भारतीय-आर्य भाषाओं का इतिहास
भारतीय-आर्य भाषाओं का इतिहास लगभग 3500 से अधिक वर्षों में फैला हुआ है। भाषाविदों (विशेषकर डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ. भोलनाथ तिवारी और डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी) ने इसके विकासक्रम को मुख्य रूप से तीन ऐतिहासिक चरणों में विभाजित किया है:
1. प्राचीन भारतीय-आर्य भाषा काल (1500 ई.पू. से 500 ई.पू.)
इस काल की मुख्य भाषा संस्कृत थी। इस चरण को दो प्रमुख भागों में बाँटा जाता है:
(क) वैदिक संस्कृत (1500 ई.पू. से 1000 ई.पू.) :
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यह भारत की सबसे प्राचीन ज्ञात भाषा है, जिसमें वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों और उपनिषदों की रचना हुई।
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विशेषता : इसका व्याकरण अत्यंत जटिल, संश्लिष्ट (Synthetic) और ध्वन्यात्मक दृष्टि से बहुत समृद्ध था। इसमें संगीतात्मक स्वरघात (Accents: उदात्त, अनुदात्त, स्वरित) का विशेष महत्व था।
(ख) लौकिक संस्कृत (1000 ई.पू. से 500 ई.पू.) :
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महर्षि पाणिनि ने अपने ग्रंथ ‘अष्टाध्यायी’ द्वारा वैदिक संस्कृत के कठिन रूप को नियमबद्ध और परिमार्जित करके ‘लौकिक संस्कृत’ का मानक रूप तैयार किया।
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इसमें रामायण, महाभारत, और कालिदास आदि के कालजयी संस्कृत साहित्यों की रचना हुई।
2. मध्यकालीन भारतीय-आर्य भाषा काल (500 ई.पू. से 1000 ई.)
इस काल को ‘प्राकृत काल’ भी कहा जाता है। इसमें भाषा संस्कृत के जटिल व्याकरणिक ढाँचे से मुक्त होकर जन-सामान्य की सहज बोली बनने लगी। इसके विकास के तीन मुख्य चरण रहे:
(क) प्रथम अवस्था — पालि (500 ई.पू. से 1 ई.) :
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इसे भारत की पहली देशभाषा माना जाता है।
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भगवान बुद्ध के उपदेश और सम्पूर्ण बौद्ध साहित्य (त्रिपिटक — सुत्तपिटक, विनयपिटक, अभिधम्मपिटक) इसी भाषा में रचे गए।
(ख) द्वितीय अवस्था — प्राकृत (1 ई. से 500 ई.) :
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यह आम जनता की बोलचाल की भाषा थी। भगवान महावीर के उपदेश और जैन साहित्य मुख्य रूप से प्राकृत में हैं।
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इसके क्षेत्रीय भेदों के आधार पर कई रूप विकसित हुए: शौरसेनी, पैशाची, ब्राचड़, महाराष्ट्री, मागधी और अर्धमागधी।
(ग) तृतीय अवस्था — अपभ्रंश (500 ई. से 1000 ई.) :
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‘अपभ्रंश’ का शाब्दिक अर्थ है ‘गिरा हुआ’ या ‘भ्रष्ट’। प्राकृत भाषाएँ जब और अधिक परिवर्तित हुईं, तो अपभ्रंश का रूप बनीं।
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यह मध्यकालीन और आधुनिक भाषाओं के बीच की संक्रमणकालीन कड़ी (Sankramankalin Kadi) है। (अपभ्रंश के अंतिम काल को ‘अवहट्ठ’ भी कहा गया है)।
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शौरसेनी अपभ्रंश पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, गुजराती, पहाड़ी
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अर्धमागधी अपभ्रंश पूर्वी हिंदी (अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी)
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मागधी अपभ्रंश बिहारी (भोजपुरी, मैथिली, मगही), बंगाली, उड़िया, असमिया
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ब्राचड़ व पैशाची अपभ्रंश सिंधी, पंजाबी
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महाराष्ट्री अपभ्रंश मराठी
3. आधुनिक भारतीय-आर्य भाषा काल (1000 ई. से अब तक)
1000 ईस्वी के आसपास अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से आधुनिक भारतीय-आर्य भाषाओं का जन्म हुआ।
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विशेषता : आधुनिक भाषाओं का स्वरूप वियोगात्मक (Analytic) है।
विकासक्रम का संक्षिप्त सारांश