाषा के कारण छठी कक्षा मेरे लिए अत्यंत आकर्षक बन गई ।
◆ खेत में चारों तरफ से मेड़ द्वारा पानी को रोककर हल जीतने को लेव लगाना कहते थे।
◆ बांस के तीन छह-सात फीट लम्बी काड़ियों को एक साथ पचरी ठोककर चौड़ा बना दिया जाता था, जिसे हेंगा या पाटा कहा जाता था।
◆ सन् 1969 के बरसाती दिनों में इनकी वापसी से हमारी दलित बस्ती जीवंत हो उठी थी।
◆ परिवार के दो युवक सोवरन तथा गोकुल भैया पहलवानी सीखें। नटों द्वारा ऐसी पहलवानियां एक 15 दिवसीय पर्व की तरह होती थीं।
◆ अब जो चिट्ठियां मुझसे लिखवाई जाती थीं, उनमें किसुनी भौजी जैसी युवतियों द्वारा ऋतु वर्णन भी शामिल होने लगा था। उनके अर्थ वैसे ही होते थे, जैसे ‘पद्मावत’ में महाकवि जायसी की ये पक्तियां: – बरिस मघा झकोर झकोरी–मोर दोउ नैन चुवै जस ओरी ।’
◆ पहली बार सन् 1959-60 के जाड़ों में हमारे क्षेत्र के जहानागंज कस्बे में ब्लॉक विकास केन्द्र खोला गया था।
◆ उस समय जहानागंज ब्लॉक के एक मशहूर ‘बिरहा गायक थे, जो अपनी गायन शैली में विकास कार्यक्रमों को भी शामिल किए हुए थे। उनका नाम था जयश्री यादव ।
◆ अशिक्षा के कारण लिपि का ज्ञान न होने के कारण दलित लोग संभवतः भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अभिव्यक्ति के लिए कोहबर पेंटिंग का सहारा लिया था।
◆ मेरे ननिहाल तरवां के एक चचेरे मौसा थे, जो एक बड़े हाजिरजवाब स्वांग (यानी मसखरे) थे।
◆ वे सामाजिक कुरीतियों पर लोकशैली में तरह- तरह के व्यंग्य द्वारा प्रस्तुति को बहुत ही मार्मिक बना देते थे। उनका एक गीत मुझे आज भी स्मरण होते ही रोमांचित कर देता है जिसकी कुछ पक्तियां इस प्रकार हैं:
हरिजन जाति सहै दुख भारी हो।
हरिजन जाति है, दुख भारी जेकर खेतवा दिन भर जोतली,
◆ बालविवाह से उत्पन्न कुरीति के कारण बालक दूल्हे की जवान पत्नी को उसका ससुर अरहर और सनई की संयुक्त खड़ी फसल के बीच से जाने वाले रास्ते से विदा कराकर ले जा रहा है। अतः सामाजिक रूप से अमान्य व्यवहार के स्पर्श से गहन फसल के बीच सनई के पौधों से धुंघरू की गूंजती आवाजों से सारा रहस्य उजागर हो जाता है। ‘गीत गोविन्दम्’ में जयदेव द्वारा वर्णित कृष्ण के शारीरिक स्पर्श से राधा के पैरों में बंधी पायल के खनक जाने से जो रहस्य खुल जाता है, उससे कहीं ज्यादा सौन्दर्यथास्त्रीय रहस्य इन अधपेटवा दलितों की सनई से उजागर हो जाता है। इस प्रकरण में सनई की फलियां राधा के पायल से कहीं ज्यादा खनकती नजर आती हैं।
◆ गोकुल भैया की ससुराल बबुरा से करीब डेढ़ किलोमीटर पश्चिमोत्तर में स्थित दलित बस्ती में है।
◆ घोर अंधविश्वास :-
(1.) मेरी मां को रात में दिखाई देना बहुत कम हो गया । अतः टोटका स्वरूप वह रात के अंधेरे में सरसों के तेल से मिट्टी की ढकनी में कपास की बाती जलाकर यूं ही कुछ टूटने निकल पड़ती थी। वह तुरंत घर में यह कहते हुए वापस आ जाती थी कि वह ‘रतौन्ही’ ढूंढ रही थी। रतौन्ही आंख की एक बीमारी होती थी जिसके चलते रात में दिखाई देना कम हो जाता था। गांव में सबका विश्वास था कि दीया वाती जलाकर रतौन्ही ढूंढते हुए किसी के द्वारा ठोक दिए जाने से यह टोटका सफल हो जाता है ।
(2.) किसी भी व्यक्ति को हाथ में खाद्य सामग्री ले जाते देखकर कौवे झपट्टा मारने लगते थे। इस प्रक्रिया में यदि कौवे का पांव किसी के सिर से टकरा गया, तो इसे बहुत बुरा असगुन (अपशकुन) माना जाता था।
◆ मेरे पिता जी जिन पंडित जी की हरवाही करते थे, उनकी बेटी आशा लगभग मेरी ही उम्र की थी, किन्तु देर से पढ़ाई शुरू करने के कारण कक्षा पांच में पढ़ रही थी। मुझसे अपना ‘होमवर्क’ हल करवाती रहती थी, विशेष रूप से गणित वह ‘भैया’ के सम्बोधन से मुझे बुलाती भी रहती थी।
?? 5.भुतनिया नागिन ??
◆ ललती नटिनिया के संबंध में :-
● पिता का नाम :- सोफी नट (परिवार का मुखिया)
● यह नट परिवार इस्लाम धर्म को मानता था किन्तु कभी वे नमाज आदि नहीं पढ़ते थे।
● उनका रहन- सहन सब कुछ हिन्दुओं जैसा था।
● सोफी की बड़ी बेटी ललती( जिसे समस्त ग्रामीणवासी ‘नटिनिया’ के नाम से पुकारते थे)
● लेखक से अंग्रेजी सीखने के लिए अति उत्सुक ।
● ललती पूर्णरूपेण अनपढ़ थी, किन्तु अंग्रेजी के विचित्र बोल ने उसे बेहद प्रभावित कर दिया था।
● नटिनिया अप्रतिम मोहक होने के साथ एक अत्यंत कुशल नर्तकी थी।
● दलित प्रायः विभिन्न गांवों में ढोल की थाप पर लोकगायन के साथ अपनी थकान मिटाया करते थे। ढोल चाहे किसी गांव में बजे उसकी ध्वनि सुनते ही नटिनिया जहां भी हो, थिरकना शुरू कर देती थी।
● उसके अंग-प्रत्यंग नृत्यकला के कल-पुर्जे जैसे लगते थे।
● नटिनिया की अनोखी नृत्यकलाएं।
● दुनिया की वह पहली नर्तकी थी, जो मेरे जैसे नौसिखए लट्ठबादकों की लकड़ ध्वनी पर किसी श्मशान में यूं ही नाचने लगती थी।
● मैं उसके हाथ में दुधिया पकड़वाकर लिखवाता, किन्तु जब वह स्वयं लिखती तो उसका हाथ कांपने लगता । शीघ्र ही उसके कांपते हाथ नाचने की मुद्रा में आ जाते थे। वह मेरी विकट शिष्या थी। तमाम कोशिशों के बावजूद मैं उसे लिखना नहीं सिखा पाया।
● वह अंग्रेजी बोलना सीख जाए। उसने मुझसे पहला अंग्रेजी अनुवाद पूछा पिपरा पे गिधवा बइटल हउवैं।’ मैंने उसे बताया : ‘वल्वर्स आर सिटिंग आन पीपल ट्री ।’ यह वाक्य उसे इतना भाया कि उसने इसे तुरंत रट लिया ।(सातवीं में पढ़ रहा था)
◆ गांव वाले यह भी विश्वास करते थे कि यदि मंगलवार को किसी को कोई सांप काट ले तो उसे जहर नहीं चलेगा। इस अंधविश्वास के कारण लोग पानी वाले विषहीन सांप डोहा को पकड़-पकड़कर उससे अपने को कटवाने की कोशिश करते रहते थे।
◆ लोग कहने लगे कि वह मुर्दहिया का बहुत पुराना भूत था, इसलिए उसकी पूंछ झड़ गई थी। मेरे गुस्सैल नग्गर चाचा कहने लगे भूत नाग के रूप में घूमते हैं और उन्हें कोई मार दे तो भुतनी नागिन बनकर मारने वाले का फोटो खींचकर अपनी आंख में बसा लेती है और वह बारह वर्ष तक बदला लेने के लिए घूमती रहती है।
◆ घर वाले कहने लगे कि नटिनिया के चलते इसने नाग को मारा है।
◆ गांव की विचित्र महिला सोमरिया ने रहट्ठा जलाकर उस मरे गेहुंबन को एक मोटे डंडे से लटकाकर उसका एक हॉड़या तेल निकाला। गांव में किसी को कैसा भी फोड़ा हो, उस पर सांप का तेल लगा देने से शीघ्र ही ठीक हो जाता था।
◆ मैंने सांप को मुर्दहिया पर मारा था, इसलिए अफवाहों तथा अंधविश्वासों का बाजार काफी गर्म हो जाता था।
◆ भैंस के बांधने का कमरे को भैंसउर’ कहते थे।
◆ बैलों के बांधने का कमरे को ‘बर्दउल ‘ कहते थे।
◆ भैंस वाले कमरे में मेरी चारपाई लगा दी गई। वास्तविकता यह थी कि कमरा छोटा था। में अचानक यह सोचकर भयाक्रांत हो जाता था कि नागिन बदला लेने आ गई। डर के मारे रोंगटे खड़े हो जाते थे, किन्तु मैं चिल्ला भी नहीं सकता था। मेरे जीवन का यह एक अनोखा दौर था।
◆ लटकी :-
● भैंस का नाम
● यह भैस वही थी जिसकी पीठ पर चढ़कर लेखक मुर्दहिया जाया करता था।
● वह किसी मानव की अपेक्षा मुझसे ज्यादा घुली मिली रहती थी ।
● सवेरा होते वह प्रायः चारपाई से बाहर लटकी लेखक की बांह को ‘फूं फूं’ करके चाटने लगती थी ।
◆ तरवां गांव की मेरी चचेरी मामी धनवंती। उसके बेटे लक्खन का गौना हो गया था किन्तु उसकी पत्नी मोटी थी, इसलिए वह उसे विदा कराने नहीं जाता था।
◆ स्कूल के संस्कृत पंडित जी के कहने पर शेरपुर कुटी पर लगे एक मेले से मैंने चार आने की एक छोटी-सी ‘गीता’ खरीदी।
◆ रोज सुबह उस भैंसउर से उठने के बाद गीता से पांच श्लोक पढ़ता और आश्वस्त हो जाता कि अब नागिन पास नहीं फटकेगी।
◆ मैंने घर से हमेशा के लिए भागने से पूर्व तीन साल से भी ज्यादा का समय उसी भैंसउर में गीता पढ़ – पढ़कर बिताया।
◆ शायद दुनिया की वह पहली भैंस थी, जो इतने लम्बे समय तक मुझसे गीता का प्रवचन सुनती रही।
◆ यह कैसी विचित्र कहानी थी जो सौन्दर्यमोहिनी नटिनिया से शुरू होकर भुतनिया नागिन से होते हुए भैंस के तबेले में जा गिरी?
◆ गांव वाले ठीक ही कहते थे ‘करिया अक्षर भैंस बराबर’, इतना ही नहीं, आज मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि चार सौ साल पहले जब शेक्सपियर ने अपना विश्वविख्यात दुखांत नाटक ‘एंटोनी एंड क्लियोपेट्रा’ लिखा तो शायद उसे मेरे ही गांव वाले जैसे लोगों से नाग-नागिन की प्रेरणा मिली होगी, अन्यथा एंटोनी द्वारा अपनी ही तलवार से आत्महत्या के बाद उसकी चहेती मित्र की रानी क्लियोपेट्रा किसी सपेरे की नागिनों से अपने को डसवाकर क्यों मरती?
◆ चौधरी सोम्मर चाचा की पीठ पर गणित के लघुत्तम तथा महत्तम जैसे सवाल हल करने लगता था।
◆ बगल के गांव टड़वां के परभू चौबे यज्ञ कराने के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। उन्होंने हम घर वालों को सुझाव दिया कि चौधरी की जान बचानी है तो शंकर भगवान की मूर्ति ग्यारह सौ एक कमल का फूल चढ़ाकर लगातार नौ दिन तक ‘गायत्रि जाप कराया जाये और साथ ही नौवें दिन 501 ब्राह्मणों को भोज दिया जाए। उनकी बात मान ली गई।
◆ गायत्री जाप तथा ब्राह्मणभोज से चौधरी चाचा की बीमारी पर कोई असर नहीं पड़ा। शीघ्र ही हफ्ते भर के अंदर चौधरी चाचा की मृत्यु हो गई।
◆ चूड़ियां फोड़ना भविष्य में एकाकी जीवन का प्रतीक था।
◆ चौधरी चाचा गुरुमुख नहीं थे, इसलिए शिवनारायण पंथ वाला कोई कर्मकांड उनके साथ नहीं जुड़ा था। कोई गाजा बाजा भी नहीं था । किन्तु वही बरहलगंज वाला बंकिया डोम अपना युद्धोन्मादी सिंघा लेकर आ धमका था। वह बेहद तीव्र ध्वनि के साथ सिंघा बजा रहा था। सिंघा बजाते समय उसका रौद्र रूप देखने में ऐसा लगता था कि मानो वह स्वर्ग का पाटक खोलने के लिए देवराज इंद्र को फरमान जारी कर रहा हो।
◆ गुरुमुख न होने के कारण चौधरी चाचा को दफनाया नहीं जा सकता था, इसलिए उन्हें गाजीपुर जिले में स्थित बहती गंगा में जलसमाधि देने का निर्णय लिया गया था।
◆कवि काजी नजरुल के शब्दों में ‘आकाशे दमामा बाजे’ वाली स्थिति थी। घंटों तक दफले-नगाड़े बजते रहे। भोज के बाद इनकी ध्वनियां और तेज हो गई थीं।
◆ लेखक की मां बस्ती के किसी भी व्यक्ति से बात करती, पिता जी तुरंत उसके चरित्र पर उंगली उठाना शुरू कर देते थे। वे मां को बहुत भद्दी-भद्दी गालियां देने लगते थे। उनकी गालियों से ही पता चला कि मेरे नाना का नाम सरजू था। वे हमेशा गाली में ‘सरजुवा की बेटी’ का इस्तेमाल करते थे।
◆ सांस्कृतिक कार्यक्रमों में पहली बार एक फिल्म दिखाई गई। जिसका नाम था ‘चक्रधारी’ 【 1961 में नवम्बर के महीने में 】
◆ चक्रधारी फिल्म का एक गाना सबकी जुबान पर छा गया। गाने की पहली लाइन थी : ‘चोली तूं सीना संभाल के ऐ दरजी
◆ चक्रधारी फिल्म के अंत में सिर्फ इतना समझ में आया था कि अकाल के कारण एक कुम्हार का मिट्टी के बर्तन बनाने का कारोबार खत्म हो गया था,किन्तु कृष्ण भगवान की पूजा से तेज बारिश हुई और कुम्हार के घर खुशहाली वापस आ गई।
◆ घर की एक भाभी दुलरिया :-
● जो पहलवानी सीखने वाले गोकुल भैया की पत्नी थीं।
● जो बबुरा धनवां गांव के पास वाली चमरौटी से व्याह कर आई थी।
● एक तरह के मनोरोग से पीड़ित हो गई।
● उनका अक्सर पेट दर्द करता और वह तुरंत ओझती वाली भभूत मांगने लगतीं।
● उस समय पास के ही चतुरपुरा नामक गांव में एक दलित औरत ओझैती करती थी। उसे लोग ‘चमैनिया’ के नाम से पुकारने लगे थे। लगभग हर रोज ही वह भभूत लाने को कहतीं ।
◆ इस संदर्भ में मुझे याद आता है एक ढाई हजार साल पुराना भुतहा बौद्ध भिक्षु जो बीमार पड़ने पर सूअर के वध्यस्थल पर जाकर उसका कच्चा मांस खाता तथा खून पीकर कहता कि उसकी बीमारी ठीक हो गई। उस भिक्षु के बारे में अन्य भिक्षुओं ने बुद्ध को बताया जिसके बाद उन्होंने एक नियम बनाकर अनुमति दी कि भुत रोग से पीड़ित भिक्षु सूअर के कच्चे मांस तथा खून का सेवन कर सकता है। इस घटना का उल्लेख ‘बिनय पिटक’ के ‘भैषज्य स्कंधक’ में किया गया है।
◆ पिता जी के भाइयों में दूसरे नम्बर वाले भंडारी चाचा कलकत्ता की एक जूट मिल से रिटायर होकर घर वापस आए। उन्हें रिटायरमेंट के बाद की कुल जमाराशि 1760 रुपए मिली थी।
◆ जो पांच रुपए लेकर किसी बिके हुए पेड़ की जड़ को पांच टांगा मारकर काटता । हमारे पूरे इलाके में बैलाकोट नामक गांव में ऐसा सिर्फ एक व्यक्ति था।
◆ स्कूल के संस्थापक बाबा हरिहर दास ने पहले ही सूचना दे दी थी कि स्वामी जी अमुक दिन आने वाले हैं। स्वामी जी के बारे में अध्यापक लोग कहते थे कि दोनों करों यानी हाथों में जितना भोजन अंटता है, उतना ही वे खाते हैं, इसलिए उनको ‘करपात्री’ कहा जाता है।
◆ बाबा हरिहर दास ने बताया कि स्वामी करपात्री जी देश में ‘रामराज’ लाने के लिए काम कर रहे हैं।
उनकी पार्टी रामराज्य परिषद चुनाव मैदान में थी।
◆ बाद में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रजीवन में मुझे पहली बार 1968 में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक ‘रामराज्य और मार्क्सवाद’ से पता चला कि स्वामी करपात्री जी ने 1957 में ‘मार्क्सवाद और रामराज्य’ नाम की एक भारी भरकम पुस्तक लिखी थी जिसमें उन्होंने सती प्रथा तथा बाल विवाह जैसी अनेक कुरीतियों का समर्थन किया था। इसके अलावा उन्होंने कम्युनिज्म का विरोध तो किया ही था।
◆ स्वामी करपात्री जी ने काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश का जबर्दस्त विरोध किया था जिसके चलते वे जेल भी गए थे।
◆ इससे पहले स्वामी जी ने डॉ. अम्बेडकर द्वारा 1951 में प्रस्तुत ‘हिन्दू कोड बिल’ का विरोध करते हुए कहा था कि डॉ. अम्बेडकर हिन्दू धर्म को नहीं समझते, क्योंकि उन्हें संस्कृत नहीं आती। स्मरण रहे कि डॉ. अम्बेडकर ‘हिन्दू कोड बिल’ के माध्यम से भारत की समस्त महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार दिलाना चाहते थे, किन्तु हिन्दू कट्टरपंथियों के विरोध के चलते जवाहरलाल नेहरू ने बिल को वापस ले लिया था, जिसके विरोध में डॉ. अम्बेडकर ने केन्द्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था इस्तीफे के बाद डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि जो योगदान वे भारतीय संविधान लिखकर नहीं कर पाए थे, उसे वे हिन्दू कोड बिल के माध्यम से पूरा करना चाहते थे। इन तमाम जानकारियों के बाद स्वामी करपात्री जी के प्रति सातवें दर्जे में पढ़ते हुए जो अगाध श्रद्धा जागी थी, वह यकायक चकनाचूर हो गई।
◆ स्वामी करपात्री जी के बाद ‘जनसंघ’ पार्टी के उम्मीदवार ने, जो रानीपुर इंटर कॉलेज के प्रिन्सिपल थे, हमारे स्कूल में एक सभा की।
◆ वे बार-बार राणा प्रताप तथा रानी लक्ष्मीबाई का गुणगान करते हुए भाषण देने लगे। हमें उनकी बातें वही उबाऊ सी लगती थीं।
◆ स्कूल के बड़े छात्रों का वंदना था कि जनसंघ अमीरों की पार्टी है।
◆ जनसंघ का चुनाव चिह्न ‘दीया बाती’ था, इसलिए लड़कों का नारा था:’ इस दीए में तेल नहीं- – चुनाव जीतना खेल नहीं’ ।
◆ कम्युनिस्ट पार्टी मंडली ने एक क्रांतिकारी गाना गाया, जो इस प्रकार था :
ललका झंडा मोटका डंडा
कब उठइबा बलमू जमींदार लुटेरवा
कब भगइबा बलमू
ललका झंड मोटका डंडा
(यह गाने को फैजाबाद जिले के राजबली यादव नामक एक प्रसिद्ध कम्युनिस्ट लोकगायक ने लिखा था। )
◆टुंटवा के संबंध में :-
● दलित बस्ती में एक विवाह समारोह के अवसर टुंटवा का नाच’ इनके द्वारा किया गया ।
● ‘टुंटवा’ की बेटी हमारे गांव में व्याही गई थी।
● वे जन्म से ही एक हाथ के टूटे थे। टूटे हाथ में पंजा नहीं था तथा पूरी बांह बड़ी पतली थी। इसलिए उन्हें टुटवा के नाम से जाना जाता था।
● वे अत्यंत हाजिरजवाब स्वांग थे।
● उन्होंने एक नाचमंडली खोल ली थी जिसे टुटवा का नाच के रूप में बहुत ख्याति मिली थी।
● टुंटवा भी एक अनपढ़ खेत मजदूर थे, किन्तु उनकी सामाजिक एवं राजनीतिक व्यंग्य शैली हरिशंकर परसाई जैसी थी।
● उनकी एक सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि ये पूर्वनियोजित ढंग से कोई गीत या डायलॉग तैयार नहीं रखते थे।
● वे लिखना पढ़ना नहीं जानते थे।
◆ तालपुट नाटककार के संबंध में :-
● गौतम बुद्ध का समकालीन वह व्यक्ति जिसका नाम था तालपुट नाटककार ।
● तालपुट नाटककार की एक वृहद नाटकमंडली थी जिसे लेकर वह गांव-गांव घूम-घूमकर नाटक दिखाता था।
● एक दिन वह अपनी मंडली के साथ श्रावस्ती पहुंचा और बुद्ध का उपदेश सुना, जिसके बाद वह बौद्ध भिक्षु बन गया।
◆ दलित लोकगायक सुखई के संबंध में :-
● चुनावों के दौरान लेखक गाँव आये।
● सुखई की बहन हमारे गांव के रामवली नामक खेत मजदूर से व्याही गई थी ।
● सुखई ‘गायकी’ के महान अभिनेता थे।
● वे रानी सारंगा, छप्पन छुडी, संव लौरिक जैसे लोकप्रिय पात्रों से सम्बद्ध प्रचलित लम्बी-लम्बी कहानियों को गा-गाकर सुनाते थे।
● किस्सा गायन में समय समय पर वार्तालाप शैली का भी समावेश होता रहता था ।
● सुखई अपने आप में एक वृहद् मंडली थे।
● किस्सा गायकी में अकेले होते थे,
● सुखई अनपढ़ खेत मजदूर थे, किन्तु उनकी याददाश्त बेजोड़ थी।
● वे अपनी इस कला में किसी वाद्ययंत्र का इस्तेमाल नहीं करते थे।
● वे हमेशा खड़े होकर अपने कानों में उंगली डालकर तेज स्वर में गाकर किस्सा सुनाने लगते थे।
◆ पिता जी ने मुझे बताया कि बाबा हरिहर दास ने उन्हें दो रुपया दिया, इसलिए उन्होने ‘रामराज’ को बेट दे दिया। “रामराज का मतलब स्वामी करपात्री जी की ‘रामराज्य परिषद’ नामक पार्टी से था।
◆ बंसू पांडे बगुला मारकर खा जाते थे ।
◆ दलित कभी बगुलों को मारकर नहीं खाते थे। पिछले अकाल की भुखमरी में भी किसी दलित ने बगुलों को कभी नहीं मारा।
◆ सन् 1962 वाले गर्मी के दिन थे। उस समय आठवें दर्जे में कृषि विज्ञान की पढ़ाई आवश्यक हुआ करती थी।
◆ गर्मी की छुट्टियां आने पर स्कूल के प्रधानाध्यापक श्री धर्मदेव मिश्र ने फसलों की देख-रेख के लिए मेरी ड्यूटी पक्की कर दी थी।
◆ पलाश की जड़ को बकेल कहते हैं।
◆ कमरवा कमअरी’ नामक गांव से हमारे घर बरात आई थी। मेरे गुस्सैल नग्गर चाचा की बेटी किस्मतिया की शादी थी।
◆ महफिल को मजलिस कहते है।
◆ फारसी भाषा में मजलिस का मतलब पार्लियामेंट होता है।
◆ मैं मजलिसों में थास्त्रार्थ के लिए काफी मशहूर हो गया था
◆ 1962 में नौवीं कक्षा में अन्य विषयों के साथ ‘रेखागणित एक नया विषय था। नौवीं कक्षा में मुझे रेखागणित सर्वाधिक प्रिय लगती थी।
◆ हीरालाल लोहार के संबंध में :-
● लेखक का सहपाठी (नौवीं कक्षा का)
● लेखक से रेखागणित के चित्र बनाते।
● वे मुझे ‘चमरा-चमरा’ कहकर बुलाते तथा बात-बात पर गालियां देने लगते थे।
● वे फुटबॉल के बहुत अच्छे खिलाड़ी थे।
● मैं उनका बड़ा प्रशंसक था, किन्तु वे मुझे जन्मजात दुश्मन समझने लगे थे।
● वे हमेशा कुछ क्षत्रिय छात्रों के साथ रहते और जातिसूचक गालियों का इस्तेमाल करते।
◆ 20 अक्तूबर, 1962 को भारत-चीन युद्ध शुरू हो गया। प्रधानाध्यापक धर्मदेव मिश्र लगभग रोज ही स्कूल पर सभा करते और बताते कि युद्ध के लिए हथियार के बदले अमरीका सोना मांग रहा है। वे सुरक्षाकोष में सोना इक्ट्ठा करने के लिए प्रेरित करते।
◆ नग्गर चाचा का बेटा कुद्दन कहता था कि चीन में जब लोग साठ साल के बूढ़े हो जाते हैं, तो उन्हें सरकार अच्छा खाना खाने की दावत देती है। फिर दावत में आए हजारों बूढों को गोली मार दी जाती है।
◆ धर्मदेव मिश्र बताते कि चीनी लोग पिकली, गिरगिट, सांप आदि सब कुछ खा जाते हैं।
◆ गांव के ब्राह्मण मुझे अणकुटवा कहने लगे ।
◆ साइकिल भुजही गांव के रणबीर सिंह की थी। पूरे स्कूल में वही एक ऐसे व्यक्ति थे जो साइकिल से आते-जाते थे।
?? 6 चले बुद्ध की राह? ?
◆ प्रिन्सिपल धर्मदेव मिश्र आजमगढ़ के वीररस के प्रसिद्ध कवि श्याम नारायण पांडे के गांव डुमराव के रहने वाले थे।
◆ वीररस में लिखी गई ‘हल्दीघाटी’ नामक रचना के चलते श्याम नारायण पांडे को काफी प्रसिद्धि मिली थी।
◆ ‘हल्दीघाटी की ये पक्तियां आज भी लाखों लोगों की जबान पर थिरकती रहती हैं :
रण बीच चौकड़ी भर भर ‘चेतक’ बन गया निराला था।
राणा प्रताप के घोड़े से,पड़ गया हवा का पाला था
◆ धर्मदेव मिश्र स्वयं कवि थे। कवि होने के नाते उन्होंने अपना उपनाम ‘कमलेश’ रख रखा था।कमलेश जी भक्ति साहित्य में ‘कृष्णाश्रयी’ यात्रा के बड़े प्रशंसक एवं अनुयायी थे।
◆ हिन्दी पढ़ाने वाले एक अध्यापक पारस नाथ पांडे थे, जो राहुल सांकृत्यायन के गांव कनैला के रहने वाले थे। वे कक्षा में अक्सर बताते थे कि राहुल सांकृत्यायन बचपन में ही घर से भाग गए थे तथा कम्युनिस्ट बनकर रूस में रहते हैं। उनका यह भी कहना था कि राहुल गोमांस खाते हैं तथा हिन्दू धर्म के विरोधी हैं। वे राहुल जी की प्रसिद्ध पुस्तक वोल्गा से गंगा का नाम लेकर कहते कि इसके अलावा उन्होंने सैकड़ों किताबें लिखी हैं।
◆ इस दौरान सबसे ज्यादा प्रभावशाली एवं दूरगामी सिद्ध हुआ अंग्रेजी का एक पाठ, जिसका शीर्षक था- गौतम बुद्ध।
◆ यह पाठ नौवीं कक्षा की अंग्रेजी विषय की पुस्तक ‘फाइटर्स ऑफ फ्रीडम’ (स्वाधीनता के सेनानी) का हिस्सा था।
◆ इस पुस्तक में गौतम बुद्ध के अलावा अब्राहम लिंकन, गांधी, नेहरू आदि 6 महापुरुषों का चरित्र चित्रण था।
◆ इस पाठ्यक्रम को पढ़ाने वाले अध्यापक थे सूर्यभान सिंह वे अत्यंत गम्भीर तथा विनम्र स्वभाव वाले अध्यापक हुआ करते थे।
◆ अंग्रेजी पढ़ाते समय वे पहले
एक-एक शब्द का हिन्दी में अर्थ बताते तथा बाद में पूरे वाक्य का अनुवाद।
◆ इस दौरान 14 अप्रैल, 1963 को चिरैयाकोट थाने से सूचना आई कि प्रख्यात विद्वान महापंडित राहुल सांकृत्यायन का निधन हो गया है, इसलिए दोपहर बाद स्कूल में छुट्टी रहेगी।
◆ लालबहादुर सिंह के संबंध में :-
● ओझा- सोखा (तांत्रिक) रिश्तेदारों के गांव मंगरपुर के एक बड़े जमीदार के बेटे थे।
● हाई स्कूल के छात्र थे
● लेखक के दोस्त
● उनके घर में घोड़ा पाला जाता था जो उनका एक्का खींचता था।
● वह कम उम्र में ही भयंकर शराबी बन गए थे।
● लालबहादुर सिंह ने उस दिन मेरी इच्छा के विरुद्ध मुझे एक तरह से जबरन शराब पिलाई।
शराब पीने के इस पहले ही अवसर ने मुझे नशे में एकदम चकनाचूर कर दिया था।(नौवीं कक्षा खत्त होने बाद गर्मी की छुट्टियों में)
◆ गेहूं के बाली समेत डंठलों को कुचलने के लिए गोलाई में हांका जाता था, जिसे दंबरी कहते थे।
◆ गर्मी की छुट्टियां बीतने वाली थी तथा जुलाई 1963 से कक्षा दस की पढ़ाई शुरू होने वाली थी।
◆ घर वालों के विरोध के बावजूद मैं सुबह बिना कुछ खाए खाली पेट स्कूल जाने लगा।
◆ दसवीं कक्षा में मैं अत्यधिक दुखित रहने लगा। घर का वातावरण एकदम दूषित हो चुका था। मुझे प्रायः गालियों के सम्बोधन से पुकारा जाता।
◆ अम्बिका सिंह के संबंध में:-
● लेखक का सहपाठी (दसवीं कक्षा )
● वे हिंसक प्रवृत्ति नहीं थे।
● वे हमेशा शराफत से बात करते थे।
● उनकी मूल शिकायत यह थी कि कक्षा में अध्यापकों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का जवाब मैं ही क्यों सबसे पहले दे देता हूं?
◆ स्कूल के संस्थापक बाबा हरिहर दास क्षत्रिय थे, इसलिए वहां इस समुदाय का बोलबाला था। अधिसंख्य अध्यापक भी क्षत्रिय थे।
◆ सुग्रीव सिंह के संबंध में :-
● कक्षा दसवीं के हिंदी के अध्यापक
● हाल ही में गोरखपुर विश्वविद्यालय से बी.ए. पास कर अध्यापक बने थे।
● वे मुझे खूब प्रोत्साहित करते थे।
● मेरे संरक्षक जैसे बन गए।
◆ चिन्तामणि सिंह के संबंध में
● लेखक का सहपाठी (दसवीं कक्षा )
● वे प्राइमरी स्कूल में प्रधानाध्यापक परशुराम सिंह के सगे भतीजे थे।
● जो जिगरसंडी गांव के 22 जोड़ी बैलों वाले बड़े जमींदार थे।
● वे पढ़ाई-लिखाई में बहुत कमजोर थे।
● वे मिरगी यानी मृगी रोग से पीड़ित थे।
● वे समय-समय पर कक्षा में ही बेहोश होकर गिर जाते थे।
● चिन्तामणि के पिता लक्ष्मी नारायण सिंह एक बहुत नामी वैद्य थे जो स्वयं उनका उपचार करते थे।
● चिन्तामणि सिंह मेरे घर की परिस्थिति से पूरी तरह परिचित थे।
● वे मुझसे कहते कि कक्षा में जो कुछ पढ़ाया जाए, मैं उसे खाली समय में उन्हें संक्षेप में समझा दिया करूं। मैं वैसा ही करने लगा।
● छुट्टियों के दिन वे अपने घोड़े पर चढ़कर मेरे घर आ जाते थे।
◆ एक रविवार के दिन चिन्तामणि सिंह मेरे घर आए। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं रोज शाम को उनके गांव जाकर रात में टिककर उन्हें पढ़ाऊं तथा रात का खाना उनके घर में ही खा लिया करूं।
● चिन्तामणि सिंह के चाचा बहुत अच्छे घुड़सवार थे। उस मेले में वे अपने घोड़े को हवा की तरह उड़ाए थे।
● मैं रोज शाम को करीब छः घंटे पैदल चलकर चिन्तामणि सिंह के गांव जिगरसेडी चला जाता था।
● उनके बाईस जोड़ी बैल बांधे जाते थे।
● चिन्तामणि सिंह अपने घर में से खाना लाकर एक मजदूर की थाली में डाल देते थे। मैं जब खा लेता था, तो वे मजदूरों को खिलाते थे।
● एक कमरे में कुर्सी टेबल रखा गया था जिस पर बैठकर मैं चिन्तामणि सिंह को पढ़ाया करता था।
● गणित, रेखागणित तथा अंग्रेजी में बहुत कमजोर थे ।
● मैं हाई स्कूल में निर्धारित पांचों विषयों को बारी-बारी से उन्हें रोज पढ़ाता था।
● यह विचार उत्पन्न होता था कि चिन्तामणि सिंह का घोड़ा चुराऊं और उस पर बैठकर बुद्ध की तरह भाग जाऊं।
● जब में उनके बाईस जोड़ी बैलों को याद करता हूं, तो अचानक मेरे दिमाग में सुत्तपिटक में वर्णित प्राचीन कोसल क्षेत्र का वह ब्राह्मण याद आ जाता है, जो अपने चौदह बैलों की चोरी के चलते बहुत दुखित रहा करता था।
● इस तरह दिसम्बर 1963 तक करीब तीन महीने तक में उन्हें पढ़ाने जिगरसंडी जाता रहा।
◆ महेन्द्र सिंह के संबंध में :-
● लेखक का सहपाठी (दसवीं कक्षा)
● मेरे गांव से करीब छह किलोमीटर दूर पश्चिम में स्थित चक्रपानपुर के रहने वाले थे।
● इनके घर में हाथी पाला जाता था।
● वे भी कभी-कभी अपने महावत के साथ हाथी पर बैठकर मुर्दहिया के जंगल स्थित पीपल तथा बरगद की डालियां काटकर ले जाने के लिए हमारे गांव आते थे।
● महिने में एक बार मंगरपुर वाले लालबहादुर सिंह अपना इक्का लिए मेरे स्कूल पर अवश्य आ जाते थे और वहीं से मुझे लेकर बरहलगंज बाजार चले जाते थे।
● बरहलगंज बाजार में भी एक देशी शराबखाना था।
● शराबखानों में दो प्रकार का मिट्टी का भरुका होता था।:-
√ एक छोटा भरुके में :- आठ आने की शराब
√ दूसरा उससे दुगुना बड़े में :- एक रुपए की शराब
● लालबहादुर सिंह की आत्मीयता के चलते मैं उन्हें मना नहीं कर पाता था और हमेशा उनके साथ चल देता था।
● वे मेरे लिए छोटा तथा अपने लिए बड़ा चुक्कड़ लाते।
● वे जब भी मुझे बरहलगंज के शराबखाने में ले जाते मैं वहीं से सीधे चिन्तामणि के गांव चला जाता था।
● चिन्तामणि सिंह का जिक्र होते ही मेरी मां शंकर भगवान की प्रार्थना करते हुए उनकी मिरगी ठीक हो जाने की गुहार लगाती रहती थी।
● सन् 1964 का नया साल आने वाला था और आगामी मार्च में दसवीं कक्षा की फाइनल परीक्षा होने वाली थी।
● चिन्तामणि सिंह ने मुझसे कहा कि उनके गांव आने-जाने में मुझे काफी समय लग जाता है, इसलिए उसी प्राइमरी स्कूल पर टिककर रात में पढ़ाई की जाए।
● वे अपने चाचा से रोज स्कूल बंद हो जाने के बाद चाबी ले लेते थे।
● उन्हीं के गांव के दो अन्य लड़के, तेजबहादुर सिंह तथा मोहम्मद हनीफ ने भी वहीं टिककर मुझसे पढ़ने की इच्छा जाहिर की।
● चिन्तामणि सिंह का एक नौकर उनके घर से रोज शाम को चावल, दाल, आटा, सब्जी आदि लेकर प्राइमरी स्कूल पर आ जाता था तथा रात का खाना वहीं पकाकर हम सबको खिलाता था।
● इस भोजन व्यवस्था के दौरान चिन्तामणि सिंह एक दिन अपने घर से बत्तीस साल पुराना चावल
लाकर पकवाए।
● उस बत्तीस साल पुराने चावल का स्वाद बड़ा कड़वा था जो सिर्फ मसालेदार सब्जी से ही खाया जा सकता था।
● चिन्तामणि सिंह से दोस्ती से उत्पन्न शिक्षा के ये प्रकरण तब तक के मेरे जीवन के सर्वोत्तम क्षण थे।
● दसवीं के फाइनल इम्तहान के लिए फॉर्म भरे जा रहे थे। कुल 30 रुपए फीस जमा करना था।
● मेरी दुर्दशा देखकर वही हिन्दी वाले अध्यापक सुग्रीव सिंह ने मेरे द्वारा बिना किसी आग्रह के स्वयं 30 रुपए फीस के रूप में जमा कर दिए।
◆ स्कूल के एक अन्य अध्यापक रामवृक्ष सिंह, जो पी.टी. मास्टर थे, ने भी सहायता की पेशकश की। स्कूल में उनकी ख्याति एक सुरीले गायक के रूप में थी। रामवृक्ष सिंह भी सुग्रीव सिंह की तरह मेरे साथ बड़े सम्मान से पेश आते थे।
◆ परीक्षा का फॉर्म भरने के डेढ़ महीने बाद यू.पी. बोर्ड, इलाहाबाद से स्कूल पर सूचना आई कि हमें परीक्षा देने चंडेसर डिग्री कॉलेज जाना पड़ेगा। यह कॉलेज हमारे स्कूल से लगभग 12 किलोमीटर दूर आजमग जाने वाली सड़क पर स्थित था।
◆ चंडेसर डिग्री कॉलेज के संस्थापक भी एक साथ चंद्रवली सिंह ‘ब्रह्मचारी’ थे। इस कॉलेज में भी क्षत्रियों का बोलबाला था तथा यह मारपीट के लिए कुख्यात था। यह कॉलेज बहुत विशाल था, जहां करीब दर्जन भर हाई स्कूलों के परीक्षा केन्द्र हुआ करते थे।
● परीक्षा शुरू होने के एक सप्ताह पूर्व चिन्तामणि सिंह मुझे अपनी साइकिल पर बैठाकर चंडेसर ले गए, ताकि कहीं रुकने की व्यवस्था की जा सके।
● जिसमें चिन्तामणि सिंह ने अपने लिए एक कमरा किराए पर लिया, जिसका पूरे एक महीने का किराया पांच रुपए था।
● चिन्तामणि सिंह मुझे अपने साथ रखना चाहते थे, किन्तु मकान मालिक ने पहले ही साफ कह दिया था कि किसी ‘चमार सियार को नहीं रहने दिया जाएगा।
◆ मकान मालिक की इस शर्त से चिन्तामणि सिंह बहुत परेशानी में पड़ गए थे, किन्तु इसके निवारण का कोई अन्य उपाय नहीं था।
◆ अतः अपने मंगरपुर वाले तांत्रिक रिश्तेदार के बेटे दीपचंद, जो चंडेसर के हाई स्कूल के छात्र थे, से मिलकर मैंने मकान संकट के बारे में बात की।
● वे मुझे चंडेसर कॉलेज के दक्षिण में स्थित दलित बस्ती में ले गए। वहां एक परिवार के मालिक थे रूप राम। वह मुफ्त में मुझे पूरी परीक्षा के दौरान अपने घर में रखने पर राजी हो गए।
◆ हमारी परीक्षा 4 मार्च, 1964 को शुरू होने वाली थी।
◆ दक्षिण स्थित दलित बस्ती में रूप राम के घर एक अन्य स्कूल का छात्र दर्शन भी रहने आया था।
◆ 4 मार्च को अंग्रेजी की परीक्षा होने वाली थी। चिन्तामणि सिंह ने परीक्षा के एक दिन पूर्व शाम को मुझे अपने निवास पर बुलाया था, ताकि मैं परीक्षा की तैयारी करा सकू।
◆ उनके निवास पर गया तो देखा कि पहले से ही तेजबहादुर तथा मोहम्मद हनीफ वहां मौजूद थे। किन्तु सबसे चौकाने वाली उपस्थिति थी हीरालाल की जो मुझे बात की बात में गालियां दे पड़ते थे।
◆ ये वही हीरालाल थे, जो मुझे बुलाने के लिए हमेशा ‘चमरा चमरा’ शब्द का इस्तेमाल किया करते थे।
◆ 28 मार्च, 1964 अंतिम दिन हमारी अर्थशास्त्र की परीक्षा थी।
◆ 27 मई, 1964 को मुन्नर चाचा गांजा लेने अमठा गए थे। उन्हें अमठा के ठाकुरों से पता चला कि नेहरू जी इस दुनिया में नहीं रहे।
◆ 8 जून, 1964 को मैं पड़ोस के गांव मठिया के कुबेर राम, जो प्राइमरी स्कूल के अध्यापक थे, से साइकिल लेकर परीक्षाफल देखने आजमगढ़ रवाना हो गया।
◆ आठ आने देकर जब मैंने अपने स्कूल वाला पन्ना देखा तो सबसे ऊपर प्रथम श्रेणी की लिस्ट में मेरा अकेला नाम था। चार लड़के द्वितीय श्रेणी तथा आठ लड़के तृतीय श्रेणी में पास थे। यानी हमारे स्कूल के 46 लड़कों में सिर्फ 13 पास हुए थे।
◆ सबसे ज्यादा दुख मुझे यह देखकर हुआ कि चिन्तामणि सिंह और हीरालाल फेल हो गए थे।
◆ बाबा हरिहर दास के उस स्कूल में पहले कोई भी छात्र प्रथम श्रेणी में पास नहीं हुआ था। इस स्कूल की स्थापना आजादी के तुरंत बाद हुई थी।
◆ मेरे चचेरे मामा राम खेलावन राम आजमगढ़ के प्रसिद्ध डी.ए.वी. कॉलेज में बी. ए. प्रथम वर्ष के छात्र थे। 8 जून, 1964 को मैं पड़ोस के गांव मठिया के कुबेर राम, जो प्राइमरी स्कूल के अध्यापक थे, से साइकिल लेकर परीक्षाफल देखने आजमगढ़ रवाना हो गया।
◆ आठ आने देकर जब मैंने अपने स्कूल वाला पन्ना देखा तो सबसे ऊपर प्रथम श्रेणी की लिस्ट में मेरा अकेला नाम था। चार लड़के द्वितीय श्रेणी तथा आठ लड़के तृतीय श्रेणी में पास थे। यानी हमारे स्कूल के 46 लड़कों में सिर्फ 13 पास हुए थे।
◆ सबसे ज्यादा दुख मुझे यह देखकर हुआ कि चिन्तामणि सिंह और हीरालाल फेल हो गए थे।
◆ बाबा हरिहर दास के उस स्कूल में पहले कोई भी छात्र प्रथम श्रेणी में पास नहीं हुआ था। इस स्कूल की स्थापना आजादी के तुरंत बाद हुई थी।
◆ मेरे चचेरे मामा राम खेलावन राम आजमगढ़ के प्रसिद्ध डी.ए.वी. कॉलेज में बी. ए. प्रथम वर्ष के छात्र थे।
◆ उन्होंने मुझसे कहा कि डी.ए.वी. कॉलेज में ग्यारहवें दर्जे में सिर्फ प्रथम श्रेणी के छात्रों को ही दाखिला दिया जाता है और हर दलित छात्र को सरकार की तरफ से सत्ताईस रुपया महीना वजीफा मिल जाता है, जिससे पढ़ाई का खर्चा चल जाता है।
◆ उन्होंने यह भी बताया कि आजमगढ़ के मातबरगंज मोहल्ले में लाल डिग्गी के पास एक सरकारी हॉस्टल है, जिसमें दलित लड़कों को मुफ्त में रहने दिया जाता है।
◆ गिद्ध हमारी मुर्दहिया की अमूल्य निधि थे।
किसी जीव का प्राण चाहे जैसे निकले, उसके सम्पूर्ण अस्तित्व को हमेशा के लिए मिटा देने की क्षमता तो सिर्फ इन्हीं गिद्धों में थी।
◆ गौतम बुद्ध के लिए जो स्थान था आम्रपाली का सम्भवतः वही थी मेरे लिए नटिनिया।
◆ कांख में दबा बक्सा मेरे सिर पर चढ़ चुका था। ऐसी ही आदर्श स्थिति में याद आते हैं सदाबहार क्रांतिकारी चे गुआरा जो मास्को से डॉक्टरी की पढ़ाई पूरा करने के बाद क्रांतिकारी बने थे। क्यूबा की क्रांति के बाद जब वे फिडेल कास्त्रो का मंत्रिमंडल छोड़कर लैटिन अमरीका के अन्य हिस्सों में क्रांति के उद्देश्य से चुपके से भाग रहे थे, तो उन्होंने अपनी डायरी में लिखा था : ‘मेरे पैरों के पास दो बक्से थे। एक में दवाइयां भरी पड़ी थी और दूसरे में हथियार। मैंने फसलों के बीच से जंगल के लिए रवाना हो गया। खैर, उस समय मेरे अंदर न तो चे गुआरा जैसे विचार थे और न वक्से में हथियार।
?? 7. आजमगढ़ में फाकाकशी ??
◆1 जुलाई, 1964 (मेरा 15वां सर्टिफिकेटिया जन्मदिन) को घर से भागते हुए नटिनिया तथा जोगी बाबा, दो ऐसे व्यक्ति थे, जिनसे होकर मैं एक अनिश्चित भविष्य के लिए रवाना हो गया।
◆ भूतकाल में मुर्दहिया तथा जहानागंज के बीच का सात किलोमीटर लम्बा रास्ता न जाने कितनी बार बड़ी आसानी से पार कर लिया था।
◆ जहानागंज और आजमगढ़ के बीच का आधा रास्ता खड़े-खड़े नापना होगा। इस भगोड़ी यात्रा ने साबित कर दिया कि ज्ञान प्राप्त करना कोई आसान काम नहीं था।
◆ चंडेसर पहुंचने से थोड़ा पहले मुझे वह विशाल पीपल का पेड़ दिखाई दिया, जिसके नीचे दो सप्ताह पूर्व कर्मवीर सिंह ने हाई स्कूल का परीक्षाफल सुनाया था ।
◆ एक्का आजमगढ़ को घेरे टौंस नदी के किनारे स्थित सिधारी नामक स्थान पर रुक गया।
◆ जीवन में पहली बार रेलगाड़ी का मेरी आंखों से होकर गुजरना स्वाभाविक रूप से कुतुहूल पैदा कर देने वाला था।
◆ ज्यों ही पुल से टौंस नदी का पानी मुझे दिखाई दिया, बचपन से ही रटी-रटाई’ रामचरितमानस’ के अयोध्याकांड की यह पंक्ति ‘तमसा तीर कि इसी टीस को पुराने जमाने में तमसा’ कहा जाता था, जिसके किनारे वनवास के लिए जाते हुए मिथकीय राम ने पहला दिन बिताया था।
◆ मैंने पहली बार आजमगढ़ नगर में प्रवेश किया। इस संदर्भ में उल्लेखनीय बात यह है कि महान बौद्ध भिक्षु सारिपुत्रा की मृत्यु के बाद एक परम्परा के अनुसार उनका चीवर (पहनावा ) श्रावस्ती में गौतम बुद्ध के सामने प्रस्तुत किया गया, तो उन्होंने तत्काल उनकी थालीनता का वर्णन करते हुए कहा था: जिस तरह कोई चांडाल लटियाए हुए बालों के साथ कंधे पर सिर को झुकाए, पलकों को नम किए हुए नगर में प्रवेश करें, वैसे ही सारिपुत्रा चलता था।
◆ बुद्ध ने अपने समकालीन जिस चांडाल का वर्णन किया है, मेरी स्थिति उससे जरा भी भिन्न नहीं थी । भिन्नता सिर्फ इतनी थी कि उनका चांडाल पैदल था, किन्तु मैं रिक्शे में, जिसे एक चांडाल ही खींच रहा था।
◆ दरवाजे के उपर एक छोटा-सा टीन का बोर्ड लगा हुआ था, जिस पर लिखा था : ‘अम्बेडकर छात्र वास’ । मैंने अपने जीवन में पहली बार अम्बेडकर का नाम पढ़ा या सुना ।
◆ मामा ने कहा कि आज आराम करूं और कल यानी 2 जुलाई, 1964 को डी. ए. बी. काँलेज चलकर 11वें दर्जे में नाम लिखा लूं।
◆ नेता तेजबहादुर सिंह के संबंध में :-
●आजमगढ़ के प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता
● 2 जुलाई, 1964 को शाम को मामा ने मेरी हाई स्कूल की मार्कशीट अटेस्ट कराने के लिए इनके पास ले गए।
● वे विधान परिषद के सदस्य थे।
● वे मातबरगंज में ही रहते थे।
● उनका मकान शंकर जी की मूर्ति वाले तिराहे के ठीक सामने वंश गोपाल लाल की दुकान का ऊपरी हिस्सा था।
● जिन्होंने 1942 के “भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मेरे ननिहाल वाला तरवां का थाना फूंक दिया था।
● मार्कशीट अटेस्ट करने के बाद उन्होंने मुझे मिलते रहने के लिए कहा।
● पहले ऐसे नेता थे जिनसे व्यक्तिगत रूप से मेरी मुलाकात हुई।
● इनकी वजह मुझे पर मार्क्सवादी प्रभाव पड़ा।
◆ दोपहर के बाद चलने वाली कक्षाओं में अनेक अध्यापक सफेद कमीज पर खाकी हाफ पैंट पहनकर आते थे।
◆ आजमगढ़ का यह डी.ए.वी. कॉलेज सम्पूर्ण रूप से आर.एस.एस. के अधीन था।
◆ आर. एस. एस. से जुड़े मेरे अध्यापकों में एक थे राजमणि वर्मा, जो 11वीं कक्षा को अंग्रेजी पढ़ाते थे।
◆उस समय आजमगढ़ शहर में शिवली नेशनल कॉलेज बहुत मशहूर था, जिसमें मुसलमानों के साथ बड़ी संख्या में हिन्दू छात्र भी पड़ाई करते थे। यह कॉलेज मुस्लिम प्रबंधन के तहत था।
◆ आजमगढ़ शहर में आ पढ़ने वाले सारे मुस्लिम छात्र शिवली नेशनल कॉलेज में चले जाते थे।
◆ डी.ए.वी. के प्रिन्सिपल छबील बंद श्रीवास्तव भी आर.एस.एस. से जुड़े थे।
◆ अंग्रेजी अध्यापक राजमणि वर्मा कट्टर हिन्दुत्ववादी थे।
◆ अम्बेडकर हॉस्टल के मैनेजर शुभचरन वियोगी, बाबा साहब अम्बेडकर द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी के स्थानीय नेता थे।
◆ सनवारी राम के संबंध में :-
● आजमगढ़ के पहला गुरू मित्र
● डी.ए.वी. कॉलेज में 12वीं कक्षा में साइंस के छात्र थे।
● सनवारी राम बड़े ओजस्वी वक्ता थे।
● वे अम्बेडकर हॉस्टल के ठीक सामने वाले मकान में रहते थे।
● इस मकान में आजमगढ़ डाक तार विभाग के मैनेजर रामनाथ किराए पर रहते थे।
● सनवारी राम तारबाबू के बेटे विजय तथा भतीजे प्रह्लाद को ट्यूशन देते थे,जिसके बदले वे उनके साथ उसी मकान में रहते थे
● सनवारी राम प्रत्येक दिन अम्बेडकर हॉस्टल में ही मौजूद रहते थे तथा अम्बेडकर के बारे में प्रायः बातें किया करते थे।
● सनवारी राम ने ही पहली बार डॉ. अम्बेडकर की प्रसिद्ध उक्ति ‘जातिविहिन समाज के बिना स्वराज प्राप्ति का कोई महत्व नहीं’ से मुझे अवगत कराया था।
● सनवारी राम बहुत मेधावी छात्र थे ।
● गणित शास्त्र में उन्हें महारथ हासिल थी किन्तु बारहवीं कक्षा में सात बार फेल होकर आठवीं बार किसी तरह पास हुए और बाद में रेलवे विभाग में स्टेशन मास्टर बन गए थे।
● सनवारी राम से ही पता चला कि डॉ. अम्बेडकर बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिये थे तथा उन्होंने ही गांधी जी से लड़कर दलितों के लिए
आरक्षण हासिल किया था।
● डॉ. अम्बेडकर बौद्ध बन गए थे, यह बात मुझे सबसे ज्यादा प्रिय लगी थी।
◆ रामनाथ के संबंध में :-
● आजमगढ़ डाक तार विभाग के मैनेजर
● रामनाथ जी ‘तारबाबू’ के नाम से जाने जाते थे । ● तारबाबू की पत्नी प्राइमरी स्कूल की अध्यापिका थी। दोनों लोग बहुत सामाजिक व्यक्ति थे।
● तारबाबू के बेटे का नाम :- विजय
● तारबाबू के भतीजा का नाम :- प्रह्लाद
● सहदेव तथा तेजबहादुर राम दो अन्य छात्र अम्बेडकरवादी थे। ये दोनों बाद में इंजीनियर बन गए थे। हॉस्टल के अंदर भोजनालय की कोई व्यवस्था नहीं थी, जबकि सरकारी नियमों के अनुसार इसका प्रावधान था। अतः इसमें रहने वाले छात्र आपस में पैसा इकट्ठा कर स्वयं मेस चलाते थे।
◆ जो छात्र घर से राशन लाते थे, उसे भी मेस में जमा करके खाने का हिसाब पूरा कर लिया जाता था।
◆ जिस छात्र का पैसा या राशन का ब्योरा समाप्त हो जाता था और आगे कुछ जमा नहीं हो पाता, तो उसका मेस में खाना बंद कर दिया जाता था। मेरा खाना भी मेस में प्रायः बंद होने लगा।
◆ दुक्कू तेली के संबंध में :-
● अम्बेडकर हॉस्टल के सामने तारबाबू के नाम से मशहूर दुकान के मालिक थे ।
● उनके नाम से पकौड़ी का नाम जुड़ गया था।
● वे स्वयं पालथी मारकर खौलती तेल की कड़ाही के पास बैठकर बड़े पौने से पकौड़ी छाना करते थे।
● दुक्कू बड़ी तोंद वाले पुरुष थे।
● जो हमेशा सिर का बाल छोटे रखते थे।
● वे चीन के हंसते बुद्ध की तरह दिखाई देते थे। ● वे कई प्रकार की पकौड़ियों के साथ मीट भी पकाया करते थे।
● उनका पकाया हर माल बहुत स्वादिष्ट हुआ करता था।
● उनकी दुकान के ठीक बगल में आजमगढ़ का सबसे बड़ा ताड़ीखाना था।
● दुक्कू की पकौड़ी अभिन्न भोज बन गई थी।
● दुक्कू मुझे पकौड़ियां उधार देने लगे। किन्तु तीन-चार दिन से ज्यादा उधारी नहीं चल पाती थी, ● मेस में मेरा खाना जब भी बंद हो जाता, मेरा काम दुक्कू की पकौड़ियों से चल जाता था ।
● जैसा कि तीन- चार दिन से ज्यादा दुक्कू उधारी नहीं चल पाती थी, इसलिए पकौड़ियां खाना बंद हो जाता था, जिसका मतलब था फाकाकशी शुरू ।
◆ ताड़ीखोरों की याद आने पर हरिवंश राय बच्चन की ये पंक्तियां बरबस ही याद आ जाती हैं:
गूज उठी मदिरालय में, ली पिया पियो की बोली।
◆ अब धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि घर से भागा हुर व्यक्ति बुद्ध नहीं बन जाता।
◆ गृहत्याग के बाद चामत्कारिक शक्ति पाने के लिए ब्राह्मणों के चक्कर में बुद्ध भी भूखे रहकर श्मशान में साधना करने लगे थे।
◆ मेरी पहली रेलयात्रा आजमगढ़ से बनारस तक सम्पन्न हुई, उन दिनों हर 15 अगस्त तथा 26 जनवरी को तमाम छात्र 24 घंटे के भीतर बिना टिकट के किसी भी ट्रेन में बैठकर आसपास के शहरों की यात्रा कर आते थे।
◆ तर्क यह होता था कि स्वतंत्राता दिवस पर रेलगाड़ी फ्री कर दी गई थी, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था। अतः इसी तर्क के सहारे अम्बेडकर हॉस्टल के जोखूराम, यमुना प्रसाद तथा बलवंत के साथ ।
◆ मेरी पहली और बिना टिकट यानी यू. टी. (विदआउट टिकट) यात्रा ने मुझे 15 अगस्त, 1964 को बनारस पहुंचा दिया।
◆ मेरे अंदर इन शहरों की भ्रमण करने की इच्छा थी:- बनारस की गंगा, काशी विश्वनाथ तथा बनारस हिन्दु यूनिवर्सिटी (बी.एच.यू.)
◆ बनारस की गंगा में बड़ी संख्या में डॉल्फिन मछलियां पाई जाती थीं स्थानीय लोग उन्हें ‘शोंस’ कहते थे।
◆ वहां से बी.एच.यू. चार किलोमीटर दूर था। गोदौलिया से दक्षिण जाने वाली सड़क पर चलते हुए मदनपुरा, सोनारपुरा भदैनी, अस्सी तथा लंका होते जब मैं बी.एच.यू. गेट पर पहुंचा तो उसका भव्य मुख्य की मूर्ति थी।
◆ मुख्य द्वारद्वार पर विश्वविद्यालय के संस्थापक मदन मोहन मालवीय की मूर्ति थी।
◆ मुख्य द्वार के अंदर स्थित प्राक्टर ऑफिस के सामने रखे एक श्यामपट पर लिखी सूचना में कहा गया था कि आज बी.एच.यू. तथा चंडीगढ़ विश्वविद्यालय के बीच स्टेडियम में हाकी मैच होगा।
◆ यह मैच बी.एच.यू. की टीम हार गई जिससे मुझे बहुत दुख हुआ था।
◆ मेरे ठीक बगल में बी.एच.यू. लॉ कॉलेज के एक विद्यार्थी तपसीराम बैठकर मैच देख रहे थे। वे भी आजमगढ़ के रहने वाले हैं।
◆ मैंने तपसीराम से कहा कि मैं भविष्य में यहां पढ़ना चाहता हूं किन्तु घर से भागा हुआ हूं, इसलिए सब कुछ अपने बल पर करना है। तपसीराम ने आश्वस्त करते हुए मुझसे कहा कि पहले इंटर पास कीजिए फिर देखा जाएगा।
◆ अम्बेडकर हॉस्टल को लेकर दो कथित मैनेजरों में लड़ाई। हॉस्टल के मैनेजर शुभ चरन वियोगी थे, किन्तु आजमगढ़ के प्रसिद्ध दलित नेता रामधन जो उस समय एक वकील थे, ने हॉस्टल पर अपना अधिकार करने के लिए कानूनी प्रक्रिया द्वारा दावा ठोक दिया था, जिसके कारण हॉस्टल की मात्र 300 रुपए मासिक मिलने वाली सरकारी सहायता बंद हो गई। उस समय अम्बेडकर हॉस्टल की पूरी इमारत मात्र 50 रुपए मासिक किराए पर ली गई थी।
◆ इस इमारत में चार बड़े-बड़े हालनुमा कमरे तथा तीन बरामदे थे। इस चौकोर इमारत के बीच एक बहुत बड़ा आंगन था। एक-एक कमरे में दस- दस छात्र रहते थे। इस तरह हमेशा 50-60 छात्र इसमें रह लेते थे। पूरी इमारत खपडैल थी। इस इमारत के मालिक आजमगढ़ के रफी-शफी दो वकील भाई थे।
◆ अहमदी बीबी के संबंध में :-
● अहमदी बीवी एक सरकारी सफाई कर्मचारी थी ● जो अम्बेडकर हॉस्टल तथा उसके सामने वाली सड़क पर झाडू लगाया करती थी ।
● युवा अवस्था में ही अहमदी बीबी के पति का निधन हो गया था।
● वे अत्यंत खूबसूरत थीं, किन्तु युवा अवस्था में ही सूनापन उनके चेहरे पर साफ दिखाई देता था।
● वे सभी के साथ बहुत शराफत से पेश आती थीं।
◆ जनवरी 1965 का महीना था। आजमगढ़ चौक के पूर्वी सड़क स्थित कुख्यात कालीनगंज मोहल्ले के एक स्टूडियो से पासपोर्ट फोटो खिंचवाकर वापस आ रहा था।
◆ कालीनगंज मोहल्ला इसलिए बदनाम था, क्योंकि वहां धन के बदले औरतें अपनी रातें बेचा करती थीं। ऐसी औरतों को अपने ‘अर्थशास्त्र’ नामक ऐतिहासिक ग्रंथ में कौटिल्य ने ‘पण सुंदरी’ कहा है। पण मुद्रा को कहते थे।
◆ मेरी चचेरी मौसी के बेटे देव नारायन, जो रानीपुर इंटर कॉलेज के छात्र थे, मेरे तांत्रिक रिश्तेदार के पुत्र दीपचंद के साथ अम्बेडकर हॉस्टल में मुझसे मिलने आए।
◆ कालीनगंज के संदर्भ मे ‘विनय पिटक’ में वर्णित ‘भद्र वर्गीय कथा’ याद आती है। गौतम बुद्ध सारनाथ में प्रथम उपदेश देने के कुछ दिन बाद उरुबेला यानी बोधगया को वापस लौट रहे थे। रास्ते में एक सघन जंगल था। वहीं बुद्ध एक पेड़ के नीचे बैठ गए। अचानक वहां से तीस व्यक्तियों का एक झुंड गुजरा। विचित्रा बुद्ध को देखकर इन व्यक्तियों ने उनसे पूछ लिया कि क्या उन्होंने इधर से गुजरती किसी औरत को देखा है। बुद्ध ने उनसे पूरा विवरण पूछा। इन तीसों ने बताया कि वे अपनी पत्नियों के साथ मनोरंजन के लिए इस वन खंड में आए थे, किन्तु उनमें से एक बिना पत्नी का था, इसलिए उसके लिए एक वेश्या लाई गई थी। उन्होंने आगे बताया कि जब वे सभी शराब के नशे में इधर-उधर घूम रहे थे, वह वेश्या सारा आभूषण आदि लेकर कहीं चम्पत हो गई। अतः वे उसी स्त्री को छूट रहे थे। इस पर बुद्ध ने उन तीनों व्यक्तियों से कहा: तुम सभी उस स्त्री को ढूंढना चाहते हो या स्वयं को? बुद्ध के इस दार्शनिक प्रश्न को सुनकर इन तीनों व्यक्तियों की संवेदना जा उठी और वे बुद्ध से उपदेश सुनकर भिक्षु बन गए। बाद में चलकर वे ‘भद्र वर्गीय भिक्षु’ कहलाए। सम्भवतः यदि हम तीनों उनके साथ हुए होते, तो भद्र वर्गीय भिक्षुओं की श्रेणी में अवश्य आ गए होते?
◆ मिशन कॉलेज के प्रिन्सिपल विलियम थ्यूपलस थे।
◆ मैं भी ईसाई बनूंगा ताकि आगे की पढ़ाई जारी रखू। आजमगढ़ रोडवेज के पास एकमात्र चर्च था। मैंने रात में खाना खाने के बाद दीपचंद से ईसाई बनने के इरादे को जाहिर कर दिया और तुरंत चर्च जाने के लिए जिद करने लगा।
◆ करीब नौ महीने बाद मार्च 1965 में पहली बार
छह महीने की स्कॉलरशिप के 162 रुपए मुझे मिले ।
◆ देवराज सिंह के संबंध में :-
● मेरी कक्षा के सबसे गहरे दोस्त थे।
● वे बस्ती जिला के रहने वाले थे।
● वे डी.ए.वी. कॉलेज में इसलिए पढ़ने आए थे, क्योंकि उनके बड़े भाई आजमगढ़ में सप्लाई ऑफिसर के रूप में नियुक्त थे।
● वे काफी सम्पन्न थे।
● देवराज सिंह अक्सर मेरे अम्बेडकर हॉस्टल में मुझसे मिलने आते।
● मैं दुक्कू की पकौड़ी से उनका स्वागत करता था।
● देवराज सिंह अचानक एक रामपुरी छुरी मेरे सीने पर लगाकर कहने लगे आपके पॉकेट में कल मिले 162 रुपए मौजूद हैं, उसमें से 81 रुपए मुझे दे दीजिए और अविलम्ब उन्हें 81 रुपए सौंप दिया।
● देवराज सिंह द्वारा छीने गए पैसे से उत्पन्न परिस्थिति से आगे भी मेरी फाकाकशी का अंत नहीं हुआ।
◆ इस दौरान मुझे पहली बार शराब पिलाने वाले लालबहादुर सिंह दो-तीन महीने में एक बार मुझसे मिलने अम्बेडकर हॉस्टल अवश्य आ जाते थे।
उन्हीं के चलते मैंने पहली बार अम्बेडकर हॉस्टल के पास वाले ताड़ीखाने में बैठकर ताड़ी पिया था।
◆ लालबहादुर सिंह अपनी पत्नी का सोने का कगन लेकर मेरे पास आए। हम दोनों उसे आजमगढ़ के प्रसिद्ध सोना व्यापारी हरीशचंद की दुकान पर 400 रुपए में बेच आए।
◆ बिजई पांड़े हाई स्कूल फेल थे, किन्तु टाइपिंग सीखकर वे आजमगढ़ कचहरी में टाइप करने का काम करते थे।
◆ तपसीराम के संबंध में :-
● बी.एच.यू में पढ़ते थे।
● लालगंज तहसील के पास वाले गांव में रहते थे।
● तपसीराम के पिता कलकत्ता की एक जुट मिल में काम करते थे। वे औसतन सम्पन्न व्यक्ति थे।
● उनकी माँ ने मुझे बीस रुपया दिये।
◆ डी.ए.वी. कॉलेज के चपरासी :- छेदीलाल
◆ 11 जनवरी, 1966 को देश भर में खबर फैल गई कि ताशकांद में शास्त्री जी की मृत्यु हो गई।
◆ लाल बहादुर शास्त्री कायस्थ थे।
◆ कम्युनिस्ट नेता तेज बहादुर सिंह के नाती अरुण कुमार सिंह से मेरी गहरी दोस्ती हो गई।
◆ अरुण कुमार सिंह बी.एच.यू. से बी. ए. एल. एल. बी. करके आजमगढ़ में वकालत करते हैं।
◆ वे सन् 2009 के आम चुनावों में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सी.पी.आई. (एम) से लोकसभा का चुनाव लड़े थे, किन्तु असफल रहे।
● आजमगढ़ की सांस्कृतिक जीवन में मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया था गुलाब बाई की नौटंकी ने। लैला मजनू’ का मंचन सबसे अद्भुत होता था। इस नाटक में गुलाब बाई की युवती बेटी मजनू की विस्मयकारी भूमिका निभाती थी।
◆ कलकत्ता में चौधरी चाचा के छोटे बेटे सोबरन एक लोहे की फैक्ट्री में काम करते थे। अतः फाइनल इम्तहान के बाद मैं तुरंत आजमगढ़ से कलकत्ता जाने के लिए बनारस रवाना हो गया।
मुर्दहिया का आत्मकथा (murdahiya ka aatmakatha) पार्ट – 1
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