मानक देवनागरी लिपि और हिंदी वर्तनी के प्रमुख नियम(manak devnagri lipi aur hindi vartani ke pramukh niyam)

मानक देवनागरी लिपि और हिंदी वर्तनी के प्रमुख नियम

केंद्रीय हिंदी निदेशालय (शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार) ने देवनागरी लिपि और वर्तनी में एकरूपता, स्पष्टता और वैज्ञानिकता लाने के लिए मानक हिंदी वर्तनी के विस्तृत नियम निश्चित किए हैं। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य मुद्रण (Printing), कंप्यूटर टाइपिंग, प्रकाशन और पठन-पाठन में होने वाले भ्रम को दूर करना है।

1. संयुक्त व्यंजन (Consonant Clusters) के मानकीकरण के नियम :

  • खड़ी पाई वाले व्यंजन : जिन व्यंजनों के अंत में खड़ी पाई होती है (ख, ग, घ, च, झ, ज, ण, त, थ, ध, न, प, ब, भ, म, य, ल, व, श, ष, स), उनके संयुक्त रूप बनाते समय केवल खड़ी पाई को हटा दिया जाता है।

    • उदाहरण : ख्याति, लग्न, व्यास, पक्का, प्यास, पत्ता

  • बिना खड़ी पाई वाले व्यंजन : जिनमें खड़ी पाई नहीं होती (ङ, छ, ट, ठ, ड, ढ, द, ह), उन्हें संयुक्त करते समय उनके नीचे हलंत (्) लगाया जाता है।

    • उदाहरण : विद्या, चिह्न, लट्टू, द्वंद्व

  • क और फ का संयुक्त रूप : ‘क’ और ‘फ’ का संयुक्त रूप बनाते समय उनके आगे के मुड़े हुए भाग (वकड़ी/फांस) को आधा काट दिया जाता है।

    • उदाहरण : दफ्तर, अक्ल, पक्का

  • र के विभिन्न रूप :

    • स्वर रहित ‘र्’ (रेफ) : जिस वर्ण के साथ बोला जाता है, उसके बाद वाले वर्ण के सिर पर लगाया जाता है। (उदा: कर्म, धर्म)

    • किसी व्यंजन के बाद आने वाला ‘र’ (पदेन) : व्यंजन के पैर में लगाया जाता है। (उदा: क्रम, प्रकाश, ट्राम, राष्ट्र)

2. अनुस्वार (ं) और पंचमाक्षर (ङ, ञ, ण, न, म) का प्रयोग :

  • पंचमाक्षर के स्थान पर अनुस्वार : क-वर्ग से लेकर प-वर्ग तक के पंचमाक्षरों (ङ, ञ, ण, न, म) के स्थान पर संयुक्त रूप में केवल अनुस्वार (ं) का ही प्रयोग किया जाएगा।

    • उदाहरण : गंगा, चंचल, पंडित, हिंदी, कंप्यूटर

  • अपवाद (जहाँ अनुस्वार नहीं लगेगा) : यदि पंचमाक्षर अपने ही वर्ग के अक्षर के साथ द्वित्व (दोगुना) होकर आए, तो वहाँ पंचमाक्षर ही लिखा जाएगा, अनुस्वार नहीं।

    • उदाहरण : अन्न, सम्मति, अक्षुण्ण, वाङ्मय

3. अनुस्वार (ं) और अनुनासिकता (चंद्रबिंदु – ँ) :

  • चंद्रबिंदु (ँ) का प्रयोग : जहाँ स्वर का उच्चारण नाक और मुँह दोनों से होता है, वहाँ चंद्रबिंदु का प्रयोग अनिवार्य है।

    • उदाहरण : हँसना, आँख, गाँव, चाँद

  • शिरोरेखा के ऊपर मात्रा होने पर : यदि शिरोरेखा के ऊपर कोई स्वर मात्रा (ि, ी, े, ै, ों, ौं) लगी हो, तो स्थान की कमी के कारण चंद्रबिंदु के स्थान पर अनुस्वार (ं) का प्रयोग किया जाता है।

    • उदाहरण : मैं, हैं, गोंद, ईंट, खींचना

4. पद-पृथक्करण (कारक-चिह्न, सर्वनाम और क्रिया) :

  • विभक्ति / कारक-चिह्न (Case Markers) :

    • संज्ञा शब्दों से अलग : संज्ञा के साथ आने वाले कारक-चिह्न हमेशा अलग लिखे जाएँगे। (उदा: राम ने, घर से, पेड़ पर)

    • सर्वनाम शब्दों के साथ मिलाकर : सर्वनाम के साथ आने वाले कारक-चिह्न मिलाकर लिखे जाएँगे। (उदा: उसने, उसको, उसमें, जिससे)

    • विशेष नियम : यदि सर्वनाम के साथ दो कारक-चिह्न हों, तो पहला मिलाकर और दूसरा अलग लिखा जाएगा। (उदा: उसके लिए, उनमें से)

  • संयुक्त क्रियाएँ : संयुक्त क्रिया पदों को हमेशा अलग-अलग लिखा जाएगा। (उदा: पढ़ रहा है, खा लिया है, आया करता है)

5. योजक चिह्न (Hyphen – ‘-‘) का नियम :

  • द्वंद्व समास और द्विरुक्त शब्दों में :

    • उदाहरण : माता-पिता, दाल-रोटी, धीरे-धीरे, चाल-चलन

  • ‘सा’, ‘से’, ‘सी’ के पूर्व :

    • उदाहरण : चाँद-सा मुखड़ा, तुम-सा कोई नहीं

  • भ्रम निवारण हेतु : जहाँ बिना योजक चिह्न के अर्थ का अनर्थ होने की संभावना हो।

    • उदाहरण : अ-नीति (जो नीति न हो) बनाम अनीति

6. ‘ए’/’ये’ और ‘ई’/’यी’ का नियम (स्वर बनाम व्यंजन) :

जहाँ क्रियाओं के भूतकालिक या विधि रूपों में ‘ए/ई’ या ‘ये/यी’ दोनों का प्रयोग होता है, वहाँ स्वर रूप (ए, ई, ओ) को ही मानक माना गया है —

अमानक / वैकल्पिक रूप मानक रूप अमानक / वैकल्पिक रूप मानक रूप
गये, गयी गए, गई कीजिये, दीजिये कीजिए, दीजिए
नई / नयी नई हुए, हुयी हुए, हुई
चाहिये चाहिए

7. हलंत, नुक्ता और अंक :

  • हलंत का प्रयोग : हिंदी में संस्कृत के तत्सम शब्दों के अंत से हलंत सामान्यतः हटा दिया गया है। (उदा: महान (महान्), परिषद (परिषद्), जगत (जगत्))

  • नुक्ता (़) का प्रयोग : अरबी, फारसी और अंग्रेजी के आगत शब्दों (क़, ख़, ग़, ज़, फ़) में नुक्ता केवल वहीं लगाया जाए जहाँ अर्थ में अंतर स्पष्ट करना आवश्यक हो। (उदा: राज (राज्य) बनाम राज़ (रहस्य))

  • मानक अंक : अंतर्राष्ट्रीय अंक प्रणाली 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 0 को संवैधानिक व प्रशासनिक कार्यों के लिए मानक माना गया है (देवनागरी अंक – १, २, ३ … भी प्रयुक्त हो सकते हैं)।

संक्षेप में (At a Glance)

  1. पंचमाक्षर : ‘गंगा’, ‘पंडित’, ‘हिंदी’ जैसे शब्द अनुस्वार से लिखे जाएँगे।

  2. कारक चिह्न : संज्ञा से अलग (राम ने), सर्वनाम से जोड़कर (उसने)।

  3. क्रिया पद : अलग-अलग लिखे जाएँगे (जा रहा है)।

  4. स्वर प्राथमिकता : ‘गए’, ‘गई’, ‘चाहिए’ जैसे पदों में स्वरों को प्राथमिकता दी जाएगी।

  5. संयुक्त वर्ण : खड़ी पाई हटाकर या हलंत लगाकर लिखे जाएँगे।

निष्कर्ष : देवनागरी लिपि के गुण उसकी व्यावहारिक सीमाओं की तुलना में कहीं अधिक भारी हैं। कंप्यूटर तकनीक, यूनिकोड (Unicode) और आधुनिक फ़ॉन्ट डिजाइनिंग के आने से इसकी अधिकांश तकनीकी जटिलताएँ समाप्त हो चुकी हैं। आज यह लिपि डिजिटल युग के साथ पूरी तरह तालमेल बिठाकर विकसित हो रही है।

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